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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

आमदर्शन समारोह में पोप : मैंने एशिया एवं ओशिनिया में जीवंत विश्वास देखा

बुधवारीय आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा फ्राँसिस ने पिछले दिनों एशिया और ओशिनिया में अपनी प्रेरितिक यात्रा को याद किया तथा इंडोनेशिया, पापुआ न्यू गिनी, तिमोर-लेस्ते एवं सिंगापुर की कलीसिया के जीवित एवं आनन्दमय विश्वास और साक्ष्य की सराहना की।

वाटिकन न्यूज

वाटिकन सिटी, बुधवार, 18 सितंबर 2024 (रेई) : संत पापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन के संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

“आज मैं उस प्रेरितिक यात्रा के बारे में बात करूँगा जो मैंने एशिया और ओशिनिया में की। इसे प्रेरितिक यात्रा कहा जाता है क्योंकि यह एक पर्यटक यात्रा नहीं है, यह प्रभु के वचन को फैलाने, प्रभु का प्रचार करने की यात्रा है, साथ ही लोगों की भावना को जानना है।”

पोप पॉल षष्ठम के पदचिन्हों पर प्रेरितिक यात्रा

1970 में, पोप पॉल षष्ठम उगते सूरज की ओर उड़ान भरनेवाले पहले पोप थे, उन्होंने लंबे समय तक फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया, लेकिन कई एशियाई देशों और समोआ द्वीपों में भी रुके। वह एक यादगार यात्रा रही, क्योंकि वाटिकन छोड़नेवाले पहले पोप, संत पापा जॉन 23वें थे जो ट्रेन से असीसी गए थे; उनके बाद संत पापा पॉल छठवें ने यात्रा की, जो एक यादगार यात्रा रही!

संत पापा ने कहा, “इसमें मैंने भी उनके उदाहरण का अनुसरण करने की कोशिश की, लेकिन, उनसे कुछ साल बड़ा होने के कारण, मैंने खुद को चार देशों तक सीमित कर लिया: इंडोनेशिया, पापुआ न्यू गिनी, पूर्वी तिमोर और सिंगापुर। मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे एक बुजूर्ग पोप के रूप में उस काम को करने की इजाजत दी जो मैं एक युवा जेसुइट के रूप में करना चाहता था, क्योंकि मैं वहां जाकर मिशनरी  बनना चाहता था!

इस यात्रा के बाद पहला प्रतिबिंब जो अनायास सामने आता है वह यह है कि कलीसिया के बारे में सोचते हुए हम अभी भी बहुत अधिक यूरोप केंद्रित हैं, या, जैसा कि वे कहते हैं, "पश्चिमी"।

लेकिन वास्तव में, कलीसिया बहुत बड़ी है, रोम और यूरोप से भी बड़ी!, और साथ ही - मैं यह कहने का भी साहस करता हूँ - उन देशों में और भी अधिक जीवंत! मैंने उन समुदायों से मिलकर, पुरोहितों, धर्मबहनों, लोकधर्मी, विशेष रूप से प्रचारकों की प्रशंसा सुनकर बहुत खुशी का अनुभव किया - प्रचारक वे हैं जो सुसमाचार प्रचार करते हैं।

कलीसियाएँ धर्मांतरण नहीं करातीं, बल्कि "आकर्षण" के माध्यम से बढ़ते हैं, जैसा कि पोप बेनेडिक्ट 16वें ने बुद्धिमानी से कहा था।

इंडोनेशिया

इंडोनेशिया में, ख्रीस्तीय लगभग 10% हैं, और काथलिक सिर्फ 3%, जो अल्पसंख्यक हैं। लेकिन मैंने जो देखा वह एक जीवंत, गतिशील कलीसिया है, जो उस देश में रहने और सुसमाचार को प्रसारित करने में सक्षम है, जिसकी संस्कृति अत्यन्त महान है, जो विविधता में सामंजस्य बिठाने के लिए इच्छुक है और साथ ही, यह दुनिया में मुसलमानों की सबसे बड़ी उपस्थिति वाला देश है। उस संदर्भ में, मुझे इस बात की पुष्टि हुई कि करुणा वह मार्ग है जिस पर ख्रीस्तीयों को उद्धारकर्ता मसीह की गवाही देने के लिए चलना चाहिए और साथ ही महान धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से मुलाकात करना है। करुणा के इस मुद्दे पर, आइए ईश्वर की तीन विशेषताओं को न भूलें: निकटता, दया और करुणा।

ईश्वर निकट हैं, ईश्वर दयालु हैं और ईश्वर करुणामय हैं। यदि किसी ख्रीस्तीय में दया की भावना नहीं है तो वह किसी काम का नहीं है। "विश्वास, भाईचारा, करुणा" इंडोनेशिया की प्रेरितिक यात्रा का आदर्शवाक्य था: इन शब्दों के साथ सुसमाचार हर दिन, ठोस रूप से, उन लोगों के जीवन में प्रवेश करता है, जो उसका स्वागत करते, और उन्हें येसु जो मर गए और फिर से जी उठे अपनी कृपा प्रदान करते हैं। ये शब्द एक पुल की तरह है, उस भूमिगत मार्ग की तरह, जो जकार्ता के महागिरजाघर को एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद से जोड़ता है। वहां मैंने देखा कि भाईचारा ही भविष्य है, यह सभ्यता-विरोध, नफरत और युद्ध की शैतानी साजिशों - यहां तक ​​कि संप्रदायवाद का भी जवाब है। यह भाईचारा है, बंधुत्व है।

