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मिशनरी शिष्यों की दो विशेषताएँ

वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 15 जुलाई को, संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया, देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर मिशनरी शिष्यों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।

उषा मनोरमा तिर्की-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 16 जुलाई 2018 (रेई)˸ वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 15 जुलाई को, संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया, देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

 चेलों को मिशन में भेजना

आज का सुसमाचार पाठ (मार. 6,7-13) उस घटना का वर्णन करता है जिसमें येसु अपने 12 चेलों को मिशन हेतु भेजते हैं। एक-एक का नाम लेकर क्योंकि वे उनके साथ थे, उनका उपदेश सुन चुके थे एवं चंगाई के कार्यों को भी देख चुके थे, अतः अब वे उन्हें बुलाकर दो-दो करके उन गाँवों में भेजते हैं जहाँ वे खुद जाने वाले थे।

संत पापा ने कहा, "यह एक प्रकार का प्रशिक्षण था जिसको उन्हें येसु के पुनरूत्थान के बाद पवित्र आत्मा की शक्ति से करना था।" 

  

प्रेरिताई की विशेषता

यह सुसमाचार पाठ प्रेरिताई की विशेषता पर प्रकाश डालता है जिसको हम दो बिन्दुओं में रख सकते हैं, पहला, मिशन का एक केंद्रबिन्दु  और दूसरा, मिशन का एक चेहरा।

पहली विशेषता

मिशनरी शिष्यों का सबसे पहले एक संदर्भ बिन्दु होता है जो स्वयं येसु हैं। इस घटना में कई क्रियाओं को प्रस्तुत किया गया है जिनके साथ "वे कर्ता का प्रयोग हुआ है। "ईसा ने आदेश दिया कि वे लाठी के सिवा रास्ते के लिए कुछ भी नहीं ले जायें- न रोटी, न झोली, न फेंटे में पैसा। वे पैरों में चप्पल बाँधें और दो कुरते नहीं पहनें। उन्होंने उनसे कहा, ''जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो!" (मार.7˸8-10) अतः बारहों के बाहर जाने और कार्य करने में केंद्र से निर्देश मिलता था। इस प्रकार उनके मिशनरी कार्यों द्वारा येसु की उपस्थिति एवं कार्य को ही किया गया। यह दर्शाता है कि प्रेरितों को अपनी ओर से कुछ भी घोषणा नहीं करना था, उन्हें अपनी क्षमता को भी साबित नहीं करना था किन्तु येसु द्वारा भेजे गये संदेशवाहक की तरह बोलना और कार्य करना था।

एक ख्रीस्तीय का कर्तव्य

संत पापा ने कहा, "यह सुसमाचारी घटना हमें भी प्रेरित करता है न केवल पुरोहितों को किन्तु सभी बपतिस्मा प्राप्त लोगों को, कि हम जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में ख्रीस्त के सुसमाचार का साक्ष्य दें। यह मिशन हम सभी के लिए सच्चा है जिसके केंद्र येसु हैं। यह व्यक्ति, दल अथवा संगठन के विश्वासियों का प्रयास नहीं है बल्कि प्रभु के साथ संयुक्त कलीसिया का मिशन है।" अतः ख्रीस्तीय खुद का नहीं किन्तु सुसमाचार का प्रचार करते हैं जो ख्रीस्त द्वारा भेजी गयी कलीसिया का कार्य है। बपतिस्मा संस्कार हमें मिशनरी बनाता है। एक बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति जो सुसमाचार प्रचार की आवश्यकता महसूस नहीं करता और येसु की घोषणा करना नहीं चाहता है वह सच्चा ख्रीस्तीय नहीं है। 

मिशनरी की दूसरी विशेषता

मिशनरी अंदाज की दूसरी विशेषता है एक चेहरा जिसमें भौतिक वस्तुओं का अभाव। उनका उपकरण है संयम। बारह प्रेरितों को यात्रा में लाठी के सिवा रास्ते के लिए, न रोटी, न झोली, न फेंटे में पैसा, कुछ भी नहीं ले जाना था।(पद.8)

प्रभु चाहते हैं कि वे मुक्त और हल्के हों, उन्हें किसी के समर्थन एवं एहसान की जरूरत न पड़े बल्कि सिर्फ उनका प्रेम उनके साथ हो जो उन्हें भेज रहे हैं। उनके शब्दों में दृढ़ता हों जिसकी घोषणा वे करने जा रहे हैं। लाठी और जूते यात्रा के अक्षय निधि हैं क्योंकि वे ईश्वर के राज्य के संदेश वाहक हैं, न कि वे बड़े प्रबंधक अथवा अधिकारी के रूप में पर्यटन पर निकले लोग। 

संतों में मिशनरी चेहरा

संत पापा ने चिंतन हेतु प्रेरित करते हुए कहा, आइये हम उस धर्मप्रांत पर चिंतन करें जिसका मैं धर्माध्यक्ष हूँ, रोम धर्मप्रांत के संतों की याद करें, संत फिलिप नेरी, संत बेनेदेत्तो जुसेप्पे लाब्रे, संत अलेसियो, संत लुदोविका अलबेरतीनी, संत फ्रांचेस्का रोमाना, संत गासपारे देल बुफालो और कई अन्य संत। वे किसी कार्यालय के अधिकारी अथवा व्यापारी नहीं किन्तु ईश राज्य के विनम्र सेवक थे। उनमें गरीबी एवं असफलता के अनुभव के साथ, वही चेहरा था। येसु की कहानी जो तिरस्कृत एवं क्रूसित हुए वह उनके संदेश वाहकों के लिए एक पूर्वाभास है और उनकी मृत्यु एवं पुनरूत्थान के सहभागी होने के द्वारा हम सुसमाचार प्रचार का साहस प्राप्त करते हैं।  

16 July 2018, 15:39