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संत पापा फ्रांसिस की 6वीं वर्षगांठ संत पापा फ्रांसिस की 6वीं वर्षगांठ 

संत पापा की 6वीं सालगिराह

संत पेत्रुस के सिंहासन के उत्तराधिकारी, काथलिक कालीसिया के महाधर्मगुरू संत पापा फ्रांसिस द्वारा पूरे किये गये 6 वर्षीय कार्यकाल में उनकी आध्यात्मिकता का पुनरवलोकन हमें ख्रीस्त के जीवन को केन्द्र-बिन्दु बनाते हुए, दैनिक जीवन में प्रार्थना की शक्ति से मरियम के विश्वासनीय आयाम को पुष्ट कराता है।

दिलीप संजय  एक्का-वाटिकन सिटी

अमेरीकी महादेश के प्रथम येसु समाजी परमाधिकारी संत पापा फ्रांसिस जिन्होंने ने अस्सीसी के निर्धन संत फ्रांसिस का नाम अपने लिये चुना, 13 मार्च सन् 2013 के बाद परमधर्मपीठीय सिंहासन के उत्तराधिकारी स्वरुप अपने कार्यकाल के 6 वर्ष पूरा करते हैं। काथलिक कलीसिया में संत पेत्रुस के 265वें उत्तराधिकारी के रुप में उनके कार्यकाल के 10 विशिष्ट बिन्दुओं का अवलोकन हमें उनकी आध्यात्मिकता से रुबरु कराती है।

1. विश्वास येसु ख्रीस्त से मिलन

संत पापा की शिक्षा का केन्द्र-बिन्दु येसु ख्रीस्त के रहस्य से मिलन है जो सच्चे ईश्वर और सच्चे मानव हैं जहाँ से हम अपने लिए सुसमाचार की घोषणा को पाते हैं, “येसु ख्रीस्त हमें प्रेम करते हैं, उन्होंने हमें बचाने हेतु अपना जीवन दिया, वे अभी जीवित हैं जो सदा हमारे साथ रहते और हमारे जीवन को प्रकाशित करते हुए स्वतंत्र होने हेतु हमें साहस प्रदान करते हैं।” (ऐभन्जेली गैदियुम 164) विश्वास हमारे लिए विचार नहीं-विचार हमारे लिए दीवार खड़ा करती और हमें विभाजित करती है, वरन यह ठोस रुप में मुक्तिदाता से हमारा मिलन है जो हमें दूसरों से मिलने हेतु मदद करता है जिसके फलस्वरुप हम अपने जीवन में परिवर्तन पाते हैं। इस प्रेम मिलन के द्वारा सुसमाचार की खुशी हमारे जीवन में आती है जिसे घोषित करने हेतु हम विश्व में जाते हैं। यह येसु के प्रेम की शक्ति है जो मानव के रुप में हमारे बीच रहे जो सभों के बीच सुसमाचार को प्रसारित करने हेतु हमें प्रेरित करता है।

2. प्रार्थनाः ईश्वर हमारे पिता हम सभी भाई

संत पापा कहते हैं कि प्रार्थना ख्रीस्तीय जीवन का आधार है जहाँ हम ईश्वर के साथ होते और अपने को पिता के हाथों में सौपते हैं। प्रार्थना एक सजीव संबंध है जहां हम सांत्वना और स्वतंत्रता का अनुभव करते, बातें सुनते, बातें करते यहाँ तक की क्रोधित भी होते, जो एक प्रार्थना है। जब हम गुस्सा करते और अपनी भावनाओं को व्यक्त करते तो पिता के रुप में वे इसे पसंद करते हैं। प्रार्थना के बारे में संत पापा कहते हैं कि हम एक ही पिता की संतान हैं जिन्हें वे कभी नहीं छोड़ते हैं जहाँ वे हमें अपनी कमजोरियों के बावजूद अपने दूसरों भाइयों को खोजने हेतु प्रेरित करते हैं।

