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हम ईश्वर के संग और ईश्वर हमारे संग

दोमेनिकन पुरोहित तिमथी पीटर योसेफ ने सिनोड की आध्यात्मिक साधना में सहभागी हो रहे प्रतिभागियों को दूसरे प्रवचन में ईश्वर के संग मानवीय संबंध पर प्रकाश डाला, जो कलीसिया में व्यक्त होती है।

वाटिकन सिटी

दूसरा प्रवचन- ईश्वर के संग हम और ईश्वर हमारे संग

हम इस धर्मसभा में परस्पर विरोधी आशाओं के साथ आते हैं। लेकिन यह कोई बड़ी बाधा नहीं होनी चाहिए। हम यूखारिस्त की आशा में एकजुट हैं, एक ऐसी आशा जो उन सभी चीजों को गले लगाती है और उनसे परे जाती है जिनकी हम इच्छा करते हैं।

लेकिन तनाव का एक दूसरा स्रोत है। कलीसिया को अपने निवास के रुप में देखने की हमारी समझ कभी-कभी झड़प का कारण बनती है। हर जीवित प्राणी को अपने विकास के लिए एक निवास की जरुरत है। मछलियों को पानी और पक्षियों को घोंसले की जरुरत है। घर के बिना, हम जीवित नहीं रह सकते हैं। विभिन्न संस्कृतियों में घर के अलग-अगल विचार हैं। इंस्ट्रुमेंटुम लाबोरिस हमें बतलाता है कि “एशिया हमें एक व्यक्ति का स्वरुप प्रस्तुत करता है जो अपने प्रवेश द्वार में जूतों को नम्रता की निशानी में उतार लेता है जिसके द्वारा हम अपने ईश्वर औऱ पड़ोसियों के भेंट करते हैं। ओशीनिया हमें नाव की निशानी प्रदान करती और अफ्रीका हमारे लिए कलीसिया को ईश्वर के परिवार स्वरुप प्रस्तुत करती है, जो हमारे लिए चीजों को प्रदान करने हेतु सक्षम होती और अपने सभी सदस्यों को उनकी विविधता में स्वागत करती है। लेकिन ये सारी निशानियाँ हमें यह दिखलाती हैं कि हमें एक स्थान की जरुर है जहाँ हम स्वीकार किये जाते और हमें चुनौती दिया जाता है। घर में हमें बढ़ावा मिलता और हम बेहतर करने को निमंत्रित किये जाते हैं। घर वह है जहाँ हम जाने जाते हैं, प्रेम और सुरक्षित होने का अनुभव करते हैं लेकिन हमें विश्वास में आगे बढ़ने की चुनौती मिलती है।

हम अपने कलीसिया रुप घर को नवीन करने की जरुरत है यदि हम विश्व को यह बतलाने कि चाह रखते है कि वह दुःख और एक तरह से आश्रयहीन संकट से गुजर रही है। हम अपने पृथ्वी रुपी ग्रह का दमन कर रहे हैं। हम यहाँ 350 मिलयन से अधिक प्रवासियों को पाते जो युद्ध से भाग रहे औऱ हिंसा के कारण पलायन कर रहे हैं। एक निवास की खोज में हजारों की संख्या में लोग समुद्रों में मर रहे हैं। हममें से कोई भी पूरी तरह चैन से नहीं रहा सकता यदि उन्हें आश्रय नहीं मिलता हो। यहाँ तक की समृद्ध देशों में भी, लाखों की संख्या में लोग गलियों में सोते हैं। युवाजन बहुधा अपने लिए एक निवास प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हर जगह हम एक भयानक आध्यात्मिक आश्रयहीनता को पाते हैं। घोर व्यक्तिवाद, परिवारों का टूटना, यहाँ तक की गहरी असामानताएं जिसका अर्थ यह है कि सभी अकेलेपन की सुनामी से बुरी तरह प्रभावित हैं। आत्म हत्याओं में वृद्धि आयी है क्योंकि एक भौतिक और आध्यात्मिक घर के बिना कोई भी जीवित नहीं रह सकता है। प्रेम करने का तत्पर्य किसी का घर में आने से है। 

