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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस   (Vatican Media)

देवदूत प्रार्थना: ख्रीस्तीयता है- सामीप्य, संबंध, देखभाल एवं आनन्द

पास्का के तीसरे रविवार को स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व संत पापा फ्राँसिस ने चिंतन किया कि ख्रीस्तीय होना कोई सिद्धांत अथवा नैतिक शिक्षा नहीं है, यह ईश्वर के साथ जीवित संबंध है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 18 अप्रैल 2021 (रेई)- संत पापा फ्राँसिस ने रविवार 18 अप्रैल को, वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में उपस्थित विश्वासियों के साथ स्वर्ग की रानी प्रार्थना का पाठ किया, जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, "अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।"

पास्का के इस तीसरे रविवार को, हम येरूसालेम लौटते हैं, ब्यारी की कोठरी में, एम्माउस के दो चेलों के समान, जिन्होंने बड़े विस्मय के साथ अपनी लम्बी यात्रा में येसु के वचनों को सुना और रोटी तोड़ते समय उन्हें पहचान लिया। (लूक. 24,35) अब ब्यारी की कोठरी में, पुनर्जीवित प्रभु शिष्यों के बीच उपस्थित हो गये एवं उनका अभिवादन किया, "तुम्हें शांति मिले।" ( 36). परन्तु वे विस्मित एवं भयभीत होकर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं, जैसा कि सुसमाचार कहता है। ( 37) तब येसु ने उन्हें अपने शरीर के घावों को दिखाते हुए कहा, "मेरे हाथों और पैरों, घावों को देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो।" (39) और उनका विश्वास जीतने के लिए उनसे खाने के लिए कुछ मांगते एवं उनके सामने खाते हैं। ( 41-42)

इस वर्णन में विस्तार से बतलाया गया है। सुसमाचार कहता है कि प्रेरित आनन्द के मारे विश्वास नहीं कर पा रहे थे। वे इतने खुश थे कि विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि यह सच था। दूसरा ब्यारा बतलाता है : वे विस्मित थे। ईश्वर से मुलाकात हमेशा विस्मित करता है, यह उत्साह, आनन्द से परे जाता, यह एक अलग तरह का अनुभव है। वे आनन्दित थे किन्तु उस आनन्द ने उन्हें सोचने के लिए प्रेरित किया, नहीं! यह सच नहीं है। यही ईश्वर की उपस्थिति का विस्मय है। संत पापा ने कहा, "इस मानसिक स्थिति को न भूलें जो अत्यन्त सुंदर है।"  

यह सुसमाचार पाठ तीन बहुत ही ठोस क्रियाओं से चिन्हित है जो कुछ हद तक हमारे व्यक्तिगत एवं सामुदायिक जीवन पर चिंतन करता है : देखना, स्पर्श करना एवं खाना। ये तीन क्रियाएँ जीवित येसु के साथ मुलाकात का आनन्द प्रदान कर सकते हैं।

देखना

येसु कहते हैं, "मेरे हाथों एवं पैरों को देखो"। देखना केवल नजर डालना नहीं है बल्कि उससे बढ़कर है, इरादा, चाह। यही कारण है कि यह एक प्रेम की क्रिया है। एक माता और एक पिता अपने बच्चे को देखते हैं, प्रेमी प्रेमिका एक-दूसरे को देखते हैं, एक अच्छा चिकित्सक रोगी को ध्यान पूर्वक देखता है...देखना, उदासीनता, दूसरों की कठिनाई एवं पीड़ा के सामने दूसरी ओर मूँह फेर लेने के प्रलोभन के खिलाफ पहला कदम है। संत पापा ने अपने आप पर गौर करने के लिए प्रेरित करते हुए कहा, "क्या मैं येसु पर नजर डालता हूँ अथवा उन्हें ध्यान से देखता हूँ?"