3. पवित्र आत्मा विचलित करते हैं

संत पापा फ्रांसिस पवित्र आत्मा को हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान देते हैं जो हममें परिवर्तन लाता है। संत पापा कहते हैं कि ख्रीस्त जीवन अपने में एक निरंतर परिवर्तन की माँग करता है जहाँ हम रोजदिन मैं से तुम की ओर निर्गमन करते हैं, जहाँ हम अपनी सुरक्षा के बदले बातों को स्वीकार करते हैं। यह हमारी आध्यात्मिक को नवीनतम बनाने की मांग करती है जहाँ हम अपने को एक संघर्ष की स्थिति में पाते हैं जिसे हम सच्चाई की संज्ञा देते हुए अपने में परिवर्तन लाने हेतु विरोध करते हैं। संत पापा इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि पवित्र आत्मा हमें आश्चर्यों द्वारा “विचलित” करते जहाँ हम उनकी शक्ति का अनुभव करते हुए अपने जीवन में आगे बढते हैं। यह हमारे विश्वास और विवेक में बढ़ोतरी लाती है। इसके साथ ही अपने में संदेह करते हैं। संदेह साकारत्मक रुप में हमारे लिए वह निशानी है जहाँ हम अपने जीवन में येसु और उनके प्रेम के रहस्य को अधिक जानने की इच्छा रखते हैं। पवित्र आत्मा हमें सुसमाचार का सच्चा संदेशवाहक बनाता है जिसके फलस्वरुप हम सिद्धांतों में फंसे रहने के बदले स्वतंत्र होते हैं। 

4. कलीसिया का खुला द्वार

कलीसिया मुक्ति का एक संस्कार है अतः संत पापा कहते हैं, “यह हमें पिता के द्वार को हमेशा खुला रखने हेतु निमंत्रण देती है।” हमारी ओर ऐसा हो सकता है कि हम कृपा के वाहक होने के बदले इसके अवरोधक हो सकते हैं। लेकिन कलीसिया एक चुंगी घर नहीं है वरन यह पिता का घर है जहाँ सभी थके-मांदे लोगों के लिए एक स्थान है। “संस्कारों के द्वार भी किसी कारण वश बंद नहीं किये जा सकते हैं।” इस भांति परमप्रसाद जो सभी संस्कारों की परिपूर्णता है उत्तम लोगों के लिए उपहार नहीं वरन कमजोरों के लिए भोजन रूपी उदार औषधि है। ख्रीस्तीय समुदाय अपने में एक भले समारी होने हेतु बुलाया जाते हैं जिससे हम राह में घायलों की ओर झुक कर अपने भाइयों को उठायें। हमें येसु को गिरजाघरों तक ही सीमित रखने की जरूरत नहीं, वे हमारे दरवाजों को खटखटाते हैं जिससे हम जीवन लाने हेतु बाहर जा सकें।

5. निरंतर आध्यात्मिक नवीनीकरण

संत पापा कहते हैं कि कलीसिया अपने को सदा नवीन बनाने हेतु बुलाई जाती है जिससे वह ख्रीस्त के प्रति निष्ठावान बनी रही। यह आंतरिक आयाम है जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता जिसके फलस्वरुप हम ख्रीस्तीय सच्चाई को और भी अच्छी तरह समझते तथा विश्वास की समझ को प्रगाढ़ बनाते हैं। सिद्धात का विकास हमें सकते में डाल देता है जहाँ हम 2000 वर्षों के इतिहास की बहुत सारी बातों को छूट के रुप में देखते हैं। कलीसिया अपने मुश्किल की घड़ी में अपने को शुद्ध करती हैं जैसे की हम यौन शोषण को देखते हैं, “अकिंचन कलीसिया अकिंचनों के लिए” जहाँ हम परीक्षाओं से परे सभों के साथ मिलकर चलना सीखते हैं। संत पापा याजकों से यह निवेदन करते हैं कि वे राजकुमार नहीं बल्कि प्रेरित हैं जो समुदाय के लोगों के सुख और दुःख में सहभागी होने हेतु बुलाये गये हैं। इस संदर्भ में वे कहते हैं कि हम अपने में कुछ नहीं वरन है बल्कि ईश्वर हमें लोगों के लिए नियुक्त करते हैं।