अतः यह रुपांतर का दृश्य हमें अपने घरों के संबंध में किन चीजों के बारे में कहता है, दोनों हमारी कलीसिया और हमें मिली दुनिया के बारे मेंॽ येसु अपने सबसे करीब मित्रों के दल को अपने साथ एक निर्जन स्थान में आने को कहते हैं जिससे वे उनके संग एक अंतरंग समय बीता सकें। वे उनके संग गेतसेमानी की बारी में भी होंगे। अपने उस करीबी दल में येसु अपने को परिवार सा पाते हैं। पर्वत की ऊचाई में वे उन्हें अपनी महिमा को प्रकट करते हैं। पेत्रुस वहाँ बने रहने की चाह रखता है,“गुरूवर, हमारे लिए यहाँ होना कितना अच्छा है, हम तीन तम्बू खड़ा करें एक आपके लिए, एक मूसा के लिए और एक एलियस के लिए”। वह उस क्षण में लम्बें समय तक बने रहने की चाह रखता है।

लेकिन वे पिता की आवाज को सुनते हैं, “उसकी सुनो”। उन्हें पर्वत से नीचे आने और येरुसालेम की ओर जाने की जरुरत है, वे नहीं जानते की वहाँ उनके साथ क्या होने वाला है। वे अपने में विस्थापित होंगे और उन्हें पृथ्वी के सीमांतों तक भेजा जायेगा जिससे वे असल निवास, राज्य का साक्ष्य दे सकें।  अतः हम यहाँ घर के दो अर्थों को पाते हैं-येसु के संग पर्वत पर हमारा आंतरिक संबंध और अंतिम निवास के लिए हमारा बुलावा, राज्य जिसके हम सभी अंग होंगे।

कलीसिया के प्रति वहीं एक अलग समझ कलीसिया रुपी हमारे घर को आज तोड़ कर रख देती है।  कुछेक के लिए यह पारंपरिक प्राचीन रीतियाँ और धार्मिक रिवाजें हैं, इसकी संरचनाएं और भाषा जिसके अनुरूप हम बढ़े हैं और इसे प्रेम करते हैं। यह हमें एक स्पष्ट ख्रीस्तीय पहचान प्रदान करती है। वहीं दूसरों के लिए, वर्तमान कलीसिया एक सुरक्षित निवास नहीं जान पड़ती है। इसे खास रुप में अनुभव किया गया है जहाँ लोग नर-नारियाँ, तलाकशुदा औऱ पुर्न-विवाहित अपने को परित्यक्त पाते हैं। कुछ लोगों के लिए यह अधिक पश्चिमी, बहुत अधिक यूरोप-क्रेन्दित जान पड़ती है। आईएल समलैंगिक लोगों और बहुविवाहितों के बारे में कहता है। वे एक नवीन कलीसिया की चाह रखते हैं जिससे वे अपने को पूरी तरह सम्मिलित, स्वीकृत, सुदृढ़ और सुरक्षित अनुभव करें।

कुछ लोगों के लिए वैश्विक रुप में स्वागत किये जाने का अर्थ, हरएक को बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करना है, यह कलीसिया की पहचान को विकृत करने के समान है। जैसे की हम 19वीं सदी के एक अंग्रेजी गीत में सुनते हैं,“यदि हर कोई, कोई है तब कोई भी कुछ नहीं है”। वे विश्वास करते हैं कि पहचान हमसे सीमाओं की मांग करती है। वहीं दूसरों के लिए, कलीसिया की पहचान का क्रेन्द-विंदु खुलापन है। संत पापा फ्रांसिस करते हैं, “कलीसिया को पिता का घर कहा जाता है, जिसके दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं...जहाँ सभों के लिए एक स्थान है, उनकी सभी समस्याओं के साथ और उन लोगों की ओर जाने के लिए जो अपने विश्वास के मार्ग को फिर से अपनाने की आवश्यकता महसूस करते हैं।”