स्पर्श करना

दूसरी क्रिया है स्पर्श करना। शिष्यों को स्पर्श करने का निमंत्रण देना, यह साबित करना है कि वे कोई प्रेत नहीं हैं। "मुझे छूकर देखों", येसु उन्हें और हमें भी दिखलाते हैं कि उनके साथ एवं अपने भाई-बहनों के साथ हमारा संबंध "दूरी में" सिर्फ देखने के स्तर तक सीमित नहीं रह सकता। दूरी रखनेवाला ख्रीस्तीय नहीं है, देखने तक सीमित रहने वाला भी ख्रीस्तीय नहीं हो सकता। प्रेम सामीप्य, सम्पर्क, जीवन के आदान-प्रदान की मांग करता है। भला समारी उस व्यक्ति को केवल देखता नहीं रहा, जिसको उसने रास्ते पर अधमरा पाया था बल्कि रूका, झुका, उसके घावों में पट्टी बांधी, उसका स्पर्श किया, उसे अपने गद्धे पर बिठाया एवं अपने साथ सराय ले गया। येसु के साथ भी यही बात लागू होती है: उन्हें प्यार करने का अर्थ है उनके साथ जीवन की एकता, उनके साथ संयुक्त होना।    

खाना

तीसरी क्रिया खाना, है जो स्पष्ट रूप से हमारे मानवता को इसके सबसे स्वभाविक रूप में प्रस्तुत करता है, यह जीने के लिए पोषित किये जाने की आवश्यकता है। जब हम एक साथ, परिवार में या मित्रों से मिलकर खाते हैं तब यह भी एक प्रेम, एकता एवं उत्सव की अभिव्यक्ति है...सुसमाचार कितनी बार दिखाता है कि येसु इस आनन्दमय आयाम को जीते हैं, जी उठने के बाद भी वे अपने शिष्यों के साथ ऐसा करते हैं। इस तरह य़ूखरिस्तीय भोज ख्रीस्तीय समुदाय का एक प्रतीक बन गया है। ख्रीस्त के शरीर को एक साथ खाना यही ख्रीस्तीय जीवन का केंद्र है।  

संत पापा ने कहा कि यह सुसमाचार पाठ दिखलाता है कि येसु कोई प्रेत नहीं हैं बल्कि एक जीवित व्यक्ति हैं, येसु जब हमारे निकट आते हैं वे हमें इतने आनन्द से भर देते हैं कि हम विश्वास ही नहीं कर पाते, वे हमें विस्मित कर देते हैं। ऐसा विस्मिय सिर्फ येसु की उपस्थिति में महसूस किया जा सकता है क्योंकि येसु एक जीवित व्यक्ति हैं।

ख्रीस्तीय होना सबसे बढ़कर कोई सिद्धांत अथवा नैतिक विचार नहीं है बल्कि उनके साथ एक जीवित संबंध है, पुनर्जीवित प्रभु के द्वारा हम, उन्हें देखते, उनका स्पर्श करते एवं पोषित होते हैं और उनके प्रेम से परिवर्तित होकर दूसरे भाई-बहनों को देखते, उनका स्पर्श करते और पोषित करते हैं। धन्य कुँवारी मरियम हमें इस अनुभव को जीने की कृपा प्रदान करे।

स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व संत पापा का संदेश
18 April 2021, 13:28

दूत-संवाद की प्रार्थना एक ऐसी प्रार्थना है जिसको शरीरधारण के रहस्य की स्मृति में दिन में तीन बार की जाती है : सुबह 6.00 बजे, मध्याह्न एवं संध्या 6.00 बजे, और इस समय देवदूत प्रार्थना की घंटी बजायी जाती है। दूत-संवाद शब्द "प्रभु के दूत ने मरियम को संदेश दिया" से आता है जिसमें तीन छोटे पाठ होते हैं जो प्रभु येसु के शरीरधारण पर प्रकाश डालते हैं और साथ ही साथ तीन प्रणाम मरियम की विन्ती दुहरायी जाती है।

यह प्रार्थना संत पापा द्वारा रविवारों एवं महापर्वों के अवसरों पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में किया जाता है। देवदूत प्रार्थना के पूर्व संत पापा एक छोटा संदेश प्रस्तुत करते हैं जो उस दिन के पाठ पर आधारित होता है, जिसके बाद वे तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हैं। पास्का से लेकर पेंतेकोस्त तक देवदूत प्रार्थना के स्थान पर "स्वर्ग की रानी" प्रार्थना की जाती है जो येसु ख्रीस्त के पुनरूत्थान की यादगारी में की जाने वाली प्रार्थना है। इसके अंत में "पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा की महिमा हो..." तीन बार की जाती है।

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