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कार्डिनल अगुस्टीन बेया, ख्रीस्तीय एकतावर्धक वार्ता के सचिवालय के प्रथम अध्यक्ष, कार्डिनल अगुस्टीन बेया, ख्रीस्तीय एकतावर्धक वार्ता के सचिवालय के प्रथम अध्यक्ष,  

ख्रीस्तीय एकतावर्धक वार्ता के 60 साल : तनाव से एकता की ओर

ख्रीस्तीय एकता को प्रोत्साहन देने हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति की ओर से फादर अभेलिनो गोंजाल्स फेर्रेर ने ख्रीस्तीय एकता के महत्व एवं समिति की स्थापना के बाद 60 साल की यात्रा पर प्रकाश डाला।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 5 जून 2020 (वीएन)- 60 साल पहले, 5 जून 1960 को संत पापा जॉन पौल द्वितीय ने इस समिति की स्थापना की थी जो उस समय ख्रीस्तीय एकता को प्रोत्साहन के सचिवालय के नाम से जानी जाती थी। बाद में इसका नाम ख्रीस्तीय एकता को प्रोत्साहन देने हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति (पीसीपीसीयू) पड़ा।

फादर अभेलिनो पीसीपीसीयू के सुधार कलीसियाओं से संवाद के सदस्य हैं। उन्होंने ख्रीस्तीय एकता को बढ़ावा देने हेतु आरम्भिक दिनों में उठाये गये सबसे महत्वपूर्ण कदम के बार बतलाया। वह कदम था- विश्वभर के गैर-काथलिक पर्यवेक्षकों को वाटिकन द्वितीय महासभा में भाग लेने हेतु निमंत्रण।

वाटिकन न्यूज़ को दिये एक साक्षात्कार में उन्होंने बतलाया कि पीसीपीसीयू आरम्भ से ही अन्य ख्रीस्तियों तक पहुँचने का प्रयास किया है।

समिति का दूसरा प्रयास था – ख्रीस्तीय एकता दिशा-निर्देश का प्रकाशन जिसे 1993 में प्रकाशित किया गया था। फादर गोंजाल्स ने बताया कि यह दिशा-निर्देश, विश्वभर के धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों के लिए जमीनी नियम बनाने और साथ ही साथ, ख्रीस्तीय एकता में संलग्नता और संवाद हेतु कलीसिया के दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण था।

फादर गोंजाल्स ने संत पापा जॉन पौल द्वितीय के प्रेरितिक विश्व पत्र उत उनुम सिंत की भी याद की जिसमें कहा गया है कि ख्रीस्तीय एकता, कलीसिया के स्वभाव का हिस्सा है।  

कलीसियाओं की विश्व समिति

ख्रीस्तीय एकता को प्रोत्साहन देने हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति का संबंध कलीसियाओं की विश्व समिति से भी है। फादर ने बतलाया कि यद्यपि काथलिक कलीसिया, कलीसियाओं की विश्व समिति की सदस्य नहीं है, तथापि यह विश्वास और ऑर्डर कम्मीशन का हिस्सा है। उन सभी संबंधों में बड़ी सावधानीपूर्वक कार्य किया गया है जिसके कारण आज एक अत्यन्त फलप्रद एवं उपयोगी संबंध स्थापित हो पाये हैं।  

फादर गोंजाल्स ने कलीसियाओं की विश्व समिति के वर्षगाँठ के अवसर पर संत पापा फ्राँसिस की जेनेवा यात्रा की याद की जहाँ सभी ने संत पापा फ्राँसिस को ख्रीस्तीय एकता के लिए एक संदर्भ विन्दु के रूप में देखा। जिसको हमने हाल में महामारी के दौरान भी देखा, जब संत पापा फ्राँसिस ने आध्यात्मिक रूप से सभी ख्रीस्तीय समुदायों के साथ खड़े होकर प्रभु से प्रार्थना की। ये सभी ख्रीस्तीय एकतावर्धक वार्ता के 60 सालों के फल हैं।

ख्रीस्तीय एकतावर्धक वार्ता की विषयवस्तु

ख्रीस्तीय एकतावर्धक वार्ता की विषयवस्तु पर प्रकाश डालते हुए फादर गोंजाल्स ने कहा कि उन सभी घटनाओं को याद करना दुखद है जिनके कारण कलीसियाओं में दरार एवं सुधार आये। उन्होंने गौर किया कि हम प्रत्येक उन ऐतिहासिक घटनाओं को "अपने साधन और अपने स्वयं के दृष्टिकोणों से देखते हैं।"

उन्होंने कहा कि सभी लोगों के अलग-अलग दृष्टिकोण को सुनने के लिए एक साथ आने के शुद्धिकरण की यादगारी भी है और यह शुद्धिकरण मेल-मिलाप की ओर लेती है, यही मेल-मिलाप एकता का सेतु है। सुसमाचार हमें यही शिक्षा देता है।

ख्रीस्तीय एकता आंदोलन की चुनौतियाँ

फादर गोंजाल्स का कहना है कि ख्रीस्तीय एकता आंदोलन को अलग-अलग समय में विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का समना करना पड़ा।

आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती है – एकता की विचारधारा, जो पूर्ण दृष्यमान एकता के दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं रह गया है जैसा कि दशकों पहले था। इसमें हमेशा संबंध गहरा करने की चाह रही है।

फादर गोंजाल्स के अनुसार इन 60 सालों में ख्रीस्तीय एकता, तनाव से एकता की ओर बढ़ी है। वार्ता की कला के द्वारा तनाव से एकता के इस रास्ता पर बढ़ने के लिए विश्व को वार्ता की सख्त जरूरत है क्योंकि कोई भी एक-दूसरे से वार्ता नहीं कर रहा है, चाहे परिवार हो, राजनीति हो अथवा राष्ट्र।  

अंत में, फादर ने कहा कि हम जानकारी और इतिहास के खजाने पर बैठे हैं और वार्ता की कला के द्वारा सारी मानवता इससे लाभ उठा सकती है।  

05 June 2020, 16:51