यह तनाव, आब्रहाम के समय से है जब उन्होंने ऊर छोड़ा, यह हमारे विश्वास के हृदय में सदैव से है। पुराना व्यवस्थान तनाव की दो चीजों को निरंतर अपने में वहन करता है, चुनाव के बारे में विचार, ईश्वर के द्वारा चुने लोग, वे लोग जिनके साथ ईश्वर निवास करते हैं। यह एक पहचान है जिसे संजोकर रखा जाता है। वहीं वैश्विक रुप में सारे देशों के लिए खुलपन, एक पहचान जिसे हमें अब तक खोजने की जरुरत है।

ख्रीस्तीय पहचान ज्ञात और अज्ञान दोनों है, जो दिया गया है और जिसे हम खोजते हैं। संत योहन कहते हैं,“प्रिय, हम अब ईश्वर की संतान हैं, हम क्या होंगे हमें अब तक प्रकट नहीं किया गया है। हमें जिस बात का ज्ञान है वह यह है, जब वे प्रकट होंगे, हम उनकी तरह होंगे, क्योंकि हम उन्हें वैसे ही देखेंगे जैसे कि वे हैं” (1.यो.3.1-2)। हम जानते हैं कि हम कौन हैं यद्यपि हम नहीं जानते कि हम कैसे होंगे।

हममें से कुछ के लिए, ख्रीस्तीय पहचान हमें दी गई है, कलीसिया जिसे हम जानते और प्रेम करते हैं। दूसरों के लिए ख्रीस्तीय पहचान हमेशा अस्थायी है, जो सामने है जैसे कि हम ईश्वरीय राज्य की ओर यात्रा कर रहे हैं जहाँ सभी भेदभाव खत्म हो जायेंगे। दोनों हमारे लिए जरुरी है। यदि हम सिर्फ अपने को मिली पहचान पर केवल जोर देते तो हम कटरपंथी बन जाते हैं। यदि हम अपने यात्रा की ओर जोर देते जिसकी खोज बाकी है, हम अपने में अमूर्त येसु के अनुयायी बन जाते हैं। लेकिन कलीसिया ख्रीस्त में मानवता की एकता हेतु एक चिन्ह और संस्कार है। हम पर्वत पर निवास करते और महिमा का स्वाद लेते हैं। लेकिन हम येरुसालेम की ओर चलते हैं, जो कलीसिया की प्रथम धर्मसभा है।

हमें इस अपरिहार्य तनाव को कैसे जीने की जरुरत हैॽ सभी ईशशाशस्त्र तनाव से उत्पन्न होते हैं जैसे कि तीर चलाने के लिए धनुष झुकता है। यह तनाव संत योहन के सुसमाचार के क्रेन्द में हैं। ईश्वर अपना निवास हमारे बीच स्थापित करते हैं,“वे जो मुझे प्रेम करते हैं मेरी शिक्षा पर चलते हैं, मैं और पिता उन्हें प्रेम करते और उनके बीच आकर निवास करते हैं (यो.14.23)।” संत योहन हमें इस बात की प्रतिज्ञा दिलाते हैं कि हमारा निवास ईश्वर में है,“मेरे पिता के घर में बहुत से स्थान हैं, यदि ऐसा नहीं होता तो मैं तुमसे नहीं कहता कि मैं तुम्हारे लिए स्थान तैयार करने जाता हूँ” (यो.14.2)। जब हम कलीसिया को निवास स्थल के रुप में सोचते हैं, हममें से कुछ मुख्य रुप से ईश्वर के बारे में सोचते हैं जो हमारे बीच आते हैं, और हम उनमें निवास करते हैं। यह दोनों सही है। हम अपनी संवेदनशीलता की तम्बू को उनके लिए विस्तृत करें जो हमसे अलग विचार रखते हैं। हम पर्वत पर एक आंतरिक समृद्धि को धारण करते हैं लेकिन हम नीचे आते और येरुसालेम की ओर चलते हैं, भकटते हुए और आश्रयविहीन। “हम उनकी सुनें।”

