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संत घोषणा समारोह संत घोषणा समारोह  (ANSA)

पोप ने स्कालाब्रिनियों के संस्थापक एवं सलेशियन ब्रादर की संत घोषणा की

संत पापा फ्राँसिस ने रविवार को धर्माध्यक्ष जोवन्नी बत्तिस्ता स्कालाब्रिनी और आर्तेमिदे जात्ती की संत घोषणा की तथा याद दिलाया कि इन दोनों संतों ने किस तरह समावेशी कलीसिया का आदर्श जीवन जीया, और विश्वासियों को प्रोत्साहन दिया कि वे अपने जीवन एवं ईश्वर की उपस्थिति के लिए दीनतापूर्वक ईश्वर को अपनी कृतज्ञता प्रकट करना सीखें।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 9 अक्तूबर 2022 (रेई)- संत पापा फ्राँसिस ने रविवार 9 अक्टूबर को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में धन्य अर्तेमिदे ज़ात्ती और धन्य जोवन्नी बत्तिस्ता स्कालाब्रिनी की संत घोषणा के समारोह का अनुष्ठान किया।

संत घोषणा समारोह के लिए अर्पित मिस्सा बलिदान में सुसमाचार पाठ पर चिंतन करते हुए उपदेश में संत पापा ने कहा, "जब येसु यात्रा कर रहे थे, दस कोढ़ी उनके पास आये और ऊँचे स्वर से बोले : 'हम पर दया कीजिए।'"(लूक.17,13) उसके बाद दसों कोढ़ी निरोग हो गये किन्तु सिर्फ एक कोढ़ी येसु को धन्यवाद देने लौटा। वह समारी था, एक प्रकार से विधर्मी समझा जानेवाला। शुरू में वे सभी एक साथ चल रहे थे, फिर भी समारी दूसरों को छोड़ दिया और "ऊँचे स्वर से प्रभु की स्तुति करते हुए लौटा।"[ Photo Embed: संत पेत्रुस महागिरजाघर का प्राँगण]

संत पापा ने चिंतन हेतु प्रेरित करते हुए कहा, "आइये हम कुछ देर रूके और आज के सुसमाचार के इन दो आयामों पर चिंतन करें : एक साथ चलना और धन्यवाद देना।

एक साथ चलने का महत्व

शुरू में समारी और अन्य नौ की संख्या में कोई अंतर नहीं था। हम केवल कोढ़ियों के बारे सुनते हैं, जो एक दल के रूप में येसु के पास आते हैं। जैसा कि हम जानते हैं, कुष्ठ रोग न केवल एक शारीरिक बीमारी थी, जिसे आज भी खत्म करने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए, बल्कि एक "सामाजिक रोग" भी है, क्योंकि उन दिनों, संक्रमण के डर से, कोढ़ियों को समुदाय से दूर रहना पड़ता था। हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि समारी यद्यपि एक विधर्मी व्यक्ति माना जाता था फिर भी उस दल का हिस्सा था। संत पापा ने कहा कि जब कभी बीमारी और दुर्बलताओं को एक समान सामना किया जाता है तो घेरे गिर जाते हैं और बहिष्कार समाप्त हो जाता है।   

यह छवि हमारे लिए भी अर्थपूर्ण है कि जब हम अपने आप के प्रति ईमानदार होते हैं, तो हम महसूस करते है कि अपने दिल में हम सभी बीमार हैं, सभी पापी हैं जिन्हें पिता की करुणा की आवश्यकता है। इसलिए यदि हम योग्यता, सामाजिक प्रतिष्ठा या अन्य सतही मानदंड के द्वारा विभाजन उत्पन्न करना छोड़ेंगे तो हमारे आंतरिक घेरे और पूर्वाग्रह भी ध्वस्त हो जायेंगे। और अंत में, हम महसूस करेंगे कि हम सभी भाई-  बहन हैं।

