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अपनी कला को प्रदर्शित करतीं अफगानिस्तान की लड़कियाँ अपनी कला को प्रदर्शित करतीं अफगानिस्तान की लड़कियाँ  (ANSA)

नारी गरिमा का सम्मान न होने पर पूरे समाज को नुकसान

यूरोप में परमधर्मपीठ के सुरक्षा और सहयोग संगठन के स्थायी पर्यवेक्षक मोनसिन्योर जानूस्ज एस उर्बनकजे ने वैध, न्यायिक और व्यावहारिक उपायों को नियोजित किये जाने का आह्वान किया है ताकि महिलाओं एवं लड़कियों के खिलाफ हिंसा का सामना किया जा सके तथा उन्होंने जोर दिया कि हम सभी स्वतंत्र जन्म लिये हैं और प्रतिष्ठा एवं अधिकार में सभी एक समान हैं।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

उन्होंने कहा, "आइये, हम न भूलें कि महिलाएँ और पुरूष अपनी अंतर्निहित गरिमा एवं महत्व में एक समान हैं जो अपने बराबर एवं अपरिहार्य अधिकारों के साथ, स्वतंत्रता, न्याय एवं विश्व शांति के लिए भी नींव है।"  

परमधर्मपीठ के सुरक्षा और सहयोग संगठन के स्थायी पर्यवेक्षक मोनसिन्योर जानूस्ज ने पोलैंड में हो रहे वरसाव मानव आयाम सम्मेलन के 5वें सत्र में अपने हस्तक्षेप में सोमवार को इस पुष्टि पर बल दिया।

महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा की मुसीबत

सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए मोनसिन्योर ने गौर किया कि कई लोगों की प्रतिबद्धता के बावजूद और शामिल राष्ट्रों द्वारा कई उपायों को अपनाये जाने के बाद भी महिलाओं एवं लड़कियों के खिलाफ हिंसा – चाहे यह शारीरिक हो, यौन अथवा मनोवैज्ञानिक हो, हमारे समाज में अब भी एक मुसीबत है और इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा, इसके अलावा, युद्ध की स्थितियों में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ उच्च स्तर की हिंसा होती है, जैसा कि यूक्रेन में हो रहा है, और हिंसक घटनाएँ सामान्य जीवन में भी हो सकती हैं। उनमें से कुछ हैं- कार्यस्थल में दुराचार, यौन शोषण, अश्‍लील साहित्य, वेश्यवृति, जबरन नसबंदी, गर्भपात के लिए प्रोत्साहन और चयनात्मक गर्भपात आदि।

महिलाओं की प्रतिष्ठा का सम्मान

मोनसिन्योर ने कहा, "हरेक व्यक्ति और पूरे समाज को क्षति पहुँचती है जब एक महिला या लड़की की जन्मजात प्रतिष्ठा को सम्मान नहीं दिया जाता या उसकी रक्षा नहीं की जाती है।"

इसका सामना करने के लिए उन्होंने वैधानिक, न्यायिक एवं व्यवहारिक उपायों को अपनाये जाने का आह्वान किया ताकि महिलाओं एवं लड़कियों के खिलाफ हिंसा को रोका जा सके एवं इस तरह के अन्याय को दूर किया जा सके।  

उन्होंने संत पापा फ्राँसिस के 1 जनवरी 2020 के उपदेश की याद की, जब संत पापा ने महिलाओं की सुरक्षा पर बल दिया था। संत पापा ने कहा था, "हम अपनी मानवता के स्तर को इससे समझ सकते हैं कि हम एक महिला के शरीर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। विज्ञापन, मुनाफाखोरी, पोर्नोग्राफी की अपवित्र वेदियों पर महिलाओं के शरीर का कितनी बार बलिदान किया जाता है, जिसका इस्तेमाल प्रचार के लिए किया जाता है? फिर भी, महिलाओं के शरीर को उपभोक्तावाद से मुक्त किया जाना चाहिए; उनका सम्मान और कद्र किया जाना चाहिए।"

मनोभाव में परिवर्तन की आवश्यकता

मोनसिन्योर जानूस्ज ने इस बात पर भी बल दिया कि महिलाओं की सच्ची उन्नति के लिए "उन लोगों की ओर से दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है जो महिलाओं की अंतर्निहित गरिमा की उपेक्षा और उल्लंघन करते हैं।"

उन्होंने खेद प्रकट किया कि इस समस्या की जड़, कई परिस्थितियों में, अव्यक्त, खेदजनक और गलत विचार हैं कि महिलाएँ पुरूषों से नीचे हैं, इसलिए पुरुष के लिए यह सामान्य है कि वह स्त्री को अपनी इच्छा के अधीन करे या उससे अपने सुख प्राप्ति की सेवा करवाएँ।

उन्होंने चेतावनी दी कि वर्तमान प्रवृत्ति को उलटने की अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती है यदि "पुरुष और महिला की समानता और उनकी समान गरिमा को स्वीकार नहीं किया जाता तथा आनेवाली पीढ़ियों को सही ढंग से समझाया और सिखाया नहीं जाता।"

वाटिकन प्रतिनिधि ने यह कहते हुए अपना वक्तव्य अंत किया, "सभी मानव प्राणी स्वतंत्र जन्मे हैं और प्रतिष्ठा एवं अधिकार में एक समान हैं, अतः महिलाओं एवं पुरूषों की समान प्रतिष्ठा एवं अधिकार, मानव व्यक्ति की उत्पत्ति और प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।"

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04 October 2022, 17:03