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बीजिंग का संत जोसेफ गिरजाघर बीजिंग का संत जोसेफ गिरजाघर  (AFP or licensors)

परमधर्मपीठ और चीन: धर्माध्यक्षों की नियुक्ति हेतु समझौता

कार्डिनल पारोलिन के अनुसार, अक्टूबर तक चीन के साथ वाटिकन के अस्थायी समझौते के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के निर्णय की उम्मीद है: "इसे जारी रखना उचित होगा।"

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 30 सितम्बर 2020 : धर्माध्यक्षों की नियुक्ति के बारे में परमधर्मपीठ और चीन के बीच 22 सितंबर 2018 को हस्ताक्षरित अस्थायी समझौता, 22 अक्टूबर को समाप्त होगा। बीजिंग में हस्ताक्षर किए गए, अस्थायी समझौते का कार्यकाल दो साल के लिए निर्धारित किया गया था जिसके बाद अंततः इसकी निश्चित रूप से पुष्टि हो जाएगी या कोई अन्य निर्णय लिया जाएगा। हाल ही में, वाटिकन राज्य सचिव कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन ने बताया कि परमधर्मपीठ ने चीनी अधिकारियों से अस्थायी समझौते को बनाए रखते हुए और दो वर्षों के लिए बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है, ताकि आगे चीन में कलीसिया के लिए इसकी उपयोगिता को सत्यापित किया जा सके। कार्डिनल पारोलिन ने कहा, "महामारी के कारण पिछले दस महीनों में बढ़े समय और कठिनाइयों के बावजूद,  मुझे लगता है कि जिस दिशा को चिह्नित किया गया है इसे जारी रखना उचित होगा।”

संयुक्त रूप से प्रकाशित पहली सरकारी सूचना

22 सितंबर 2018 को परमधर्मपीठ और चीनी सरकार द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित पहली सरकारी सूचना में, समझौते का विषय स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया गया था: यह परमधर्मपीठ और चीन के बीच प्रत्यक्ष राजनयिक संबंधों को कवर नहीं करता है और न ही चीनी काथलिक कलीसिया की न्यायिक स्थिति या पुरोहितों और देश के अधिकारियों के बीच संबंध को। अस्थायी समझौता विशेष रूप से धर्माध्यक्षों की नियुक्ति की प्रक्रिया को इंगित करता है: चीन की काथलिक कलीसिया के धर्माध्यक्षों का रोम के धर्माध्यक्ष और विश्व के धर्माधअयक्षों के साथ आपसी संबंध बनाये रखना बहुत आवश्यक है। इसलिए इस समझौते का लक्ष्य केवल राजनयिक या राजनीतिक कभी नहीं रहा है, लेकिन हमेशा सही मायने में प्रेरितिक है। इसका उद्देश्य काथलिक विश्वासियों को अपने धर्माध्यक्षों के साथ और पेत्रुस के उत्तराधिकारी के साथ पूर्ण सहभागिता रखने की अनुमति देना है, साथ ही चीन के अधिकारियों द्वारा मान्यता प्राप्त है।

अस्थायी समझौते पर हस्ताक्षर करने के ठीक बाद, सितंबर 2018 में चीन के काथलिकों और विश्वव्यापी कलीसिया को दिये संदेश में संत पापा फ्रांसिस ने याद किया कि पिछले दशकों में, चीन की काथलिक कलीसिया के दिल में घाव और विभाजन केंद्रित थे। विशेष रूप से विश्वास की प्रामाणिकता के संरक्षक और कलीसियाई सांप्रदायिकता के गारंटर के रूप में धर्माध्यक्षों को चित्रित किया गया था। काथलिक समुदाय के आंतरिक जीवन पर राजनीतिक संरचनाओं के हस्तक्षेप ने तथाकथित "भूमिगत" समुदाय की घटना को उकसाया था, जिसने खुद को सरकार की धार्मिक राजनीति के नियंत्रण से हटाने की मांग की थी।

चीनी धर्माध्यक्षों के साथ पूर्ण सामंजस्य

कमजोरी और त्रुटि के कारण काथलिक कलीसिया के घावों के बारे में अच्छी तरह से वाकिफ संत पापा फ्राँसिस ने अपने पूर्ववर्तियों द्वारा की गई लंबी वार्ता के बाद, चीनी धर्माध्यक्षों के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित किया है, जिनका परमाध्यक्ष के जनादेश के बिना ही धर्माध्यक्षीय अभिषेक किया गया था। यह निर्णय प्रत्येक व्यक्तिगत स्थिति पर चिंतन, प्रार्थना और जांच करने के बाद लिया गया था। अनंतिम समझौते की एकमात्र उद्देश्य है "सुसमाचार के उपदेश का समर्थन करना और उसे बढ़ावा देना और चीन में काथलिक समुदाय की पूर्ण और प्रत्यक्ष एकता को फिर से स्थापित और संरक्षित करना।"

पहले दो वर्षों में रोम के समझौते के साथ नई धर्माध्यक्षीय नियुक्तियां हुईं, जिनमें से कुछ आधिकारिक तौर पर बीजिंग में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त थीं। भले ही महामारी के कारण हाल के महीनों में संपर्क अवरुद्ध हो गया था, लेकिन परिणाम सकारात्मक रहे हैं और समय की एक और निर्धारित अवधि के लिए समझौते के आवेदन के साथ आगे बढ़ने का सुझाव देते हैं।

30 September 2020, 16:06