संत अर्तेमिदे जात्ती
संत अर्तेमिदे जात्ती

पहले पाठ में नामान भी हमें याद दिलाते हैं कि अपनी सारी सम्पति और सामर्थ्य के बावजूद वह नदी में स्नान करने से ही चंगाई प्राप्त किया, जहाँ सभी स्नान करते थे। इसके लिए उसने सबसे पहले अपने कवच और वस्त्र हटाये। (2 राजा 5) संत पापा ने कहा कि जब हम यह सोचकर कि हम दुर्बल हैं और हमें चंगाई की आवश्यकता है    अपने बाह्य कवच, सुरक्षा के घेरे को हटायेंगे एवं विनम्रता से नहायेंगे, तब महसूस करेंगे कि हम सभी भाई-बहन हैं। हम इस बात को भी याद रखें, ख्रीस्तीय विश्वास हमें कभी अकेले नहीं बल्कि हमेशा दूसरों के साथ चलने के लिए कहता है। विश्वास हमें अपने आप से बाहर निकलकर ईश्वर की ओर और भाई बहनों की ओर बढ़ने के लिए कहता है, अपने आप में बंद रहने के लिए नहीं। विश्वास हमें लगातार यह जानने का निमंत्रण देता है कि हमें चंगाई की जरूरत है। हमारे निकट के लोगों की दुर्बलताओं को साझा करना है, खुद को उनसे बेहतर समझे बिना।  

संत पापा ने चिंतन हेतु प्रेरित करते हुए कहा, "आइये हम चिंतन करें और देखें कि क्या हमारा जीवन, हमारा परिवार, कार्य स्थल जहाँ हम रोज काम करते हैं और अपना समय व्यतीत करते, क्या हम दूसरों के साथ मिलकर चल सकते हैं, उन्हें सुन सकते हैं, क्या हम अपने आपमें बंद होने के प्रलोभन से बच पाते हैं, सिर्फ अपनी आवश्यकताओं के बारे सोचने से। एक साथ चलना, सिनॉडल होना, कलीसिया की बुलाहट है। हम अपने आप से पूछे कि क्या हम सचमुच ऐसे समुदाय का निर्माण करते हैं जो सभी के लिए खुला और समावेशी हो। यदि हम सुसमाचार की सेवा में पुरोहित और लोकधर्मी के रूप में सहयोग करते हैं और यदि हम केवल शब्दों से नहीं बल्कि ठोस हावभाव द्वारा अपने नजदीक एवं दूर के लोगों का स्वागत करते और जीवन के उतार-चढ़ाव से घिरे लोगों के लिए खुले होते हैं तो क्या हम उन्हें समुदाय का एहसास दिलाते हैं अथवा क्या हम उन्हें छोड़ देते हैं?

संत जोवन्नी बत्तिस्ता स्कालाब्रिनी
संत जोवन्नी बत्तिस्ता स्कालाब्रिनी

संत पापा ने खेद प्रकट करते हुए कहा, "मुझे दुःख है जब ख्रीस्तीय समुदाय को देखता हूँ जो दुनिया को भले और बुरे, संत और पापी के रूप में बाटते हैं, यह उन्हें खुद को दूरों से बेहतर महसूस कराता है और वे ऐसे बहुत सारे लोगों को वंचित कर देते जिनका ईश्वर आलिंगन करना चाहते। उन्होंने कहा, "कृपया कलीसिया और समाज में, हमेशा समावेशी रहें: जो अभी भी कई प्रकार की असमानता के साथ है और हाशिए पर है।

ईश्वर को धन्यवाद देने सीखना

दस कोढ़ियों के दल में सिर्फ एक व्यक्ति था जिसने महसूस किया कि वह चंगा हो गया है, वह ईश्वर की स्तुति करने लौटा और येसु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त किया। बाकी नौ भी चंगे हुए थे लेकिन वे अपने रास्ते पर आगे बढ़ गये, और जिसने उन्हें चंगा किया था वे उन्हें भूल गये। दूसरी ओर समारी, प्राप्त वरदान को अपनी नई यात्रा का पहला कदम बनाता है। वह अपने चंगाईदाता के पास लौटता है, वह येसु को और अधिक जानने के लिए उसके पास जाता है, और प्रभु के साथ संबंध स्थापित करता है। इस तरह उसकी कृतज्ञता की भावना सिर्फ औपचारिकता नहीं थी लेकिन धन्यवाद ज्ञापन की यात्रा की शुरूआत थी। वह येसु के पैरों पर गिरा और उनकी आराधना की। उसने स्वीकार किया कि येसु ही स्वामी हैं और येसु प्राप्त चंगाई से बढ़कर हैं।

