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सिनॉड के प्रतिभागी सिनॉड के प्रतिभागी 

कई युवाओं के लिए ईश्वर एक अस्पष्ट विचार

कई युवाओं के गिरजा जाने तथा पाप-स्वीकार संस्कार में भाग लेने एवं 12 वर्षों की धर्मशिक्षा के बावजूद ईश्वर उनके लिए अस्पष्ट होते हैं। उक्त बात बुधवार के प्रेस ब्रीफिंग में कही गयी।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

बुधवार को सिनॉड धर्माचार्यों ने युवाओं पर धर्माध्यक्षीय धर्मसभा के अंतिम दस्तावेज के मसौदे पर बहस किया। सिनॉड द्वारा युवाओं को लिखे पत्र को भी सभा में पढ़कर प्रस्तुत किया गया। उम्मीद की जा रही है कि उस चिट्टी को सिनॉड की समाप्ति पर ख्रीस्तयाग के दौरान 28 अक्टूबर को पढ़ी जाएगी। 

गिरजाघर भरा हुआ होता, किन्तु बाहर क्या होता है?

कैमरून के धर्माध्यक्ष अंद्रेया नकेया फुवानया ने कहा कि अफ्रीका के गिरजाघर विश्वासियों से भरे होते हैं। वहाँ युवाओं के लिए स्थान भी नहीं होता किन्तु समस्या यह है कि ख्रीस्तयाग में सानन्द भाग लेने के बाद जब वे दुनिया में वापस लौटते हैं तब वहाँ वे बेरोजगारी, चिकित्सा की असुविधा, अत्यधिक गरीबी तथा युद्ध की स्थिति को पाते हैं।     

धर्माध्यक्ष ने कहा कि परिवार की समझ अफ्रीका में अब भी काफी मजबूत है। पारम्परिक मूल्य कलीसिया के मूल्यों के अनुरूप हैं। उन मूल्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किया गया है और युवा अब भी उनका अभ्यास करते हैं। 

पूछे जाने पर कि अफ्रीका की कलीसिया किस तरह विकास कर रही है, उन्होंने कहा विकास संभव है क्योंकि समुदाय अफ्रीकी जीवन के केंद्र में है। अफ्रीका व्यक्तिवाद से जूझ रहा है। जब लोग बड़े घरों एवं इमारतों में अपने को बंद कर लेते, तब समुदाय एवं सम्पर्क टूट जाते हैं। समुदाय एवं परिवार के रूप में संबंध बहुत मजबूत है किन्तु यदि यह खो जाएगा तो गिरजाघर खाली हो जाएगा। 

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कलीसिया युवाओं के साथ स्पष्ट भाषा में बात करे। वह सच्चाइयों को सामने रखे। यह महत्वपूर्ण है कि सच्चाई को न त्यागा जाए, खासकर, जटिल विषयों में।

ईश्वर एक अस्पष्ट विचार नहीं

पोलैंड के महाधर्माध्यक्ष ग्रेगोर्ज रेस ने कहा कि पोलैंड के गिरजाघर भी खाली नहीं होते। उन्होंने कहा कि करीब 50 प्रतिशत युवा गिरजा जाते तथा नियमित रूप से पापस्वीकार संस्कार में भाग लेते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अच्छी तरह येसु को जानते हैं। 12 वर्षों की धर्मशिक्षा के बावजूद कई युवाओं के लिए ईश्वर एक अस्पष्ट विचार है। उन्होंने कहा कि युवा विश्वास की बातों को कम जानते हैं। यदि युवाओं को मूल्यों के बारे पूछा जाए तो वे जवाब देते हैं कि परिवार ही मूल्य है। दुर्भाग्य से विश्वास का स्थान नीचे है। परिवार संबंधों के कारण महत्वपूर्ण है। पोलैंड के महाधर्माध्यक्ष ने क्रिसमस एवं पास्का जैसे महापर्वों का उदाहरण देते हुए कहा कि युवा इन अवसरों को धार्मिक अवसरों के रूप में नहीं बल्कि पारिवारिक उत्सव के रूप में देखा जाता हैं। उन्होंने कहा कि यहाँ न्याय करने की बात नहीं है किन्तु इसपर गौर करना महत्वपूर्ण है। 

