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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

पृथ्वी के फलों को साझा करें, संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर कोरोना महामारी से उत्पन्न समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उनके समाधान सुझाये।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 19 अगस्त 2020 (रेई)- संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभी लोगों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

कोरोना महामारी और समाज में इसके प्रभाव के कारण बहुत से लोग आशा खोने की जोखिम में हैं। अनिश्चितता और चिंता की इस स्थिति में मैं आप सभी को आशा में बने रहने हेतु निमंत्रण देता हूँ जो येसु ख्रीस्त की ओर से हमारे लिए आती है। ये वे हैं जो हमें अपने जीवन की कठिन परिस्थिति, बीमारी, मौत और अन्याय के तूफानों से होकर गुजरने हेतु मदद करते हैं यद्यपि ये सारी चीजें हमारे जीवन के अंतिम लक्ष्य हेतु बाधक नहीं होती हैं।

महामारी का प्रभाव

महामारी ने सामाजिक जीवन की कठिनाइयों को और भी बढ़ा दिया है, खासकर, असमानता को। हम में से कुछेक हैं जो अपने घरों से कार्य करने में सक्षम हैं जबकि दूसरे बहुत सारे लोग हैं जिनके लिए यह असंभंव है। कुछ बच्चे, इन मुसीबतों के बावजूद अपनी शिक्षा को सुचारू रुप से जारी रखने में सफल हैं तो वहीं यह बहुतों के लिए बाधा उत्पन्न कर रही है। कुछ सक्षम देश अपनी आर्थिक सबलता के कारण आपातकालीन स्थिति का सामना करने में सक्षम हैं, वहीं दूसरे देशों को अपने लोगों के हितों के लिए भविष्य को गिरवी रखने के समान है।

असमानता की ये सारी निशानियां हमारे लिए सामाजिक बीमारी को व्यक्त करती है जो अर्थव्यवस्था से उत्पन्न होनेवाले एक वायरस को दिखलाती है। यह असमान आर्थिक व्यवस्था का प्रतिफल है जो मानवीय मूल्यों को अनदेखी करता है। आज की दुनिया में कुछेक धनवान हैं जो मानवता की आधी से अधिक संपति के मालिक हैं। यह अन्याय आकाश की ओर पुकारती है। वही अर्थव्यवस्था का यह स्वरुप हमारे सामान्य घर की क्षति के प्रति उदासीन बनी रहती है। हम अपनी पृथ्वी के संदर्भ में अपनी सीमाओं को लांघने की स्थिति में हैं जो हमारे लिए गंभीर परिणाम- जैव विविधता को क्षति, जलवायु परिवर्तन से समुद्री तल की बढ़ोत्तरी और उष्णकटिबंधीय जंगलों का विनाश कर सकते हैं।

सामाजिक असमानता और पर्यावरणीय गिरावट

सामाजिक असमानता और पर्यावरणीय गिरावट एक साथ चलती है और इसकी जड़ें एक ही हैं (लौदातो सी 101) यह पृथ्वी और ईश्वर के विरूद्ध अपराध है क्योंकि हम अपने भाई-बहनों और सृष्टि को अपने अधीन में करने की चाह रखते हैं।

“सृष्टि के शुरू में ईश्वर ने पृथ्वी और इसमें व्याप्त सारी धन संपति को मानव की भलाई हेतु प्रदान किया जिससे हम इसकी देख-रेख कर सकें (सीसीसी 2402)।” ईश्वर ने हमें बुलाया है जिससे हम उनके नाम पर सृष्टि में खेती-बारी करते हुए इसकी देख-रेख, एक वाटिका के रुप में कर सकें। (उत्पि.1.28)। “खेती-बारी का तात्पर्य उत्पादन के कार्य करना है। वहीं इसकी देख-रेख करने का अर्थ इसकी सुरक्षा, रख-रखाव करना है। हमें यहाँ ध्यान देने की जरुरत है कि हम इसे बैंक कार्ड की भांति उपयोग न करें कि हम पृथ्वी से जो चाहें कर सकते हैं। यह हमें उत्तरदायी होते हुए एक-दूसरे के संग एक उचित पारस्परिक संबंध स्थापित करने की बात कहती है। हम सृष्टि से पाते और बदले में हमें इसे वापस देने की जरुरत है। हर समुदाय अपनी जीविका हेतु जरुरत के अऩुसार पृथ्वी से चीजों को प्राप्त कर सकता है लेकिन उसकी रक्षा करना भी जरुरी है।

पृथ्वी के फलों के हकदार सभी हों

वास्तव में, पृथ्वी हमसे पहले थी और यह हमारे लिए दी गई है, “यह पूरी मानव जाति के लिए दी गई है।” (सीसीसी 2402)। इसीलिए हमारा कर्तव्य है कि इससे मिलने वाले फलों के हकदार सभी हों न कि केवल कुछेक। यह हमारी पृथ्वी की चीजों से हमारे संबंध का एक मूलभूत आधार है। द्वितीय वाटिकन महासभा के धर्माध्यक्षों ने इस विषय पर याद दिलाते हुए कहा है मनुष्य पृथ्वी की वस्तुओं का सम्मान करें जिसे वह अपने अधिकार में करता है और उसका उपयोग न केवल अपने लिए वरन् दूसरों के लाभ हेतु भी करें (गैदियुम एत स्पेस,69)। वास्तव में, किसी भी संपत्ति का स्वामित्व उसके धारक को ईश्वर का सेवक बनाता है, वह उसे फलदायी बनाने और दूसरों को लाभान्वित करने हेतु कार्य करता है (सीसीसी. 2404)। हम उपहारों से स्वामी नहीं वरन प्रबंधक हैं। ईश्वरीय उपहार हमारे स्वार्थ पूर्ति हेतु नहीं हैं।

