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ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा  (Vatican Media)

दया का मनोभाव ख्रीस्तियों की जीवन शैली

वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में बृहस्पतिवार 13 सितम्बर को संत पापा फ्राँसिस ने ख्रीस्तयाग अर्पित किया जहां उन्होंने स्मरण दिलाया कि ख्रीस्तीय दुनिया के मनोभाव को नहीं अपनाते बल्कि क्रूस के मनोभाव को अपनाते हैं।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 13 सितम्बर (रेई)˸ संत पापा ने ख्रीस्तियों का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा, "ख्रीस्तीय बने रहना आसान नहीं है किन्तु यह हमें आनन्द प्रदान करता है। जो मार्ग पिता ईश्वर हमें दिखलाते हैं वह दया और आंतरिक शांति का मार्ग है।  

प्रवचन में संत पाप ने संत लूकस रचित सुसमाचार पर चिंतन किया जहाँ येसु अपने शिष्यों को ख्रीस्तीय जीवन शैली की शिक्षा देते हैं।   

दुनिया के मनोभाव के विपरीत जाना

संत पापा ने कहा कि आज की धर्मविधि में ख्रीस्तीय जीवन जीने के चार महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है। "अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो। जो तुम्हें शाप देते हैं, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।" अपने प्रवचन में संत पापा ने इस बात पर अधिक जोर दिया कि एक ख्रीस्तीय को गपशप अथवा दूसरों का अपमान करने से बचना चाहिए जो युद्ध उत्पन्न करता, बल्कि उन्हें परेशान करने वाले लोगों के लिए प्रार्थना करने का समय निकालना चाहिए।

संत पापा ने कहा कि यही ख्रीस्तीय जीवन शैली है किन्तु यदि हम इन चीजों का अभ्यास नहीं करते हैं तो हम सच्चे ख्रीस्तीय नहीं हैं। हम बपतिस्मा लेने के कारण ख्रीस्तीय कहला सकते हैं किन्तु ख्रीस्तियों की तरह नहीं जीते और गैर-ख्रीस्तियों की तरह दुनियावी मनोभाव के साथ जीते हैं।

क्रूस की मूर्खता

अपने शत्रुओं एवं विपक्ष दल के विरूद्ध बात करना सहज है किन्तु ख्रीस्तीय तर्क धारा के विपरीत जाता तथा क्रूस की मूर्खता को स्वीकार करता है। हमारा अंतिम लक्ष्य है पिता ईश्वर के पुत्र-पुत्रियों के समान व्यवहार करना। इस तरह दयावान व्यक्ति ही ईश्वर के अनुरूप आचरण करता है क्योंकि येसु कहते हैं, "दयालु बनो जैसा कि तुम्हारा स्वार्गिक पिता दयालु हैं।" यह एक रास्ता है दुनिया के मनोभाव के विपरीत जाने वाला रास्ता जो दूसरों को दोष नहीं देता क्योंकि हमारे बीच एक बड़ा अभियोक्ता है जो हमारा विनाश करने के लिए ईश्वर के सामने हमेशा हमपर दोष लगाता है। शैतान सबसे बड़ा अभियोक्ता है। जब हम अभियोग लगाने, शाप देने, दूसरों को हानि पहुँचाने की कोशिश करते हैं तब हम उसी अभियोक्ता का साथ देते हैं जो विनाशकारी है तथा "दया" शब्द से अपरिचित है।

ख्रीस्तियों की दयालुता

संत पापा ने कहा कि इस प्रकार हमारा जीवन दो प्रकार के मनोभवों के बीच चलता है एक पिता ईश्वर के मनोभाव एवं दूसरा शैतान का मनोभाव, जो हमें दूसरों पर दोष लगाने एवं विनाश करने के लिए मजबूर करता है। उन्होंने कहा कि ख्रीस्तीय सिर्फ अपने आप पर दोष लगा सकते हैं और दूसरों पर दया कर सकते हैं क्योंकि हम उस पिता की संतान हैं जो दयालु हैं। 

13 September 2018, 16:26
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