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सीरिया के आप्रवासी सीरिया के आप्रवासी  (AFP or licensors)

सीरिया में बच्चों का कोई भविष्य नहीं, सेव द चिल्ड्रेन

सेव द चिल्ड्रेन (बच्चों को बचाओ) की नई रिपोर्ट के अनुसार, सीरिया में दस सालों तक युद्ध जारी रहने के बाद, अब बच्चों की एक बड़ी संख्या अपने देश में भविष्य की कल्पना नहीं कर सकती। जॉर्डन, लेबनान, तुर्की और नीदरलैंड में करीब 86 प्रतिशत सीरियाई शरणार्थी बच्चों के सर्वेक्षण में पाया गया है कि वे अपने मूल देश में वापस लौटना नहीं चाहते हैं।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

सीरिया, मंगलवार, 9 मार्च 2021 (सेव द चिल्ड्रेन)-  बच्चे जो अपने घरों से भाग गये हैं वे अभी जहाँ भी हैं सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं और सेव द चिल्ड्रेन के सर्वेक्षण अनुसार करीब पाँच में से दो बच्चे भेदभाव एवं शिक्षा की कमी की समस्या झेल रहे हैं। कई बच्चे महसूस करते हैं कि वे अपने भविष्य के बारे कुछ नहीं कह सकते।

अगला सप्ताह, राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन के एक घातक संघर्ष में परिणत होने का दस साल पूरा होगा, जिसमें हजारों की संख्या में लोग मारे गये, लाखों बच्चे अपने परिवारों के साथ विस्थापित हुए थे और जिसने सीरिया की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर दिया।

सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट जिसको आज प्रकाशित किया गया उसके अनुसार बच्चों के जीवन के हर पहलू को तोड़ दिया गया, उन्हें उजड़ी स्थिति में, बिना वास्तविक घर के छोड़ दिया गया।

संगठन ने सीरिया के अंदर और बाहर 1,900 विस्थापित बच्चों का साक्षात्कार लिया, जिनकी देखभाल सेव द चिल्ड्रन करती है। सर्वेक्षण में पाया गया कि तुर्की में 3 प्रतिशत, जॉर्डन और निदरलैंड में 9 प्रतिशत तथा लेबनान में 29 प्रतिशत बच्चे सीरिया वापस लौटना चाहते हैं।

भेदभाव का सामना

इन देशों के बच्चों के लिए सीरिया में युद्ध की समाप्ति का जिक्र कई बार किया गया है जब भविष्य के लिए उनकी इच्छा पूछी जाती है। 44 प्रतिशत बच्चों ने स्कूलों में अथवा अपने पड़ोसियों के द्वारा भेदभाव का सामना किया है। सीरिया के अंदर, 58% बच्चों ने भेदभाव झेला है, लेबनान में केवल 31% ही सीखने की पहुंच रखते हैं, और जॉर्डन में आधे (49%) से भी कम लोगों के लिए ये अवसर उपलब्ध हैं।

7 साल की लारा तीन साल पहले इदलिब के मारात अल सूमान में अपने घर को छोड़ने के लिए विवश थी। कई बार विस्थापित होने के बाद उसका परिवार अब इदलिब के कैंप में रहता है।

लारा ने कहा, "दस साल बाद, हमारे भविष्य का सब कुछ युद्ध बन गया है। सीरिया में हमारा जीवन मुश्किल है, गाँव में हमारे घर ध्वस्त कर दिये गये हैं और हम तम्बु में रहते हैं।" उसने कहा, "मैं सीरिया के अलावा किसी दूसरे देश में रहना चाहती हूँ जो सुरक्षित है और जहाँ स्कूल एवं खिलौने हैं। यहाँ सुरक्षा नहीं है, कुत्तों का भौंकना मुझे भयभीत करता है और तम्बू सुरक्षित नहीं है।"

सीरिया में आंतरिक रूप से विस्थापित जितने बच्चों ने सर्वेक्षण में भाग लिया, वे महसूस करते हैं कि वे अपने समुदायों से कम जुड़े हैं। वे अपने मूल देश में होने के बावजूद जॉर्डन या लेबनान में अपने साथियों की तुलना में अधिक भेदभाव महसूस करते हैं।

बच्चे बिना भोजन के

कोविड-19 महामारी से उत्पन्न आर्थिक संकट से पहले ही 80 प्रतिशत सीरियाई लोग गरीबी की अंतरराष्ट्रीय रेखा के नीचे जीवनयापन करते थे। हाल के रिपोर्ट ने दिखलाया है कि देश के 6.2 मिलियन बच्चे बिना भोजन के हैं।  

सेव द चिल्ड्रेन ने कहा कि सीरियाई बच्चों एवं उनके परिवारों की देश की सीमा पर समस्या रूक नहीं रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लेबनान में- आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, कोविड-19 के प्रकोप से पीड़ित, और बेरूत में पिछले साल के विस्फोट के प्रभाव के कारण - दस में से नौ सीरियाई शरणार्थी परिवार अत्यधिक गरीबी में जी रहे हैं।

बच्चों को सुरक्षित महसूस कराना

मध्यपूर्व और पूवी यूरोप में सेव द चिल्ड्रेन के क्षेत्रीय निदेशक जेरेमी स्टोनर ने कहा, "सीरिया के अंदर अथवा बाहर, बच्चे इस संघर्ष से प्रभावित हैं जो जहाँ हैं उसे वह अपना घर महसूस नहीं कर पा रहा है। इस 10 साल के युद्द ने सीरिया के युवाओं का बचपन छीना है किन्तु दुनिया को चाहिए कि वह उनके भविष्य को उनसे छीनने न दे। युद्ध ने देश में बच्चों को अपने जीवन के निर्माण में अपनी क्षमता को लेकर उनमें भय और निराशा उत्पन्न किया है। बच्चों को सुरक्षित महसूस करना चाहिए, उन्हें समुदाय का हिस्सा होने और जहाँ वे रहते हैं उससे जुड़ा हुआ होने का एहसास होना चाहिए।"  

सेव द चिल्ड्रन की अपील

सेव द चिल्ड्रेन ने हितधारकों से अपील की है कि वे सीरिया के बच्चों की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा से रक्षा करें, जिसने 10 सालों तक उनके जीवन को कष्ट दिया है। सीरिया के बच्चों को अधिकार है कि वे एक ऐसे वातावरण में बढ़ें जहाँ वे अपनी सुरक्षा के लिए लगातार भय से मुक्त महसूस कर सकें, विस्थापित होकर जीने के लिए मजबूर न हों तथा भविष्य में उखाड़ दिये जाने का डर महसूस न करें और स्थान जहाँ से वे आते हैं उसके नाम पर वे भेदभाव के शिकार न बनें।  

09 March 2021, 15:26