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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा फ्राँसिस आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

विश्व के गरीब हमारे विकल्प, संत पापा

संत पापा ने आमदर्शन समारोह में धर्मशिक्षा देते हुए येसु की प्रेरिताई के क्रेन्द-बिन्दु की ओर ध्यान इंगित कराया और गरीबों को हमारा विकल्प कहा।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 19 अगस्त 2020 (रेई)- संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभी लोगों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

वर्तमान महामारी ने गरीबों की दुर्दशा और दुनिया में व्याप्त वृहद असमानता की स्थिति का पर्दाफाश किया है। वहीं यह वायरस बिना किसी भेदभाव के सबों को अपनी चपेट में लेते हुए व्यापक स्तर पर विश्व को प्रभावित किया है।

इस भांति इस महामारी के संदर्भ में हम दो प्रत्युत्तर को पाते हैं। एक ओर यह हमें छोटे लेकिन खतरनाक वायरस से जरूरी बचाव हेतु खोज को प्रेरित करता है जिसके सामने सारी दुनिया घुटने टेकती हुई नजर आती है। वहीं दूसरी ओर हम दुनिया में व्याप्त बड़े वायरस जैसे कि सामाजिक अन्याय, अवसरों की असमानता, गरीबी और अति कमजोरों की सुरक्षा के अभाव हेतु जरूरी कार्य करने को कृतसंकल्प हैं। सुसमाचार के आधार पर इस द्विपक्षीय चंगाई में हम गरीबों के लिए एक विकल्प को पाते हैं (एभेंजेल्ली गैदियुम,195)। संत पापा ने कहा कि यह राजनीतिक विकल्प नहीं, न ही कोई आदर्श विकल्प और न ही किसी दल के विकल्प से सबंधित है। गरीबों हेतु विकल्प सुसमाचार के हृदय का केन्द्र-बिन्दु है। इसे सर्वप्रथम येसु ख्रीस्त ने पूरा किया जैसे कि हम कुरिंथियों के नाम संत पौलुस के पत्र में सुनते हैं, वे धनी थे लेकिन हमारे लिए गरीब बनें। वे हमारी तरह बने और इसी तथ्य को सुसमाचार गरीबों के लिए विकल्प स्वरुप प्रस्तुत करता है, जिसे स्वयं येसु ख्रीस्त घोषित करते हैं।

गरीब, प्रेरिताई के क्रेन्द-बिन्दु

येसु ख्रीस्त, ईश्वर थे लेकिन उन्होंने हमारे खातिर मानव स्वभाव धारण किया, उन्होंने हमारे लिए एक सेवक का रुप धारण किया (फिली.2.6-7)। वे एक दीन परिवार में जन्मे और बढ़ई का कार्य किया। अपनी शिक्षा के प्रथम चरण में उन्होंने इस बात की घोषणा की कि स्वर्ग राज्य में द्ररिद धन्य हैं (मती.5.3, लूका. 6.20, ए जी. 197)। वे बीमारों, गरीबों और परित्यक्त लोगों के मध्य खड़े होकर उन्हें ईश्वरीय करुणामय प्रेम प्रदर्शित किया (सीसीसी. 2444)। अपने इन कार्यों हेतु उन्हें कई बार टीका-टिप्पणी का शिकार होना पड़ा। गरीबों के निकट रहने के कारण उन्होंने अपने जीवन को जोखिम में डाल दिया।

संत पापा ने कहा कि यही कारण है कि येसु ख्रीस्त के अनुयायी अपने को गरीबों के निकट रखते, वे दीन-हीनों, बीमारों और कैदियों के पास जाते, उनके साथ रहते जो परित्यक्त और भूला दिये गये हैं, वे जो बिना अन्न-जल और फटेहाली में जीवन व्यतीत करते हैं (मती.25.31-36, सीसीसी, 2443)। उन्होंने कहा कि हम संत मत्ती के सुसमाचार अध्याय 25 को पढ़ सकते हैं जिसके अनुसार हमारा न्याय किया जायेगा। सच्ची ख्रीस्तीयता का मुख्य मापदंड यही है (गला.2.10, ए.जी. 195)। कुछ लोग अपने में यह गलत धारणा रखते हैं कि गरीबों हेतु विकल्प कुछेक लोगों के कार्य है लेकिन वास्तव में यह सम्पूर्ण कलीसिया का प्रेरितिक कार्य है (संत पापा जोन पौल द्वितीय, सोल्लीचीतूदो रेई सोचालीस,42)।“हर एक ख्रीस्तीय और हर एक समुदाय गरीब समाज की मुक्ति हेतु ईश्वरीय साधन बनने हेतु बुलाया गया है” (एजी,187)।

विश्वास, भरोसा और प्रेम

विश्वास, भरोसा और प्रेम हमें जरूरमंदों की सेवा हेतु आवश्यक रुप से उत्प्रेरित करता है जो जरूरी सेवा कार्य से परे हैं (एजी. 198) वास्तव में, इसका अर्थ एक साथ चलना है, अपने को उनके द्वारा सुसमाचार की घोषणा करने देना है, जो ख्रीस्त के दुःखों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, हम उनकी मुक्ति की कामना का एहसास करें, विवेक और सजनात्मकता से अपने को “प्रभावित” होने दें। गरीबों के संग अपना जीवन साझा करना, समृद्धि का आदान-प्रदान करना है और यदि कोई बुरी सामाजिक संरचना जो उन्हें अच्छे भविष्य हेतु सपने देखने से रोकती है तो हमें एक साथ मिलकर उन्हें दूर करने, उन्हें बदलने हेतु कार्य करना है। हम ईश्वर के प्रेम से प्रेरित होकर ऐसा करने हेतु सबल बनते हैं क्योंकि उन्होंने हमें अपार प्रेम किया है।(यो.13.1) परिधि को क्रेन्द-बिन्दु बनाने का अर्थ हमारे जीवन को ख्रीस्त में केंद्रित करना है, जिन्होंने “अपने को गरीब बनाया” जिससे हम “उनकी गरीबी” द्वारा अपने को धनी बना सकें (2 कुरू.8.9)।