6. सच्चा विश्वास हमें कठिनाई में डालता है

संत पापा विश्वास को लेकर कहते हैं, “एक विश्वास जो हमें विकट परिस्थिति में नहीं डालता तो वह विश्वास विकट परिस्थिति में पड़ा जाता है, एक विश्वास जो हमें विकास करने में सहायक नहीं होता तो उस विश्वास को अपने में विकास करने की जरूरत है, एक विश्वास जो अपने में सवाल नहीं करता हमें उस विश्वास पर सवाल करने की आवश्यकता है, विश्वास जो हमें सजीव नहीं करता तो उस विश्वास को हमें सजीव करने की जरुरत है, विश्वास जो हमें विचलित नहीं करता तो हमें उस विश्वास को विचलित करना चाहिए।” फरीसियों के लिए यह विश्वास अपने में स्पष्ट था अतः वे इसे वस्तु की तरह धारण करते और इसका उपयोग अपनी सुरक्षा और शक्ति में बने रहने हेतु करते थे, वे इसके द्वारा ईश्वर को भी धोखा देते सकते थे। वहीं येसु हमें हमारी राह में नहीं वरन अपनी राहों में चलने हेतु बुलाते हैं। संत पापा के वचन बहुत बार हमें पसंद नहीं आयेंगे क्योंकि ये कठोर प्रतीत होते हैं, लेकिन यह हमें अपने विश्वास पर चिंतन करने हेतु उत्प्रेरित करता है, हम इसे सहज तरीके से न लें जो हमें फरीसियों की तरह बना देता है। 

7. करुणा सबसे अहम

संत पापा इस बात को दुहराते हैं कि ख्रीस्तीयता का सार करूणा है। हम सारी दुनिया को अपने विश्वास का साक्ष्य कई रुपों में दे सकते हैं लेकिन यदि हममें प्रेम का अभाव है तो हम व्यर्थ हैं। कारूण अपने में अमूर्त नहीं है। वे इस संदर्भ मे संत मत्ती रचित सुसमाचार के आध्याय 25 की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराते हैं। जीवन के अंत में हमारा न्याय हमारे ठोस रुप में किये गये कार्यो के द्वारा होगा। प्रवासियों, शरणर्थियों के लिए अपना हृदय खुला रखने के कारण संत पापा फ्रांसिस बहुत बार लोगों के लिए गलत समझे जाते हैं। उनकी यह अपील ईश्वरीय राज्य पर आधारित है जो हमारे अंतिम न्याय पर विचार करने को बल देता है। यदि हम येसु ख्रीस्त को गरीबों में नहीं पहचानते तो हम प्रत्यक्ष रुप में देखने पर भी येसु को नहीं पहचानेंगे।

8. पवित्रता प्रति दैनिक जीवन की कृपा

यह करूणा का समय है। संत पापा फ्रांसिस के इस वाक्यांश को भी बहुत बार गलत समझा जाता है मानो यह सापेक्षकीय ख्याति का मृतक रुप हो। वे इस बात को दुहराते हैं कि ईश्वरीय करूणा की कोई सीमा नहीं है लेकिन जब हम इसे अपने में ग्रहण नहीं करते तो हम इसे ईश्वर के क्रोध स्वरुप लेते हैं। ईश्वर के प्रेम का तिरस्कार करना अपने में नरकीय है। सर्वशक्तिमान ईश्वर केवल हमारी स्वतंत्रता के सम्मुख अपने को रोकते हैं। यही कारण है कि वे पापी और भ्रष्ट होने में अंतर स्पष्ट करते हैं। हम सभी पापी हैं और संत पापा इस संदर्भ में अपने को सर्वप्रथम रखते हैं, लेकिन भ्रष्ट अपने को धर्मी बतलाते और ईश्वर की क्षमाशीलता को स्वीकार करना नहीं चाहते  हैं। वहीं संतगण वे हैं जो ईश्वर की करुणा को स्वीकरते और उसे दूसरों के लिए उड़लते हैं। पापी अपने को ईश्वर के बेइंतहा प्रेम में निरंतर आरोहित होने देते जो उनके लिए शक्ति का कारण बनती जिससे वे शांतिमय ढ़ग से दूसरे के लिए खर्च करते हैं।