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि हम अपने में जिन चीजों को धारण करते हैं उसके द्वारा समुदाय की भलाई होनी चाहिए, “राजनीति अधिकारियों को यह अधिकार है कि वे नौतिक रुप से स्वामित्व के अधिकारों हेतु नियमों को निर्धारित करें जिससे सबों की भलाई हो सके।” व्यक्तिगत संपति का स्वामित्व सार्वभौमिक हित में, एक सामाजिक स्वर्णिम नियम है, यह पूरे नैतिक और सामाजिक व्यवस्था का पहला सिद्धांत है (लौदातो सी, (93)।

संपति का सदुपयोग

संपति और पैसा हमारे लिए वे माध्यम हैं जिनके द्वारा प्रेरितिक कार्य किये जा सकते हैं। यद्यपि हम उन्हें व्यक्तिगत या सामुदायिक रुप में अपने जीवन का लक्ष्य मान लेते हैं और जब ऐसा होता है तो मानवीय मूल्य प्रभावित होते हैं। होमो सेपियन्स विकृत होकर होमो इकोनोमिकस की एक प्रजाति बन जाती है अर्थात् हम मानव से आर्थिक मानव में परिवर्तत हो जाते जो हमें विकृत रुप में व्यक्तिवाद, जोड़-घटाव और वर्चस्व तक सीमित कर देता है। हम इस तथ्य को भूल जाते की हम ईश्वर के प्रतिरुप बनाये गये हैं हममें समाज में, एकजुट रहते हुए प्रेम करने की योग्यता है। मानव के रुप में, पृथ्वी के सभी प्राणियों की अपेक्षा हम अपने में सहयोगिता और सामुदायिकता स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।

जब धन और संपति अर्जित करने की इच्छा प्रबल हो जाती है, जब अर्थव्यवस्था और तकनीकी असमानाता इस हद तक पहुंच जाती है जो सामाजिक ताने-बाने को तोड़ देते हैं, और जब हमारी स्वतंत्रता असीमित वस्तुओं के विकास और वहन में टिक जाती है तो हम सामान्य घर को हानि पहुंचाते हैं, जिसे हम चुपचाप देख और सहन नहीं कर सकते हैं। यह अपने में दुखदायी होता है। जब हमारी निगाहें येसु ख्रीस्त की ओर टिकी होती हैं और जब हम अपने समुदाय को उनके प्रेम से प्रेरित होने देते तो हमें एक साथ मिल कर पहल करने की जरुरत है, जिससे हम आशा में कुछ अलग और बेहतर कर सकें। ख्रीस्तीय आशा ईश्वर में स्थापित है जो हमारा सहारा है। यह हमें अपने को साझा करने, प्रेरिताई को सुदृढ़ बनाने जैसा कि येसु ख्रीस्त के शिष्यों ने हम सभी के लिया किया, हमें उत्प्रेरित करता है।

21वीं सदी का ख्रीस्तीय समुदाय  

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय ने इस बात को समझा। वे हमारी तरह कठिन दौर से होकर गुजरे। अपनी सतर्कता में उन्होंने अपने को एक हृदय और एक प्राण बनाते हुए सारी चीजों को अपने बीच साझा करते हुए ख्रीस्त का साक्ष्य दिया। हम महामारी के एक कठिन समय में हैं। इस महामारी ने हमें कठिनाई में डाल दिया है लेकिन हम याद करें कि हम संकट से बेहतर तरीके से बाहर आ आते हैं या बुरे तरीके से। यह हमारा विकल्प है। क्या महामारी के उपरांत आर्थिक, सामाजिक अन्याय और पर्यावरण की देख-रेख, हमारे सामान्य घर सृष्टि की मुश्किलें ऐसी ही रहेंगीॽ हम इस पर विचार करें। 21वीं सदी के ख्रीस्तीय समुदाय को इस सच्चाई से रुबरु होना चाहिए कि अन्याय और सामाजिक अन्याय एक साथ चलते हैं जिससे हम पुनर्जीवित येसु ख्रीस्त का साक्ष्य दे सकें। यदि हम उन चीजों का ध्यान रखते हैं जिसे ईश्वर ने हमें दिया है, यदि हम उनका उपयोग इस भांति करते कि इसकी कमी किसी को नहीं होती,  तो हम वास्तव में एक अधिक स्वस्थ और समानता की दुनिया के जन्म लेने की आशा कर सकते हैं। संत पापा ने बच्चों की चिंता करते हुए कहा कि हम उन आकड़ों को देखें जहाँ हम धन के असमान वितरण के कारण बच्चों को भूखे मरते देखते, उन्हें स्कूलों से वंचित पाते हैं। यह दृश्य हमें महामारी के उपरांत बेहतर विकल्प हेतु प्रेरित करे।

इतना कहने के बाद संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

26 August 2020, 13:41