समाज के विषक्त होने का कारण

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि हम सभी महामारी के सामाजिक परिणामों को लेकर चिंतित हैं। बहुत से लोग सामान्य जीवन में लौटते हुए अपने आर्थिक कार्यों को शुरू करना चाहते हैं। लेकिन यह “सामान्य जीवन” सामाजिक अन्याय और पर्यावरण के विघटन को अपने में सम्माहित न करे। महामारी अपने में एक समस्या है जो अपने में अच्छाई या बुराई लेकर आती है। हम अपने में अच्छाई को लाये और सामाजिक अन्याय और पर्यावरण के विघटन में सुधार लायें। आज हमारे लिए कुछ अलग करने के अवसर हैं। उदाहरण के लिए हम गरीबों के लिए एक समग्र अर्थव्यवस्था का विकास कर सकते हैं न कि कल्याणवादी। संत पापा ने इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि मैं कल्याण के कार्य को नहीं नकारता, वे हमारे लिए जरुरी हैं। लेकिन हमें इसके परे जाते हुए मुसीबतों को सुलझाने की जरुरत है जो हमें कल्याण के कार्य हेतु ढकेल देते हैं।

उन्होंने कहा कि एक अर्थव्यवस्था जो समस्याओं का समाधान नहीं ढ़ूंढ़ती वास्तव में वह समाज को विषक्त बना देती है जैसे कि लाभ जो सम्मानजनक कार्यों को जन्म नहीं देता है। इस तरह के लाभ सच्ची अर्थव्यवस्था से जुड़े नहीं होते हैं जो जन सामान्य लोगों को लाभ पहुंचाते हों (लौदातो सी, 109), साथ ही कई बार वे सामान्य घर को हुई क्षति के प्रति उदासीन रहते हैं। गरीबों के लिए विकल्प, यह सामाजिक-नैतिकता है जो ईश्वरीय प्रेम से आता है (एलियस 158), जिसके फलस्वरूप हम गरीबों को ध्यान में रखते हुए अर्थव्यवस्था का स्वरुप तैयार करते और उसे केंन्द में रखते हैं। यह हमें इसके लिए भी प्रोत्सहित करता है कि हम वायरस की रोकथाम हेतु सबसे अधिक जरुरमंदों को ख्याल में रखते हुए अपनी योजनाओं को तैयार करते हैं। यह हमारे लिए कितना दुःखदायी होगा कि कोविड-19 वैक्सीन सबसे धनी लोगों को दिया जाये। यह कितनी अपमानजनक बात होगी यदि वैक्सीन विश्व और सभी लोगों के लिए उपलब्ध होने के बदले केवल धनी देशों तक ही सीमित होकर रह जाये। यह हमारे लिए कितनी अपमानजनक बात होगी यदि सभी आर्थिक सहायता जिसे हम देख रहे हैं- जो लोगों के पैसे हैं- उत्पादन के उस क्षेत्र में खपत हो जायें जो गरीबों को अपने में शामिल नहीं करते हैं, जो सामान्य घर या सृष्टि की परवाह नहीं करते हैं। संत पापा फ्रांसिस ने चार विकल्पों को प्रस्तुत किया जहाँ हमें सहायता देने की जरुरत है, वे जो परित्यक्तों को अपने में शामिल करते, जो निचले तबके के लोगों के विकास का कार्य करते, वे जो जन सामान्य की भलाई सोचते और जो सृष्टि की चिंता करते हैं।

महामारी से छुटकारा पाने का उपाय

यदि यह वायरस गरीबों और सबसे कमजोर लोगों के लिए विश्व को अधिक अन्यायपूर्ण बना देगा, तो हमें इस दुनिया को बदलना होगा। येसु के उदाहरण को देखें जो पूर्ण दिव्य प्रेम के चिकित्सक हैं यानी वे हमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक चंगाई प्रदान करते हैं। (यो. 5,6-9) जिस तरह येसु चंगाई प्रदान करते थे वैसा अब हमें करना है, महामारी से चंगाई लाना है। सूक्ष्म अदृश्य तथा बड़े एवं दृश्यमान सामाजिक अन्याय के वायरस से चंगाई पाना है। संत पापा ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि इसकी शुरूआत ईश्वर के प्रेम से, सुदूर गाँवों पर ध्यान केंद्रित करने तथा पिछले लोगों को पहला स्थान देने के द्वारा हो। हम उस मापदण्ड को न भूलें जिससे हमारा न्याय किया जाएगा (मती. 25)”। महामारी से छुटकारा पाने के लिए हम इसका अभ्यास करें। इस ठोस प्रेम, आशा और विश्वास में सुदृढ़ रहकर शुरू करने के द्वारा एक स्वस्थ विश्व का निर्माण सम्भव है किन्तु इसके विपरीत जाने पर हम अधिक बड़े संकट में फंस जायेंगे।

संत पापा ने धर्मशिक्षा के अंत में प्रार्थना करते हुए कहा, “प्रभु हमें बेहतर कर पाने में मदद दे, हमें शक्ति दे कि हम आज के विश्व की जरूरतों के लिए प्रत्युत्तर दे सकें”।  

19 August 2020, 14:19