9. ख्रीस्तीय दुनिया में हैं लेकिन दुनिया के नहीं

अपने इस वाक्य पर संत पापा फ्रांसिस जोर देते हुए कहते हैं कि ख्रीस्तीय दुनिया में रहते लेकिन उनकी आंखें स्वर्ग की ओर टिकी हैं। “तेरा राज्य आवें” यह घोषणा हमें इस धरती पर ईश्वर के प्रेमपूर्ण राज्य की स्थापना हेतु कार्य करने को प्रेरित करता है। एक ख्रीस्तीय अपनी धर्मिकता में उलझा नहीं रहता वरन वह अपने जीवन के द्वारा समाज में शांति, न्याय और भाईचारा स्थापित करने हेतु मेहनत करता है। यही कारण है कि वे मौत के सौदागर जो युद्ध उत्पन्न करते और एक अर्थव्यवस्था जो अति कमजोर का दमन करती है, अस्वीकार करते हैं। वे वैचारिक उपनिवेशों जैसे लिंग सिद्धांत, जो जीवन को नष्ट करती है, परिवार, शैक्षिक स्वतंत्रता और आत्म-चेतना को मार डालती है विरोध करते हैं। संत पापा फ्रांसिस विश्व पत्र “लौदातो सी” के कारण बहुतों के द्वारा “हरे पापा” कहे जाते है क्योंकि वे सारी मानवता की भलाई हेतु ईश्वर प्रदत्त पृथ्वी, हमारे सामान्य घर की देख-रेख करने का आह्वान करते हैं। प्रर्यावरण की चिंता न करना धनियों को धनी और गरीबों को और भी गरीब बना रहा है जहाँ हम आने वाली पीढ़ियों के प्रति बेफ्रिक हैं। वे हमारा आहृवान करते हैं कि हम दुनिया से अपने को तटस्थ न करें वरन एक ख्रीस्तीय के रुप में उसकी देखभाल करें।

10. शैतान से लड़ाई में माता मरियम सहायिका

संत पापा बहुत बार शैतान का जिक्र करते हैं। वे मध्यकालीन में चर्चित इस विषय का जिक्र करने हेतु लज्जा का अनुभव नहीं करते हैं। वे कहते हैं, “21 सदी में भी शैतान है।” मनुष्य के द्वारा किये जाने वाली बुराइयों के पीछे शैतान है। यह कहते हुए वे मनुष्य के उत्तरदायित्व को कम नहीं करते लेकिन वे इस बात को स्पष्ट करते हैं कि हमारा बड़ा संघर्ष आध्यात्मिक स्तर पर होता है। शैतान वह है जो हमें विभाजित करता है, वह ईश्वर से, अपने भाइयों से, लोगों से, समुदाय, कलीसिया और परिवारों से हमें पृथक करना चाहता है। वह हमसे झूठ बोलता, हमें दोषी करार देता क्योंकि वह हमारा शत्रु है, वह हमें मार डालता है। शैतान से संघर्ष करने हेतु वे हमें माता मरियम की सहायता मांगने को कहते हैं। वे अपने को माता मरियम के हाथों में सुपूर्द करते हैं जिसे हम उनकी हर प्रेरितिक यात्रा के शुरू और अंत में देख सकते हैं जहाँ वे रोम, माता मरिया के तीर्थ सालुस पोपोली रोमानी की प्रतिमा के समक्ष प्रार्थना करते हुए शीश नवाते हैं। वे हम विश्वासियों को प्रति दिन रोजरी माला विन्ती करने का आहृवान करते हैं जिससे माता मरियम की विचवई में महादूत माईकेल कलीसिया में हो रहे शैतानी आक्रमण से हमें सुरक्षित रखें। रोजरी, वे कहते हैं कि उनके हृदय की प्रार्थना है। वे हमें प्रार्थना की शक्ति में विश्वास करने को कहते हैं यही कारण है कि वे हमेशा अपने लिए प्रार्थना का निवेदन करते हैं। “कृपया आप मेरे लिए प्रार्थना करना न भूलें, मुझे इसकी जरुरत है।”

