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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  

स्वर्ग की रानी : पवित्र आत्मा हमें साहस, आशा व विश्वास प्रदान करता

रविवार को पेंतेकोस्त महापर्व के दिन संत पापा फ्राँसिस ने पवित्र आत्मा के कार्यों पर चिंतन किया जो एक तेज एवं मुक्त बहनेवाली आँधी के समान है। उन्होंने विश्वासियों को निमंत्रण दिया कि वे पवित्र आत्मा के वरदान को ग्रहण करने के लिए अपना हृदय खोलें तथा प्रभु के प्रेम का साक्ष्य देने के लिए बाहर जाएँ।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 23 मई 2021 (रेई)- वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 23 मई को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ स्वर्ग की रानी प्रार्थना का पाठ किया जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

प्रेरित-चरित की पुस्तक (प्रे.च.2,1-11) येसु के पास्का के 50 दिन बाद येरूसालेम में क्या घटता है, उसका वर्णन करती है। शिष्य उपरी कमरे में एकत्रित थे और उनके साथ कुँवारी मरियम भी उपस्थित थीं। पुनर्जीवित प्रभु ने उन्हें तब तक येरूसालेम नहीं छोड़ने को कहा था जब तक कि वे ऊपर के वरदान पवित्र आत्मा से विभूषित न हो जाएँ। और यह एक "आवाज" से प्रकट हुआ उन्होंने अचानक स्वर्ग से आती हुई एक आवाज सुनी, "आँधी जैसी आवाज" और सारा घर जहाँ वे बैठे हुए थे गूँज उठा। (पद. 2) इस प्रकार एक वास्तिवक किन्तु प्रतीकात्मक अनुभव प्राप्त हुआ। एक घटना घटी किन्तु यह जीवन के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश देती है।

पवित्र आत्मा प्रभु हैं, जीवनदाता

संत पापा ने कहा, "यह अनुभव प्रकट करता है कि पवित्र आत्मा एक तेज एवं मुक्त बहनेवाली आँधी के समान है, अर्थात् इसमें शक्ति एंव स्वतंत्रता है :  यह तेज एवं मुक्त हवा है। इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता, रोका नहीं जा सकता, न ही मापा और दिशा दिया जा सकता है। हमारी मानवीय सीमाओं, जिसमें हम उन्हें अपने ढाँचे पर डालने की कोशिश करते हैं, हमें ढांचे में डालने नहीं देता। न ही इसे हमारी प्रणाली और हमारे पूर्वाग्रहों के द्वारा समझा जा सकता है। पवित्र आत्मा, पिता ईश्वर एवं उनके पुत्र येसु ख्रीस्त से प्रसृत होकर कलीसिया पर उतरता – हम प्रत्येक पर उतरता है, हमारे मन और हमारे हृदय को जीवन प्रदान करता है। जैसा कि प्रेरितों का धर्मसार  कहता है : वे प्रभु हैं जीवनदाता हैं।

पेंतेकोस्त के दिन तक, येसु के शिष्य दिशाहीन और भयभीत बने हुए थे। उनमें खुले में बाहर निकलने का साहस नहीं था। संत पापा ने कहा, "हमारे साथ भी ऐसा होता है हम कभी-कभी चहारदीवारी के भीतर, सुरक्षित अपने ही परिवेश में रहना चाहते हैं। किन्तु प्रभु जानते हैं कि हमारे पास उन्हें किस तरह आना है और हमारे हृदय के द्वार को खोलना है। वे हम पर पवित्र आत्मा भेजते हैं जो हमें ढंक लेता एवं हमारे हर प्रकार की हिचकिचाहट को दूर कर देता है, हमारी सुरक्षा कवच को तोड़ देता, हमारी झूठी निश्चितता को नष्ट कर देता है। आत्मा हमें नई सृष्टि बनाता है, ठीक उसी तरह जिस तरह उन्होंने उस दिन प्रेरितों के साथ किया था : हमें नवीकृत करता, नई सृष्टि बनाता है।

पवित्र आत्मा हृदय बदल देते हैं

पवित्र आत्मा को ग्रहण करने के बाद वे पहले के समान नहीं रह गये थे, वे बदल गये थे, वे बिना भय बाहर निकले एवं प्रचार करने लगे कि येसु जी उठे हैं, प्रभु हमारे साथ हैं। उन्होंने इस तरह घोषणा की कि हरेक अपनी भाषा में उन्हें समझ लिया क्योंकि पवित्र आत्मा सर्वभौमिक है, वह सांस्कृतिक विविधता, विचारों की भिन्नता को नहीं तोड़ता, वह सभी के लिए हैं, किन्तु हरेक अपनी संस्कृति एंव भाषा में उन्हें समझ सकता है। पवित्र आत्मा हृदय परिवर्तन करते हैं, शिष्यों के दृष्टिकोण को विस्तृत करते हैं। वे प्रत्येक को ईश्वर के असीम, महान कार्यों का बखान करने, सांस्कृतिक एवं धार्मिक सीमाओं को पार करने के लिए शक्ति प्रदान करते हैं जिसके अंदर वे सोचने एवं जीने के आदी थे। वे उन्हें एक-दूसरे की संस्कृति एवं भाषा का सम्मान करने, सुनने एवं समझने के सामर्थ्य के साथ दूसरों तक पहुँचने की शक्ति देते हैं (5-11) दूसरे शब्दों में पवित्र आत्मा अलग-अलग लोगों से सम्पर्क करते एवं कलीसिया की एकता और सार्वभौमिकता को संभव बनाते हैं।

