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डीकन अभिषेक डीकन अभिषेक  संपादकीय

पोप से विनयशीलता में पुरोहिती ब्रह्मचर्य पर एक योगदान

ससम्मान सेवा निवृत संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें एवं दिव्य उपासना के लिए बनी परमधर्मपीठीय धर्मसंघ के अध्यक्ष कार्डिनल रोबर्ट साराह की एक किताब में संत पापा फ्राँसिस के विचारों को प्रस्तुत किया गया है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 14 जनवरी 2020 (रेई)˸ वाटिकन न्यूज के संपादक अंद्रेया तोरनियेली ने कहा है कि पुरोहिताई पर लिखी किताब जिसपर ससम्मान सेवानिवृत संत पापा बेनेडिक्ट 16वें एवं दिव्य उपासना के लिए बनी परमधर्मपीठीय धर्मसंघ के अध्यक्ष कार्डिनल रोबर्ट साराह का हस्ताक्षर है उसे 15 जनवरी को फ्राँस में प्रकाशित किया जाएगा। ले फिगारो द्वारा प्रदान की गई पूर्व-प्रकाशन सामग्री से पता चलता है कि उनके योगदान के साथ, लेखक ब्रह्मचर्य और विवाहित पुरुषों को पुरोहित के रूप में अभिषेक देने की संभावना पर बहस में प्रवेश कर रहे हैं। रतजिंगर और साराह ने अपने आपको संत पापा फ्राँसिस के पुत्रानुरूप विनयशीलता में, दो धर्माध्यक्षों के रूप में प्रकट किया है, जो कलीसिया की एकता के लिए प्रेम की भावना से सच्चाई की खोज कर रहे हैं। वे ब्रह्मचर्य के अनुशासन का बचाव करना तथा इसमें बदलाव लाने के खिलाफ अपनी सलाह रखने का कारण बतलाना चाहते हैं। 

संत पापा बेनेडिक्ट 16वें और कार्डिनल साराह, द्वारा दो लेखों में- ब्रह्मचर्य का प्रश्न 175 पृष्ठों पर है- उन्होंने एक साथ, एक परिचय और एक निष्कर्ष पर हस्ताक्षर किया है।  

अपने लेख में कार्डिनल साराह ने याद किया है कि पुरोहिताई एवं ब्रह्मचर्य के बीच सत्तामूलक संस्कारीय संबंध (ऑन्टोलोजिकल साक्रामेंटल लिंक) है। इस संबंध को किसी तरह से कमजोर करना, द्वितीय वाटिकन महासभा की शिक्षा, संत पापा पौल छटवें, संत पापा जॉन पौल द्वितीय और बेनेडिक्ट 16वें को सवाल के घेरे में डाल सकता है। उन्होंने लिखा है, "मैं संत पापा फ्राँसिस से आग्रह करता हूँ कि पुरोहिती ब्रह्मचर्य के कानून को वोट देकर ढील देने की किसी संभवना से पक्‍के तौर पर हमारी रक्षा करें, चाहे यह कोई एक क्षेत्र तक ही सीमित क्यों न हो।"

कर्डिनल साराह ने विवाहित पुरूष के अभिषेक की संभवना को "एक प्रेरितिक उथल-पुथल, कलीसियाई भ्रम और पुरोहित की एक अस्पष्ट समझ कहा है।"

अपने संक्षेप योगदान में संत पापा बेनेडिक्ट 16वें ने उस विषय पर चिंतन किया है जो पीछे लौटते हुए ख्रीस्तियों की यहूदी मूल तक गया है। उन्होंने इस बात की पुष्टि देने का प्रयास किया है कि ईश्वर का मानव के साथ नये व्यवस्थान के शुरू से ही, जिसकी स्थापना येसु के द्वारा की गयी, पुरोहिताई एवं ब्रह्मचर्य एक-दूसरे से जुड़े हैं। उन्होंने याद किया है कि पहली शताब्दी की प्राचीन कलीसिया में भी, विवाहित पुरूष तभी पुरोहिताई का संस्कार ग्रहण कर सकते थे जब वे अपने आपको यौन क्रिया से दूर रखते थे।    

पुरोहिती ब्रह्मचर्य कभी भी डोगमा नहीं रहा है। यह लातीनी कलीसिया का कलीसियाई अनुशासन है जो एक बहुमूल्य वरदान के रूप में प्रकट होता है जैसा कि हाल के सभी परमाध्यक्षों ने स्वीकार किया है। पूर्वी रीति की काथलिक कलीसियाएँ विवाहित पुरूषों के पुरोहित अभिषेक को छूट देती हैं। इस अपवाद को लतीनी कलीसिया में बेनेडिक्ट सोलहवें ने प्रेरितिक संविधान एंग्लिकानोरूम कोएतिबुस में स्वीकार किया है जो अंजेलिकन पुरोहितों को समर्पित किया गया है जो काथलिक कलीसिया के साथ एक होना चाहते हैं, जिसमें परमधर्मपीठ द्वारा अनुमोदित उद्देश्य के मानदंडों के अनुसार मामला दर मामला के आधार पर, विवाहित पुरूषों को पुरोहित अभिषेक की अनुमति देता है।  