संत पापा के 6 वर्षीय कार्यों के कुछ आकड़ें

काथलीक कलीसिया के सार्वभौमिक परमाध्यक्ष संत पापा फ्रांसिस ने अपने 6 वर्षीय कार्याकाल के दौरान 1000 प्रवचन दिये जिसमें 670 वाटिकन के प्रार्थनालय संत मार्था में हुआ। उन्होंने 1200 बार जनलोगों को संबोधित किया, 264 बुधवारीय आमदर्शन में धर्मशिक्षा माला दी जिनकी विषयवस्तु विश्वास का वर्ष, धर्मसार, कलीसियाई संस्कार, पवित्र आत्मा के वरदान, माता कलीसिया, परिवार, करूणा, ख्रीस्तीय आशा, मिस्सा बलिदान, बपतिस्मा, दृढ़करण संस्कार, संहिता के नियम और हे पिता हमारे प्रार्थना रहें। उन्होंने 342 छोटी धर्मशिक्षा का भी संपादन किया जो देवदूत प्रार्थना और स्वर्गीय रानी प्रार्थना के दौरान सुसमाचार पाठों पर आधारित थी। उन्होंने दो विश्व पत्र “लुमेन फीदेई” जो संत पापा बेनेदिक्त द्वारा शुरू किया गया थे पूरा किया और “लौदातो सी” जारी किये। उन्होंने तीन प्रेरितिक प्रबोधन एभजेली गौदियुम, आम्मोसिस लेत्तेसिया और गैऊदाते एत एसुलताते का प्रकाशन किया। उन्होंने 36 प्रेरितिक अधिनियमों (एपिस्कोपालीस कोम्मुनियो, भेरितातिस गैऊदियुम और भोलतुम देई क्वाएरेरे) निर्देशित किये। 27 मोतू प्रोप्रियो, करुणा की जयंती हेतु एक बुल (मिसरिकोरदिये भोलतुस) प्रकाशित करने के अलावे परिवार की विषयवस्तु पर दो और युवाओं पर एक धर्मसभा का निर्देशन किया। संत पापा ने अपने परमधर्माध्यक्षीय 6 वर्षीय कार्यकाल के दौरान 27 अन्तरराष्ट्रीय प्रेरितिक यात्रा, 41 देशों का दौरा किया, वहीं उन्होंने इटली में 24 यात्राएं कीं। संत पापा फ्रांसिस द्वारा घोषित किये गये असंख्य संतों के क्रम में हम तीन संत पापाओं की याद करते हैं संत पापा योहन तेरहवें, पौल छवें और योहन पौल द्वितीय इसके साथ ही कोलकाता की मदर तेरेसा, मान्यवर रोमेरो, फतीमा के दो छोटे चरवाहों जसिंता और फ्रंसीस्को मारतो, बालक येसु की संत तेरेसा के माता-पिता और दो रहस्यमयी व्यक्तित्व फोलीनो की अंजेला और तृत्वमय ईश्वर की एलिजबेथ की याद करते हैं। संत पापा का ट्वीटर ​​(@ pontifex) 9 भाषाओं में है जिसके अनुयायी 48 मिलियन है जबकि इस्टेग्राम  (Franciscus) में उनके अनुयायी की संख्या 6 मिलयन है। 

13 March 2019, 15:59