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भारत के दलित ख्रीस्तीय एवं मुसलमान  हैदराबाद में अपने अधिकारों की मांग करते हुए, तस्वीरः 10.08.2021 भारत के दलित ख्रीस्तीय एवं मुसलमान हैदराबाद में अपने अधिकारों की मांग करते हुए, तस्वीरः 10.08.2021  (AFP or licensors)

भारत, अल्पसंख्यक स्कूलों के विशेषाधिकारों को कम करने का प्रयास

भारत के एक काथलिक अधिकारी ने ईसाई जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित स्कूलों के अधिकारों को कम करने के लिए संघीय आयोग की सिफारिशों को "राजनीति से प्रेरित" बताया है।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

नई दिल्ली, शुक्रवार, 20 अगस्त 2021 (ऊका समाचार): भारत के एक काथलिक अधिकारी ने ईसाई जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित स्कूलों के अधिकारों को कम करने के लिए संघीय आयोग की सिफारिशों को "राजनीति से प्रेरित" बताया है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने पिछले हफ्ते जारी एक अध्ययन में अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार और सार्वभौमिक प्रारंभिक शिक्षा नीतियों के तहत लाने की मांग की। ग़ौरतलब है कि अधिकांश अल्पसंख्यक स्कूल ख्रीस्तीयों द्वारा संचालित हैं।

संघीय सरकार अपने शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत हाशिये पर जीवन यापन करनेवाले बच्चों को स्कूलों में शामिल करना अनिवार्य बनाती है और एक सार्वभौमिक शिक्षा योजना के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करती है। हालांकि, भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने कहा है कि आरटीई अधिनियम अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं किया जा सकता जिन्हें अपने संस्थानों की स्थापना एवं संचालन की पूरी आज़ादी है।

कलीसियाई अधिकारी की चिन्ता

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के शिक्षा एवं संस्कृति आयोग के अध्यक्ष फादर मरिया चार्ल्स ने ऊका समाचार से कहा, "राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का उक्त अध्ययन ख्रीस्तीयों एवं मुसलमानों को अपना निशाना बनाता है, जो राजनीति से प्रेरित हो सकता है।"

उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शिक्षा संस्थान निर्धनों एवं हाशिये पर जीवन यापन करनेवाले बच्चों को उच्च शिक्षा प्रदान करने की अपनी ज़िम्मेदारी वहन करते हैं किन्तु साथ ही सरकार को भी शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने की उसकी ज़िम्मेदारी का स्मरण दिलाते हैं।

एनसीपीसीआर

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने 9 अगस्त को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई से दी गई छूट, बच्चों को, विशेष रूप से, निर्धन एवं हाशिये पर जीवन यापन करनेवाले बच्चों को, आरक्षण के तहत प्रवेश सहित अन्य लाभों से वंचित करती है। यह पता लगाने के बाद कि अल्पसंख्यक स्कूलों में 74 प्रतिशत से अधिक बच्चे अल्पसंख्यक समाज के नहीं हैं, आयोग ने यह भी परामर्श दिया कि शिक्षा संस्थान अल्पसंख्यकों को भी आरक्षण के तहत ही स्कूलों में प्रवेश दे। 

फादर मरिया चार्ल्स ने कहा, "राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ख्रीस्तीयों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही शिक्षा की तौहीन करना चाहता है तथा ख्रीस्तीयों पर, सर्वोच्च न्यायलय द्वारा दी गई छूट की वजह से, अधिकाधिक धन कमाने का दोष मढ़ना चाहता है।"

20 August 2021, 11:37