और आज यह सच्चाई हमें बहुत कुछ सिखाती है, पवित्र आत्मा की सच्चाई के बारे, जहाँ कलीसिया में छोटे-छोटे दल हैं जो अपने आपको दूसरों से अलग करने के लिए हमेशा विभाजन की खोज करते हैं। यह ईश्वर की आत्मा नहीं है। ईश्वर का आत्मा सौहार्द और एकता का आत्मा है एवं विविधताओं को जोड़ता है।

पवित्र आत्मा एक साथ लाता

संत पापा ने एकता का उदाहरण देते हुए कहा, "एक अच्छे कार्डिनल जो जेनोवा के महाधर्माध्यक्ष थे, कहा करते थे कि कलीसिया एक नदी के समान है, महत्वपूर्ण बात है कि उसके अंदर रहा जाए, चाहे आप इस किनारे हों अथवा उस किनारे, फर्क नहीं पड़ता, पवित्र आत्मा सभी को एक साथ लाता है। वे नदी की छवि का प्रयोग करते थे। महत्वपूर्ण बात है कि हमें आत्मा की एकता के अंदर होना है और छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान नहीं देना है कि आप थोड़ा इधर रहें या उधर, आप इस तरह प्रार्थना करें अथवा दूसरी तरह, ऐसी बातें ईश्वर की नहीं हैं। कलीसिया सभी के लिए है, हरेक के लिए जैसा कि पवित्र आत्मा ने पेंतेकोस्त के दिन दिखाया।  

कुँवारी मरियम की याद करते हुए संत पापा ने कहा, "आज हम कुँवारी मरियम, कलीसिया की माता से उनकी मध्यस्थता की याचना करें ताकि पवित्र आत्मा हमपर प्रचुरता से उतरे एवं विश्वासियों के हृदय को भर दे तथा प्रत्येक में अपने प्रेम की आग सुलगा दे।"  

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ स्वर्ग की रानी प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व संत पापा का संदेश
23 May 2021, 16:28

स्वर्ग की रानी क्या है?

स्वर्ग की रानी गीत (अथवा स्वर्ग की रानी) मरियम के चार गीतों में से एक है (अन्य तीन गीत हैं- अल्मा रेदेनतोरिस मातेर, आवे रेजिना चेलोरूम, प्रणाम हे रानी)।

संत पापा बेनेडिक्ट 15वें ने सन् 1742 में, पास्का काल अर्थात् पास्का रविवार से लेकर पेंतेकोस्त तक, देवदूत प्रार्थना के स्थान पर इसे खड़े होकर गाने का निर्देश दिया था जो मृत्यु पर विजय का प्रतीक है।

देवदूत प्रार्थना की तरह इसे भी दिन में तीन बार किया जाता है, प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या ताकि पूरे दिन को ख्रीस्त एवं माता मरियम को समर्पित किया जा सके।

एक धार्मिक परम्परा के रूप में यह पुरानी गीत छटवीं से दसवीं शताब्दी की हो सकती है, जबकि इसके प्रसार को 13वीं शताब्दी में दस्तावेज के रूप पाया गया है जब इसे फ्राँसिसकन दैनिक प्रार्थना में शामिल किया था। यह चार छोटे पदों से बना है जिनमें हरेक का अंत अल्लेलूया से होता है। इस प्रार्थना में विश्वासी मरियम को स्वर्ग की रानी सम्बोधित करते हैं कि वे पुनर्जीवित ख्रीस्त के साथ आनन्द मनायें।   

संत पापा फ्राँसिस ने 6 अप्रैल 2015 को ठीक स्वर्ग की रानी प्रार्थना के दौरान पास्का के दूसरे दिन बतलाया था कि इस प्रार्थना को करते समय हमारे हृदय में किस तरह का मनोभाव होना चाहिए।

...हम मरियम की ओर निहारें और उन्हें आनन्द मनाने का निमंत्रण दें क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने उन्हें गर्भ में धारण किया था वे अब जी उठे हैं जैसा कि उन्होंने प्रतिज्ञा की थी और हम उनकी मध्यस्थता द्वारा प्रार्थना करें। वास्तव में, हमारा आनन्द माता मरियम के आनन्द का प्रतिबिम्ब है क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने विश्वास के साथ येसु की देखभाल की और उनका लालन-पालन किया। अतः आइये, हम भी इस प्रार्थना को बाल-सुलभ मनोभाव से करें जो इसलिए प्रफूल्लित होते हैं क्योंकि उनकी माताएँ आनन्दित होते।"   

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