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वाटिकन ने नाबालिगों के यौन शोषण के मामले में पुस्तिका जारी की

विश्वास के सिद्धांत के लिए गठित परमधर्मपीठीय धर्मसंघ ने 16 जुलाई को एक लघु-पुस्तिका प्रकाशित की, जिसका मूल विषय है- दुराचार के मामले को सुलझाने के लिए बारम्बार पूछे जानेवाले सवालों का एक सटीक और समयनिष्ठ उत्तर (एफ ए क्यू) देना।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 16 जुलाई 20 (रेई)- दिशानिर्देश की इस लघु-पुस्तिका में कुल 30 पृष्ठ तथा 9 अध्याय हैं जो याजकों द्वारा नाबालिगों के यौन दुराचार के मामले पर कार्रवाई की प्रक्रिया में पूछे जाने वाले मुख्य सवालों का उत्तर देती है। अतः यह इस मामले में नियमावली की किताब अथवा कोई नया विधान नहीं है बल्कि सामान्य एवं कानूनी कार्रवाई करनेवालों के लिए एक साधन है जिन्हें गंभीर अपराध पर विहित विधान का अनुवाद ठोस कार्यों में करना पड़ता है जिससे कि गहरे एवं दुखद घाव से पीड़ित कलीसिया को चंगा किया जा सके।   

इसकी मांग 2019 के फरवरी माह में, कलीसिया में नाबालिगों की सुरक्षा के लिए, वाटिकन में विश्वभर के काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों के अध्यक्षों के लिए आयोजित सभा में की गई थी। लघु पुस्तिका को 1.0 संस्करण के रूप में प्रस्तुत किया गया है क्योंकि संभवता समय अनुसार इसमें संशोधन किया जाएगा। अपराध कैसे होता है? प्रारंभिक जांच कैसी होनी चाहिए? संभावित आपराधिक प्रक्रियाएं क्या हैं? आदि कुछ सवाल हैं जिनका उत्तर, 2001 में प्रकाशित संत पापा जॉन पौल द्वितीय के मोतू प्रोप्रियो साक्रामेंतुम संतीतातिस तुतेला तथा 2010 में संत पापा बेनेडिक्ट 16वें द्वारा उसमें संशोधन एवं संत पापा फ्राँसिस द्वारा 2019 में प्रकाशित मोतू प्रोप्रियो, वोस एसतीस लुक्स मुंदी में वर्तमान कोड के निरंतर संदर्भ द्वारा दिया गया है।  

चार मुख्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पुस्तिका का निर्माण किया गया है- पहला, मानव व्यक्ति की रक्षा करना। कलीसियाई अधिकारी से मांग की गई है कि वे इसके लिए अपने आपको प्रतिबद्ध करें ताकि पीड़ित एवं उनके परिवार के साथ सम्मान एवं प्रतिष्ठा के साथ व्यवहार किया जा सके। उन्हें उनका स्वागत करना, उन्हें सुनना और विशेष सेवाओं द्वारा उनका साथ देना है, साथ ही साथ विशेष मामलों में आध्यात्मिक, चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करना है। अपराधी के साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया जा सकता है।

लघु पुस्तिका के निर्माण का दूसरा पहलू है - दुर्व्यवहार के एक कथित मामले पर एक सामान्य व्यक्ति से प्राप्त किसी भी जानकारी की जांच और सटीक सत्यापन की आवश्यकता। शिकायत चाहे औपचारिक रूप से न भी की गई हो, किसी संचार माध्यम द्वारा बातें उजागर हुई हों, स्रोत गुमनाम हो, दस्तावेज सलाह देता है कि हरेक जानकारी का सावधानी पूर्वक आवलोकन किया जाए एवं उसे गहराई से समझा जाए। सामान्यतः, इस मामले में संस्कारों द्वारा जारी सील बरकरार रहती है और व्यक्ति को अन्य माध्यमों द्वारा खोलने का प्रयास किया जाना चाहिए।

तीसरा पहलू सम्पर्क से संबंधित है- लघु पुस्तिका के विभिन्न बिन्दुओं में "सचिव के कार्य" के प्रति सम्मान का स्मरण दिलाया गया है, यहां तक ​​कि अगर इस बात पर जोर दिया जाता है कि, प्रारंभिक जांच के दौरान, कथित पीड़ित और गवाह "तथ्यों के बारे में चुप्पी से बंधे नहीं हैं।" हालांकि, जनता से किसी भी "अनुचित और अवैध" सूचना के प्रसार से बचने के लिए कहा जाता है, विशेष रूप से प्रारंभिक जांच चरण में, ताकि पहले से ही तथ्यों को परिभाषित करने का आभास न हो।

एक परिच्छेद में सार्वजनिक घोषणाओं पर प्रकाश डाला गया है जो प्रथम जाँच के दौरान फैलाया गया हो, ऐसे मामलों में सावधानी बरतने तथा बिना सनसनीखेज बनाये और कलीसिया के नाम पर माफी मांगे बिना, आवश्यक एवं सख्त तरीकों को अपनाने की सिफारिश की जाती है, क्योंकि ऐसा करना कोई भी तथ्य पर निर्णय को पहले से ही सोच लेगा।

चौथा पहलू, कलीसिया अथवा राज्य के सहयोग के महत्व पर प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए, यह जोर देता है कि यदि एक स्पष्ट विनियामक दायित्व का अभाव हो, कलीसियाई अधिकारी, एक सक्षम नागरिक अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करे, जब वह मानता है कि इससे आहत व्यक्ति या अन्य नाबालिगों को आगे के आपराधिक कृत्यों के खतरे से बचाना अपरिहार्य है।"

साथ ही साथ, इस बात पर भी ध्यान दिया जाए कि प्रत्येक राज्य के नागरिक कानूनों के अनुकूल ही जांच की जानी चाहिए।

16 July 2020, 15:38