यह हमारे लिए एक महान शिक्षा है, जो ईश्वर के वरदानों के हर रोज प्राप्त करते हैं, फिर भी कई बार अपने रास्ते आगे बढ़ जाते एवं उनके साथ सच्चा संबंध स्थापित करने से चूक जाते हैं। यह एक बुरी आध्यात्मिक बीमारी है, हम सब कुछ को हल्के में लेते, विश्वास और ईश्वर के साथ हमारे संबंध को भी, हम उस हद तक पहुँच जाते कि  ऐसे ख्रीस्तीय बन जाते जो प्रभु के चमत्कारों पर आश्चर्य नहीं कर पाती या धन्यवाद नहीं देता और प्रभु के महान कार्यों को देख भी नहीं पाता। हम यह सोच बैठते हैं कि हम जो वरदान हर दिन प्राप्त करते हैं वे स्वाभाविक हैं और हमारे कारण हैं। कृतज्ञता जो धन्यवाद देने की क्षमता है, हमें ईश्वर की उपस्थिति के लिए उनकी स्तुति कराती है जो प्रेम हैं। हमें दूसरों के महत्व को स्वीकार करने, असंतुष्टि एवं उदासीनता से ऊपर उठने में मदद देती है जो हृदय को कुरूप कर देते। "धन्यवाद" कहने जानना बहुत आवश्यक है। हर दिन प्रभु को और एक दूसरे को धन्यवाद देना। हमारे परिवारों में हम कई छोटे उपहार प्राप्त करते हैं और कई बार हम इसके बारे सोचते तक नहीं।

उन स्थानों को जहां में अपना दिन गुजारता, उन सेवाओं को जिनका हम आनन्द उठाते और उन सभी लोगों को जो हमारा समर्थन करते हैं। हमारे ख्रीस्तीय समुदाय में ईश्वर का प्रेम जिसको हम अपने भाई-बहनों के सामीप्य में जो अक्सर चुपचाप हमारे लिए प्रार्थना करते, त्याग करते, कष्ट उठाते एवं हमारे साथ चलते हैं। अतः हम इस मूल शब्द "धन्यवाद" को न भूलें।

नये संतों का तस्वीर दिखाते विश्वासीगण
नये संतों का तस्वीर दिखाते विश्वासीगण

विश्वास के दो पवित्र व्यक्ति

संत पापा ने नये संतों का उदाहण प्रस्तुत करते हुए कहा, "दो संत जिनकी संत घोषणा आज हुई हमें एक साथ चलने और धन्यवाद देने के महत्व की याद दिलाते हैं। विशप स्कालाब्रिनी, जिन्होंने आप्रवासियों की देखभाल के लिए एक धर्मसमाज की स्थापना की, कहा करते थे कि आप्रवासियों के साथ साझा यात्रा में हम न केवल समस्याओं को देखते बल्कि ईश्वर की योजना को देखते हैं। उनके शब्दों में : खासकर इसलिए क्योंकि  अत्याचारों के द्वारा थोपे गये आप्रवासन के कारण, कलीसिया येरूसालेम और इस्राएल से परे गई और काथलिक (विश्वव्यापी) बन गई, हमारे समय के आप्रवासन के कारण कलीसिया शांति और लोगों के बीच एकता का साधन बनेगी।”

अपने महान दर्शन के साथ स्कालाब्रीनी ने दुनिया और कलीसिया को बिना घेरे के देखा, जहाँ कोई भी विदेशी नहीं था। सालेशियन ब्रादर आर्तेमिदे जात्ती कृतज्ञता के एक जीवित उदाहरण थे। क्षय के रोग से चंगा होने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा के लिए अर्पित किया। रोगियों की देखभाल कोमल स्नेह से किया। कहा जाता है कि उन्होंने एक बीमार व्यक्ति को शव को अपने कंधे पर उठाया। जो कुछ पाये उसके लिए कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु दूसरों के घावों को अपने ऊपर लेकर वे "धन्यवाद" कहना चाहते थे।

संत पापा ने विश्वासियों का आह्वान करते हुए कहा, "आइये हम प्रार्थना करें कि ये संत, हमारे भाई, हमें विभाजन की दीवारों के बिना एक साथ चलने तथा हृदय की सौम्यता अर्थात् कृतज्ञता की भावना प्राप्त करने में मदद दें जो ईश्वर को बहुत प्रिय है।  

नये संतों का तस्वीर दिखाते विश्वासीगण
नये संतों का तस्वीर दिखाते विश्वासीगण

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09 October 2022, 15:28