यह भी याद रखने योग्य है कि पोप फ्रांसिस ने भी इस विषय पर खुद कई बार अपना विचार व्यक्त किया है। जब वे एक कार्डिनल थे तब उन्होंने रब्बी अब्राहम स्कोर्का के साथ एक वार्तालाप की किताब में उन्होंने व्यक्त किया है कि वे "ब्रहमचर्य को बनाये रखने के पक्ष में हैं जिसमें कई फायदे और नुकसान के साथ, दस शताब्दियों में त्रुटियों की तुलना में अधिक सकारात्मक अनुभव हुए हैं।" परंपरा में एक वजन और वैधता होती है। विगत साल के जनवरी माह में पनामा से वापस लौटते वक्त विमान में उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने याद किया था कि पूर्वी काथलिक कलीसिया में उपयाजक के सामने, ब्रह्मचर्य अथवा विवाह का विकल्प रखा जाता है किन्तु लतीनी कलीसिया के संबंध में उन्होंने कहा था कि "मैं संत पापा पौल षष्ठम के शब्दों की याद करता हूँ जिन्होंने कहा था ˸ ब्रह्मचर्य के कानून में परिवर्तन लाने की अपेक्षा में अपना जीवन ही अर्पित कर सकता हूँ। यह मेरे दिमाग में आया और मैं इसे कहना चाहा क्योंकि यह एक साहसी वाक्यांश है, जिसको उन्होंने इससे अधिक कठिन क्षण, 1968/1970 ... में कहा था।"  

संत पापा फ्राँसिस ने यात्रा के दौरान कहा था कि मैं व्यक्तिगत रूप से सोचता हूँ कि यह कलीसिया के लिए एक वरदान है। दूसरा कि "वैकल्पिक ब्रह्मचर्य की अनुमति देने में मैं सहमत नहीं हूँ।" अपने जवाब में उन्होंने कुछ दूरस्थ क्षेत्रों जैसे प्रशांत द्वीपों के लिए छूट देने की संभावना पर ईशशास्त्रीयों के बीच बहस के बारे कहा था। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया था कि "मेरी ओर से कोई निर्णय नहीं है। मेरा निर्णय है कि उपयाजकों के अभिषेक से पहले वैकल्पिक ब्रह्मचर्य न हो। यह मेरा व्यक्तिगत है, मैं ऐसा करना नहीं चाहता हूँ। यह स्पष्ट होना चाहिए। क्या मैं बंद हूँ? शायद। किन्तु मैं ईश्वर के सामने इस निर्णय के साथ प्रस्तुत होना नहीं चाहता।"

अमाजोन पर सिनॉड का आयोजन अक्टूबर 2019 को किया गया था जिसमें इस विषय पर चर्चा हुई थी। जैसा कि अंतिम दस्तावेज में देखा जा सकता है धर्माध्यक्षों ने विवाहित स्थायी उपयाजकों के पुरोहित अभिषेक की संभवना पर सवाल रखा था। यह विचित्र था कि 26 अक्टूबर को सभागार में सभी भाषणों और विचार-विमार्शों को सुनने के बाद, समापन के भाषण में संत पापा फ्राँसिस ने विवाहित पुरूषों के पुरोहित अभिषेक विषय पर कुछ भी जिक्र नहीं किया था। इसके बदले उन्होंने सिनॉड के चार आयामों की याद दिलायी थी, संस्कृति अनुकूलन, पारिस्थितिक आयाम, सामाजिक आयाम और अंततः प्रेरितिक आयाम जो सबको सम्माहित करता है।  

इसी भाषण में पोप फ्राँसिस ने नये मिशन में रचनात्मकता, महिलाओं की भूमिका, कुछ मिशन क्षेत्रों में पुरोहितों की कमी आदि बातों पर ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने गौर किया था कि एक निश्चित देश से कई पुरोहित हैं जो पहली दुनिया में गए हैं, उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप, एवं "उनकी संख्या पर्याप्त नहीं हैं कि उन्हें उस देश के अमेज़ॅन क्षेत्र में भेजा जाए।

अंततः यह महत्वपूर्ण है कि संत पापा फ्राँसिस ने मीडिया कर्मियों को धन्यवाद देते हुए उनसे एक अहसान की मांग की थी कि अंतिम दस्तावेज के उनके प्रसार में वे सभी निदान पर ध्यान केंद्रित करेंगे जो अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा है वह हिस्सा जिसमें धर्माध्यक्षीय धर्मसभा वास्तव में खुद को सबसे अच्छा व्यक्त किया, सांस्कृतिक मूल्यांकन, सामाजिक मूल्यांकन, प्रेरितिक मूल्यांकन और पारिस्थितिक मूल्यांकन।

उसके बाद संत पापा ने सभी को निमंत्रण दिया था कि अनुशासनात्मक मुद्दों के संबंध में क्या निर्णय लिया जाए, यह देखते हुए कि किस पार्टी ने जीत हासिल की और किसने हारा, उसपर ध्यान केंद्रित करने के खतरे में वे न पड़े।  

14 January 2020, 16:42