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राष्ट्रीय शांति सम्मेलन बेंगलुरु राष्ट्रीय शांति सम्मेलन बेंगलुरु  

नफरत का मुकाबला करने हेतु संवैधानिक मूल्यों पर जोर

30 जनवरी से 1फरवरी तक सम्पन्न हुए राष्ट्रीय शांति सम्मेलन ने "बेंगलुरु शांति घोषणा 2020" को मंजूरी दी, जो शांति के निर्माण और शांति के एजेंट बनने के लिए विभिन्न कार्य योजनाओं को सूचीबद्ध करता है। उनमें भारतीय संविधान के मूल्यों का अभ्यास शामिल है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

बेंगलुरु, सोमवार 3 जनवरी 2020 ( मैटर्स इंडिया) :  बेंगलुरु के क्राइस्ट विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय राष्ट्रीय शांति सम्मेलन संपन्न हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने गांधीवाद और भारतीय संविधान के मूल मूल्यों को बढ़ावा देते हुए विभाजन करने और घृणा की जांच करने में अपनी प्रतिबद्धता दिखाई।

18 राज्यों के लगभग 470 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। समाज में अपने अद्वितीय योगदान देने वाले व्यक्तियों ने अपने अनुभवों को साझा किया और देश में शांति बनाये रखने हेतु आने वाली विभिन्न चुनौतियों पर विचार विमर्श किया।

शांति घोषणा 2020

30 जनवरी से 1फरवरी तक सम्पन्न हुए सम्मेलन ने "बेंगलुरु शांति घोषणा 2020" को मंजूरी दी, जो शांति के निर्माण और शांति के एजेंट बनने के लिए विभिन्न कार्य योजनाओं को सूचीबद्ध करता है।

उनमें भारतीय संविधान के मूल्यों का अभ्यास शामिल है: बहुलवाद, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व, शांति के लिए आवश्यक है। अगर राजनीतिक नेता घृणा और हिंसा के अपराधी बन जाते हैं, तो नागरिक भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि नेता समाज से आते हैं और लोग उनका चुनाव करते हैं। घोषणा में कहा गया है कि घृणा और हिंसा का मुकाबला करने के लिए क्रोध का सकारात्मक उपयोग होना चाहिए।

सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि समाज व्यक्ति और भाईचारे की गरिमा सुनिश्चित करे। "व्यक्ति की गरिमा के बिना भाईचारा और शांति नहीं हो सकती है,"

यह कहते हुए कि शांति युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है, सम्मेलन ने उन कारणों को दूर करने का आह्वान किया जो शांति स्थापित करने के लिए संघर्ष पैदा करते हैं।

मौन रहना स्वीकार्य नहीं

घोषणा ने समाज के अधिकांश लोगों में अन्याय और घृणा के विरोध में चुप रहने की प्रवृत्ति पर भी खेद प्रकट किया। उन्होंने कहा, "जहाँ हमें बोलने की जरुरत है वहाँ मौन रहना स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने लोगों को अपने शासकों से जवाबदेही की मांग का आग्रह किया।

"भारत के लोगों को जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विभाजित करने का प्रयास संविधान का उल्लंघन है और भारत की सहस्राब्दी विरासत “वसुधैव कुटुम्बकम”(दुनिया एक परिवार है) की हिंसा है।"

सम्मेलन चाहता है कि महिलाएँ निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबर की भागीदार बने ताकि उनका नारीत्व गुण शांति स्थापित करने में योगदान दे सकें।

सम्मेलन ने अफसोस जताया कि सभी धर्मों से दुनिया में शांति लाने की उम्मीद की जाती है, पर अक्सर वे विभाजन, संघर्ष और हिंसा का कारण बनते हैं, क्योंकि वे अपनी मूल दृष्टि से भटक गए हैं।

प्रतिभागियों ने दूसरे धर्मों बारे में सीखकर और उनके त्योहार के दिनों में उन्हें शुभकामनाएं देकर सभी धर्मों का सम्मान करने का संकल्प लिया।

वे ऐसे संदेशों को अग्रेषित नहीं करते हैं जो दूसरों की भावनाओं को आहत पहुँचाता है। वे प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के पीड़ितों की सहायता और समर्थन करते हैं, चाहे उनकी आस्था, जाति और भाषा कुछ भी हो।

उन्होंने महात्मा गांधी की आत्मकथा पढ़ने और दूसरों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया है। एक और संकल्प है क्षमा का अभ्यास करना और अहिंसक साधनों को अपनाना, साथ ही अन्याय का विरोध करना।

संवैधानिक मूल्यों पर सम्मेलन

वे भारतीय संविधान, विशेष रूप से इसके सार्वभौमिक मूल्यों के बारे में अधिक सीखेंगे और उन्हें दूसरों के साथ साझा करेंगे।

वे लोगों को ग्राम सभा बैठकों और ग्राम पंचायत बैठकों में संवैधानिक मूल्यों के बारे में चर्चा करने के लिए प्रेरित करेंगे। वे भारतीय संविधान की प्रस्तावना को विभिन्न भाषाओं में अनुवादित करेंगे। सम्मेलन चाहता है कि स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए एक वर्ष के भीतर शांति सेमिनार आयोजित किया जाए। यह शिक्षा संस्थानों से आम जगहों पर संविधान की प्रस्तावना को प्रदर्शित करने और सप्ताह में कम से कम एक बार स्कूल की असेंम्बली में इसे पढ़ने का आग्रह करता है।

स्कूलों और कॉलेजों से शांति क्लब बनाने और गांधीवादी मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए 2 अक्टूबर को सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शांति रैली आयोजित करने का आग्रह किया जाता है।

यह सम्मेलन इंदौर स्थित राष्ट्रीय शांति आंदोलन द्वारा क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के सहयोग से आयोजित किया गया था।

03 February 2020, 15:43