अतः सर्वप्रथम, ईश्वर हममें अपना निवास तैयार करते हैं। शब्द ने शरीरधारण किया और अपने लोगों के विधि-विधानों और परांपरा के अनुरूप उनके बीच में निवास किया। शब्द हम में, हर किसी की संस्कृतियों में शरीरधारण करते हैं। प्रभु जन्म के संदेश का इतालवी चित्रण में, हम संगमरमर के सुन्दर घर को देखते हैं, जहाँ खिड़कियाँ जैतून पेड़ों और गुलाबों तथा लीलियों की वाटिका की ओर खुलती हैं। डच और फ्लेमिस चित्रकारों मरियम को एक गर्म चूल्हे के साथ प्रस्तुत करते हैं जहाँ वह ठंढ़ से बचने के लिए अपने को अच्छी तरह से ढ़की हुई हैं। हमारा घर कैसे भी हो, ईश्वर उसमें निवास करने आते हैं। तीस सालों तक ईश्वर चुपचाप नाजरेत में रहते हैं जो अपने में महत्वहीन है। नाथनायल इसे घोषित करते हैं, “क्या नाजरेत से भी कोई अच्छी चीज आ सकती है” (यो.1.46)। फिलिप इसके उत्तर में कहते हैं, “आओ और देखो”।

हमारे सभी घर नाजरेत हैं जहाँ ईश्वर निवास करते हैं। संत चार्ल्स दे फऊकाल्दो कहते हैं, “नाजरेत आप का आदर्श बनें, अपनी सरलता और व्यापकता में... नाजरेत का जीवन अपने में कहीं भी जीया जा सकता है। आप इसे उस स्थान में जीयें जो आपके पड़ोसी के लिए अति सहायक है। हम जहाँ कहीं भी हैं और जो कुछ भी करते हैं, ईश्वर वहाँ रहने आते हैं- “देखो मैं तुम्हारे द्वार के सामने खड़ा होता और खटखटाता हूँ। यदि तुम मेरी आवाज सुन कर द्वार खोलोगे, मैं अदंर आकर तुम्हे साथ भोजन करूँगा और तुम मेरे साथ” (प्रका. 3.20)।

अतः हम उन स्थानों को अपनी यादों में रखते हैं जहाँ हमने मुक्तिदाता से मिला है, “जो हमारे साथ रहते हैं”। हम उन धर्मविधियों को प्रेम करते हैं जहाँ हमें दिव्यता की झलक मिलती है, हमारे बचपन के गिरजाघर, लोकप्रिय भक्तियाँ। मुझे अपने स्कूल के महान बेनेडिक्टिन एबे से प्रेम है जहाँ मैंने पहली बार स्वर्ग के दरवाजे खुला होने का एहसास किया था। हममें से हर किसी का अपना ही तबोर पर्वत है, जहाँ हम ईश्वर की महिमा का एहसास करते हैं। हमें उसकी जरुरत है। अतः जब धर्मविधियाँ में परिवर्तन किया जाता या गिरजाघरों को ढ़हाया जाता तो लोगों को इससे भारी दुःख होता है, मानों कलीसिया में उनके घरों को धंसाया जा रहा हो। पेत्रुस की भांति हम वहाँ रहने की चाह रखते हैं।

हर स्थानीय गिरजा ईश्वर का निवास स्थल है। हमारी माता मरियम ने इंग्लैण्ड के व्लसिंगहम, लूर्द के प्राचीन तीर्थ, मैक्सिको के ग्वादलुपे, पोलैंड के चेस्तेकोवा, वियतनाम के ला वांग और चीन के दंग्लू में अपने को प्रकट किया। इनमें हम कोई मरियम प्रतियोगिता को नहीं पाते हैं। इंग्लैंड में हम कहते हैं, “सुसमाचार यही है कि ईश्वर तुम्हें प्रेम करते हैं। बुरी खबर यह है कि वे हर किसी को उसी तरह प्रेम करते हैं।” संत अगुस्टीन कहते हैं, “ईश्वर हममें से हर किसी को प्रेम करते हैं मानों कि सिर्फ हम अकेले हैं।” अल्जीयर्स में नोट्रे डेम डी'अफ्रीक के महागिरजाघर में यह अंकित है, “हमारे लिए और मुस्लिमों के लिए प्रार्थना करें”।