निर्णय लेने में युवाओं का साथ देना

जर्मनी के कार्डिनल रेनहार्ड मार्क्स ने कहा कि संत पापा फ्राँसिस ने सिनॉड को वैश्विक प्रक्रिया के हिस्से के रूप में तथा कलीसिया को आगे ले जाने हेतु निश्चित किया है। कार्डिनल ने कहा कि 15-28 की उम्र के बीच युवा लोगों को देखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह उम्र है जब वे निर्णय लेते हैं। यह संवेदनशील अवधि है जिसको कलीसिया को समझना चाहिए। इस समय उन्हें साथ दिया जाना आवश्यक है क्योंकि यदि कलीसिया इस अवधि में उनका साथ नहीं देती तो वह उन्हें सुसमाचार प्रचार के क्षेत्र मे खो सकती है।

महिलाएँ

कलीसिया में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कार्डिनल मार्क्स ने कहा कि बदलाव एवं विकास के बिना कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता। पूरी कलीसिया के लिए महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को कलीसिया में वास्तविक सहभागिता मिलनी चाहिए। कुछ क्षेत्रों में यह लागू हो चुका है। उन्होंने कहा कि 30 साल पहले वे भी इसका विरोध करते थे किन्तु अब उनकी सोच बदल चुकी है।  

कार्डिनल ने कहा कि कलीसिया को समय के बदलाव तथा महिलाओं की समानता में विकास को समझना चाहिए। यह सुसमाचार के प्रकाश में ईश्वर की ओर से कलीसिया के लिए वरदान है। हम मूर्ख ही होंगे यदि हम महिलाओं की क्षमताओं का प्रयोग नहीं करेंगे।  

विचारधारा के कारण लैंगिक शोषण नहीं किया जाना चाहिए

धर्माध्यक्ष नकेया ने कहा कि अंतिम दस्तावेज में भाषाओं के प्रयोग में सावधानी करनी चाहिए क्योंकि कलीसिया ही एकमात्र आवाज है जो कुछ विचारधाराओं का विरोध करती है। उदाहरण के लिए सहायता पाने के लिए गर्भपात समर्थक नीतियों को स्वीकार नहीं किया जाता है। उन्होंने कहा कि वे अंतिम दस्तावेज में एलजीबीटी (LGBTI) का प्रयोग किये जाने का समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि धर्मप्रांत में 99.9 प्रतिशत युवा इसका अर्थ नहीं समझेंगे। अतः संक्षिप्त शब्दों का प्रयोग करने के लिए उसे प्रचलित होना चाहिए। कभी-कभी यह इतना नया होता है कि उसकी व्याख्या दूसरे रूप में होने लगती है।

यौन अभिविन्यास और जर्मन कलीसिया ने किस तरह इसे संभाला है, उसके बारे में पूछे जाने पर कार्डिनल मार्क्स ने कहा कि सिनॉड में लैंगिकता के बारे बहस की गयी किन्तु यह सिनॉड लैंगिकता पर आधारित नहीं थी। कई अलग-अलग क्षेत्र हैं जो अपने-अपने मुद्दों को सुनाना चाहते हैं। उन्होंने उन लोगों की निंदा की जो विचारधारा के लिए लैंगिकता का गलत फायदा उठाते हैं। कार्डिनल ने कहा कि कलीसिया को ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसे सभी समझ सकें। जितना अच्छा हो सके युवाओं को साथ दिया जाए। येसु के लिए लैंगिकता व्यक्ति का एक आयाम था न कि एक पूर्ण व्यक्ति। 

यौन दुराचार पर टिप्पणी करते हुए कार्डिनल मार्क्स ने कहा कि जर्मनी में सिनॉड के ठीक पहले इस पर गौर किया गया। इस पर सिनॉड में विचार किया गया है। इसके लिए मनोभाव में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। सत्ता का भी दुरूपयोग किया गया है जिसके बारे में संत पापा फ्राँसिस ने बार-बार कहा है।

 

25 October 2018, 16:15