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चीन हुबई प्रांत का गिरजाघर चीन हुबई प्रांत का गिरजाघर 

चीन के साथ सहमति परमाध्यक्षों का प्रयास है,कार्डिनल पारोलिन

मिलान में वाटिकन राज्य सचिव कार्डिनल पारोलिन ने चीन में पीआईएमई की उपस्थिति की 150 वीं वर्षगांठ मनाने के दौरान कहा,“चीन में अधिक सुसंगत फल प्राप्त करने के लिए संवाद को जारी रखना आवश्यक है। इन दो वर्षों में मैंने चीनी काथलिकों के बीच संबंध के संकेत देखे हैं जो लंबे समय से कई मुद्दों पर विभाजित थे।"

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

मिलान, शनिवार 03 अक्टूबर 2020 : अस्थायी सहमति जिसे परमधर्मपीठ ने चीन की सरकार के साथ हस्ताक्षर की है, यह धर्माध्यक्षों की नियुक्ति से संबंधित है, "यह केवल एक शुरुआती बिंदु है, जिसने कुछ परिणाम लाए हैं: अधि सुसंगत फल प्राप्त करने के लिए संवाद को जारी रखना आवश्यक है।" उक्त बातें, वाटिकन राज्य सचिव  कार्डिनल पिएत्रो पेरोलिन ने "दूसरा चीनः संकट का समय, परिवर्तन का समय" विषय पर पीआईएमई मिशनरी सेंटर द्वारा मिलान में आयोजित सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में कहा था। चीन में परमधर्मपीठीय धर्मसंघ के विदेशी मिश्नरी (पीआईएमई) अपनी उपस्थिति का 150 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।  कार्डिनल पेरोलिन ने कार्डिनल जोवानी बतिस्ता रे द्वारा लिखे मसौदे के बारे कहा जिसे संत पापा बेनेदिक्त सोलहवें ने पहले ही मंजूरी दे दी थी, जिसपर केवल 2018 में समझौते पर हस्ताक्षर करना संभव हो पाया।

संत पापा पियुस बारहवें का प्रयास

कार्डिनल पारोलिन ने चीन में काथलिकों की उपस्थिति के इतिहास पर गौर किया और कहा कि सोलहवीं शताब्दी के अंत में चीन में काथलिकों का आगमन जेसुइट पुरोहित मत्तेओ रिच्ची की अविस्मरणीय उपस्थिति के साथ शुरू हुआ, फिर हेनान में डेढ़ सदी पहले पीआईएमई मिशनरियों का आगमन हुआ। चीन में माओ के सत्ता में आने के बाद बातचीत का प्रयास किया गया। राज्य सचिव ने कहा, "17 जनवरी, 1951 को अधिकारियों ने कुछ काथलिक धर्माध्यक्षों और पुरोहितों को एक बैठक में आमंत्रित किया, जिसमें प्रधान मंत्री और विदेश मंत्री झोउ एनलाई भी शामिल थे। प्रधान मंत्री ने आश्वासन दिया कि काथलिक संत पापा के धार्मिक अधिकार का पालन करना जारी रख सकते हैं लेकिन उन्हें अपने देश के लिए पूरी देशभक्ति सुनिश्चित करनी होगी। इस बैठक के बाद इन दो सिद्धांतों वाले एक दस्तावेज को तैयार करना शुरू किया, जिसमें धर्माध्यक्षों और पुरोहितों ने भाग लिया। "1951 के पहले महीनों में, एक संभावित समझौते के चार ड्राफ्ट तैयार किए गए थे, लेकिन दुर्भाग्य से इसे संतोषजनक नहीं माना गया। "मेरा मानना ​​है कि इस प्रयास की विफलता - अंतर्राष्ट्रीय तनावों के अलावा: ये कोरियाई युद्ध के वर्ष थे - दोनों पक्षों के बीच गलतफहमी और आपसी अविश्वास। यह एक विफलता है जिसने बाद के सभी इतिहास को चिह्नित किया है।”

संवाद हेतु पुनःप्रयास

उस प्रयास के बाद, संवाद के मार्ग को पुन: खोलने से पहले लगभग तीस वर्ष बीत गए। कार्डिनल पारोलिन ने कहा “मुझे विशेष रूप से कार्डिनल एचेगाराय द्वारा 1980 में की गई यात्रा याद है। जब चीन ने सांस्कृतिक क्रांति के दर्दनाक अनुभव से उभरना शुरू किया था। तब से वैकल्पिक घटनाओं के बीच एक रास्ता शुरू किया गया जो - आज तक चला आया है।” कार्डिनल ने बताया कि संत पॉल छठे से लेकर संत पापा फ्राँसिस तक के सभी परमाध्यक्षों ने चीन के साथ संबंधों में गलतफहमी" को खत्म करने का प्रयास किया जिससे ने तो चीनी अधिकारियों और न ही चीनी काथलिक कलीसिया को फायदा हुआ है। इस कठिन परिस्थिति में संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने 2007 में "चीन में धर्माध्यक्षों की नियुक्ति पर मसौदा" को मंजूरी दी, जो केवल 2018 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किया गया।

वास्तव में एक प्रेरितिक समझौता

कार्डिनल पारोलिन ने एक बार फिर से प्रेरितिक समझौते में परमधर्मपीठ की स्थिति को स्पष्ट किया। "कुछ गलतफहमी पैदा हुई हैं। " इनमें से कुछ अस्थायी समझौते के उद्देश्यों को जिम्मेदार ठहराने से आया है, जो उस पर लागू ही नहीं होते हैं। कुछ लोगों ने समझौते को चीन की कलीसिया में होने वाली घटनाओं से या राजनीतिक मुद्दों से जोड़ दिया है, जिनका इस समझौते से कोई लेना-देना नहीं है।

कार्डिनल पेरोलिन ने कहा, "मैं आपको एक बार फिर याद दिलाता हूँ कि 22 सितंबर 2018 का समझौता विशेष रूप से धर्माध्यक्षों की नियुक्ति से संबंधित है।"  कई दशकों में पहली बार," आज चीन के सभी धर्माध्यक्ष रोम के धर्माध्यक्ष के साथ संवाद में हैं। "जो लोग चीन की कलीसिया के इतिहास को जानते हैं, वे समझते हैं कि सभी चीनी धर्माध्यक्षों का विश्वव्यापी कलीसिया के साथ पूर्ण सहभागिता में रहना कितना महत्वपूर्ण है।"

03 October 2020, 15:24