बहुधा पुरोहितगण सिनोडल मार्ग का आलिंगन करने में बहुत ही कठिनाई का अनुभव करते हैं। हम पुरोहितगण इन पूजा स्थलों की देखभाल करते हैं और इसकी पूजा-अर्चना करते हैं। पुरोहितों को एक मजबूत पहचान की जरुरत है। लेकिन इस याजकीयवाद से मुक्ति मिलने पर हम कलीसिया में क्या होंगेॽ पुरोहित वर्ग उस पहचान को कैसे अपना सकते हैं जो याजकीय नहीं हैॽ यह नवीन कलीसिया के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। हम इसका आलिंगन बिना भय से करें, यह पुरोहितिक प्रेरिताई की एक नयी भ्रातृत्वमय समझ है। शायद हम इस बात की खोज कर सकते हैं कि पहचान खोना कैसे हमारी पुरोहितिक पहचान का एक अंतरंग हिस्सा है। यह एक बुलाहट है जिसे हमें सभी चीजों से पहले देखने की जरुरत है, क्योंकि हम कौन हैं यह हममें प्रकट होना बाकी है (1 यो.3.2)।

ईश्वर अपने घरों को उन स्थानों में तैयार करते हैं जहाँ दुनिया उनसे घृणा करती है। दोमेनिकन धर्मबंधु फ्रेई बेत्तो इस बात की चर्चा करते हैं कि कैसे ईश्वर ब्राजील के कैदखाने में आये। कुछ दोमेनिकन धर्मबंधुगण तानाशाही के काल में (1964-1985) कैदखाने में थे। बेत्तो लिखते हैं, “ख्रीस्त जयंती के दिन, ईश्वर के घर आने के त्योहार में, हम आपार खुशी को पाते हैं। कैदखाने में ख्रीस्त जंयती की रात... अब पूरा कैदखाना गीत गा रहा होता है, मानों हमारे गीत केवल, खुशी और स्वतंत्रता में पूरी दुनिया में सुनाई देते हों। महिलाएं अपने विभाग में गाती हैं, और हम तालियाँ बजाते हैं... हर एक इस बात से वाकिफ हैं कि यह ख्रीस्त जयंती का दिन है, कि कोई पुनः जन्म ले रहा है। हम अपने गीतों के द्वारा इस बात का साक्ष्य देते हैं कि हमारा भी आंसू रहित, घृणा या प्रताड़ना की एक दुनिया से लड़ने हेतु पुर्नजन्म हो रहा हो। सलाखों के विरूद्ध खड़ा होकर युवाओं को प्रेम गीत गाते देखना अपने में कुछ बात थी। उसे भूला नहीं जा सकता है। यह हमारे न्यायकर्ताओं या सरकारी वकील, या पुलिस के लिए कोई दृश्य नहीं था जिन्होंने हमें गिरफ्तार किया। वे उस रात की सुन्दरता को असहनीय पाते हैं। यातना देने वाले मुस्कुराहट से डरते हैं, यहाँ तक कि कमज़ोर मुस्कुराहट से भी।”

अतः हमने ईश्वर की सुन्दरता को अपने तबोर पर्वत पर देखा, जहाँ, पेत्रुस की भांति, हम  अपना तम्बू खड़ा करना चाहते हैं। यह अच्छा है लेकिन “उनकी सुनो”। हम पर्वत में खुशी का अनुभव करते हैं और नीचे उतर कर येरुसालेम की ओर चलते हैं। हमें एक अर्थ में आश्रयहीन बनने की जरूरत है। “लोमड़ियों की अपनी मांदे हैं और आकाश के पक्षियों के खोंसले, लेकिन मानव पुत्र को सिर रखने के लिए भी जगह नहीं” (लूका.9.58)। वे येरूसलेम की तरफ चलते हैं पवित्र शहर जहाँ ईश्वर का नाम निवास करता है। लेकिन वहाँ ईश्वर शहर के बाहर सभों के खातिर जो दीवारों के बाहर मर जाते हैं, जैसे कि ईश्वर ने अपने को चुनी हुई प्रजा के लिए तम्बू के बाहर मरूभूमि में प्रकट किया। जेम्स अलिसन लिखते हैं, “ईश्वर हमारे बीच में एक परित्यक्त के रुप में हैं”। “इसलिए, येसु भी शहर के दरवाजे से बाहर दुःख उठाते जिससे वे अपने लोहू से लोगों को पवित्र कर सकें। आइए तब हम उनके पास तम्बू के बाहर चलें और शोषण का सामना करें जिसे उन्होंने सहा” (इब्रा.12.12)।

महाधर्माध्य कार्लो आस्पीरोज दा कोस्टा ने दोमेनिकन परिवार को, जब वे अधिकारी थे लिखा,“तम्बू के बाहर” दूसरों के बीच, हम ईश्वर से मिलते हैं। हमारी यात्रा, हमें संस्थानों से बाहर जाने की मांग करती है, सांस्कृतिक रूप से अनुकूलित धारणाओं और मान्यताओं से बाहर क्योंकि हम “तम्बू के बाहर” एक ईश्वर से मिलते हैं जिसे कोई भी नियंत्रण में नहीं रख सकता है। “तम्बू के बाहर” हम दूसरों से मिलते जो हमसे अलग हैं और हम इस बात का पता लगाते हैं कि हम कौन हैं और हमें क्या करना है।” इस बाहर जाने में हम घर पहुंचते जहाँ “कोई यहूदी और यूनानी नहीं, जहाँ कोई दास या स्वतंत्र नहीं, कोई नर या नारी नहीं, क्योंकि हम सभी येसु ख्रीस्त में एक हैं (गला.3.26)।

1980 के करीब, एड्स पर कलीसिया के प्रतियुत्तर पर चिंतन करते हुए मैंने लंदन के एक अस्पलात की भेंट की। सलाहकार ने मुझे बतलाया कि एक युवा है जो तिमथी नामक एक पुरोहित की खोज कर रहा है। ईश्वर की कृपा से मैंने ठीक उसे मरण के पहले अंतमलन दिया। उसे अपने को वेस्टमिस्टर महागिरजाघर में दफने की अर्जी की, जो इग्लैंड में ख्रीस्तीयता का क्रेन्द है। वह साधारण लोगों से घिरा हुआ था जो सप्ताहिक मिस्मा बलिदान में भाग लेने आते, साथ ही एड्स ग्रस्ति व्यक्तियों, नर्सों, चिकित्सकों और समलौगिक मित्र थे। वह जो अपनी बीमारी के कारण हाशिए में था, अपनी बीमारी के कारण, अपने कामुक व्यवहार के कारण और क्योंकि अब वह मर गया था सबों का क्रेन्द बन गया था। वह उन लोगों के द्वारा घिर था जिनके लिए कलीसिया निवास स्थल थी जहाँ वे साधारणत कभी प्रवेश नहीं करते थे।

हमारा जीवन सुन्दर परांपराओं और धार्मिक रीतियों के द्वारा पोषित होता है यदि वे खो जायें, तो हम दुखित होते हैं। लेकिन हमें यह भी याद करना चाहिए कि वे जो अब भी कलीसिया के संग सहज महसूस नहीं करते- महिलाएं जो अपने में यह अनुभव करती हैं कि उन्हें पल्लियों में पहचान नहीं मिलती है। लोग जो अपने में यह अनुभव करते हैं कि कलीसिया बहुत पश्चिमी, लातीनी और बहुत अधिक उपनिवेशक हो गई है। हम एक कलीसिया की ओर यात्रा करें जो हाशिय में नहीं बल्कि क्रेन्द में है। जब थोमस मेरतोन एक ख्रीस्तीय बनें तो उन्होंने ईश्वर को  एक केंद्र के रूप में हर जगह पाया, जिसकी परिधि कहीं नहीं है, जो उन्हें ढूंढते हैं। कलीसिया का नवीनीकरण इस तरह रोटी बनाने की भांति है। एक व्यक्ति आंटे को किनारे से बीच में जमा करता है, और बीच के आंटे को किनारे फैलाता और उसमें आक्सीजन भरता है। कोई किनारों और केंद्र के बीच के अंतर को फैलाकर ईश्वर की रोटी बनाता है, जिसका केंद्र हर जगह है और जिसकी परिधि कहीं नहीं है, जो हमें ढूंढते हैं।

इस सिनोड की तैयारी में बारंबार, सवाल पूछा गया,“लेकिन हम कलीसिया में कैसे अपने निवास की बात सोच सकते हैं जहाँ यौन दुराचार की भयकंर घटनाएं हैं”ॽ बहुतों के लिए यह आखरी तिनका है। उन्होंने अपनी झोलियाँ भरी और चले गये। मैंने इस सवाल को आस्ट्रेलिया के ख्रीस्तीय शिक्षकों के सामने रखा जहाँ कलीसिया इस घटना से बुरी तरह बदनाम हो गयी है। वे कैसे रह सकते हैंॽ वे कैसे अपने घर में रह सकते हैंॽ

उनमें से एक ने कार्लो कर्रेत्तो (1910-1988) को उद्धृत करते हुए कहा कि कलीसिया मेरा घर है लेकिन अब तब यह मेरा निवास नहीं बना है। “मुझे कितना अधिक तुम्हारी शिकायत करनी चाहिए, फिर भी मैं कितना अधिक प्रेम करता हूँ। तुमने मुझे किसी से ज्यादा दुःख दिया है, यद्यपि में किसी और से अधिक तुम्हारी ऋणी हूँ। मैं तुम्हारा विनाश देखना चाहूँगा लेकिन फिर भी मुझे तुम्हारी उपस्थिति की जरुरत है। तुम ने मुझे बहुत अधिक कलंकित किया है और इसके बाद भी तुम ने मुझे अपनी पवित्रता को समझने में मदद किया है... असंख्य बार, मुझे ऐसा लगा की मैं अपने हृदय द्वारा को धड़ाम से बंद कर दूँ यद्यपि हर रात मैंने यह प्रार्थना की कि मैं तुम्हारी बांहों में मरूं। नहीं, मैं तुमसे अलग नहीं हो सकता हूँ, क्योंकि मैं तुम में एक हूँ यद्य़पि तुम पूर्ण नहीं हो। इसके बाद भी- मैं कहाँ जाऊंॽ दूसरी कलीसिया बनाने के लिएॽ लेकिन मैं अपने में एक का निर्माण उन असफलताओं के बिना नहीं कर सकता, क्योंकि वे मेरी असफलताएं हैं”।

संत मत्ती, सुसमाचार के अंत में येसु कहते हैं, “देखो मैं दुनिया के अंत तक तुम्हारे साथ हूँ”। यदि ईश्वर हमें यह करते हैं, तो हम कैसे जायेॽ ईश्वर ने हमारी घृणित कमियों की स्थिति में रहने पर भी हममें अपना निवास बनाया है। ईश्वर हमारी कलीसिया में निवास करते हैं, हमारे भ्रष्टचार और दुरचार के बावजूद। अतः हमें चाहिए कि हम उनके संग रहें। ईश्वर लेकिन, हमारे साथ हैं जो हमें अपने विस्तृत राज्य में आगे ले चलते हैं। हमें कलीसिया की जरुरत है, जो अपनी कमजोरियों में भी हमारे लिए वर्तमान निवास स्थल है, जहाँ हम सीमाओं के बिना अपने भविष्य के निवास में पवित्र आत्मा को आक्सीजन की तरह ग्रहण करते हैं। 

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06 October 2023, 11:13