पापुआ न्यू गिनी

संत पापा ने कहा, मुझे पापुआ न्यू गिनी में एक निवर्तमान मिशनरी कलीसिया की सुंदरता मिली, जो प्रशांत महासागर की विशालता में फैला हुआ एक द्वीपसमूह है। वहां विभिन्न जातीय समूह आठ सौ से अधिक भाषाएं बोलते हैं, पवित्र आत्मा के लिए एक आदर्श वातावरण, जो प्रेम के संदेश को विभिन्न भाषाओं की मधुर ध्वनि में गूंजित करना चाहते है।

संत पापा ने कहा, “पवित्र आत्मा जो करता है वह एकरूपता नहीं है, यह स्वर की समता है, सद्भाव है, संरक्षण है, सद्भाव की प्रधानता है। वहां, एक विशेष तरीके के मिशनरी और प्रचारक रहे हैं और अब भी हैं। मिशनरियों और प्रचारकों के साथ थोड़ा समय बिताकर मेरा दिल खुश हो गया; और मैं युवा लोगों के गीतों और संगीत को सुनकर भावुक हो गया: उनमें मैंने भाईचारे का भविष्य और अद्भुत प्राकृतिक पर्यावरण की देखभाल के लिए एक नया भविष्य देखा, जो बिना जनजातीय हिंसा, बिना निर्भरता, बिना वैचारिक और आर्थिक उपनिवेशवाद के साथ था। पापुआ न्यू गिनी इस समग्र विकास के मॉडल की एक "प्रयोगशाला" हो सकती है, जो सुसमाचार के "खमीर" से प्रेरित है। क्योंकि नए पुरुषों और नई महिलाओं के बिना कोई नई मानवता नहीं है, और केवल प्रभु ही इन्हें बनाते हैं। फिर उन्होंने वामिनो का ज़िक्र करते हुए कहा, “मैं वानिमो की अपनी यात्रा का भी उल्लेख करना चाहूँगा, जहाँ मिशनरी जंगल और समुद्र के बीच हैं। वे जंगल में जाकर सबसे छिपी हुई जनजातियों की तलाश करते हैं, वहाँ एक खूबसूरत यादगारी रही।

तिमोर लेस्ते

ख्रीस्तीय संदेश के मानवीय और सामाजिक प्रचार की शक्ति पूर्वी तिमोर के इतिहास में एक विशेष तरीके से उभर कर सामने आती है। वहाँ कलीसिया ने सभी लोगों के साथ स्वतंत्रता की प्रक्रिया को साझा किया, हमेशा उन्हें शांति और मेल-मिलाप की ओर उन्मुख किया। यह विश्वास का विचारधाराकरण नहीं है, बल्कि यह विश्वास ही है जो संस्कृति बन जाती है और साथ ही इसे प्रकाशित करती, शुद्ध करती, और इसे ऊपर उठाती है। इस कारण से मैंने विश्वास और संस्कृति के बीच फलदायी संबंध को फिर से शुरू किया है, जिस पर संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने अपनी यात्रा के दौरान पहले ही ध्यान केंद्रित किया था।

विश्वास को संस्कृति में ढाला जाना चाहिए और संस्कृतियों का प्रचार किया जाना चाहिए। लेकिन सबसे बढ़कर मैं उन लोगों की सुंदरता से प्रभावित हुआ। एक परखा हुआ लेकिन खुशमिजाज लोग, एक ऐसे लोग जिनकी दुःख में भी बुद्धिमता झलकती है। एक ऐसे लोग जो न केवल कई बच्चों को जन्म देते - बल्कि, उन्हें मुस्कुराना भी सिखातें है। संत पापा ने कहा मैं उस मातृभूमि में, उस क्षेत्र के बच्चों की मुस्कान को कभी नहीं भूलूंगा। वहाँ के बच्चे, और उनमें से बहुत सारे बच्चे हमेशा मुस्कुराते हैं

यह विश्वास मुस्कुराहट विश्वास को सिखाता है, और यह भविष्य की गारंटी है। संक्षेप में, पूर्वी तिमोर में मैंने युवा कलीसिया को देखा: जहां परिवार, बच्चे, युवा, कई सेमिनारी छात्र और धर्मसंघी जीवन के उम्मीदवार। मैं बिना किसी अतिशयोक्ति के कहूंगा, मैंने वहां "वसंत की हवा" में सांस ली!

इस यात्रा का अंतिम पड़ाव सिंगापुर था। अन्य तीन देशों से बहुत अलग देश: एक शहरी देश,  बहुत आधुनिक, एशिया और उससे आगे का आर्थिक और वित्तीय केंद्र। वहां, ख्रीस्तीय अल्पसंख्यक हैं, लेकिन वे अभी भी एक जीवंत कलीसिया बनाते हैं, जो विभिन्न जातीय समूहों, संस्कृतियों और धर्मों के बीच सद्भाव एवं भाईचारा पैदा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। समृद्ध सिंगापुर में भी "छोटे लोग" हैं, जो सुसमाचार का पालन करते हैं और नमक एवं दीपक बन जाते हैं, एक ऐसी आशा के गवाह बनते हैं जो आर्थिक लाभ की गारंटी से कहीं अधिक है।

संत पापा ने अंत में सबका धन्यवाद किया, “मैं इन लोगों का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिन्होंने इतनी गर्मजोशी और प्यार से मेरा स्वागत किया, उनके नेताओं का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिन्होंने इस यात्रा में इतनी मदद की, ताकि यह बिना किसी समस्या के व्यवस्थित तरीके से हो सके। मैं उन सभी का धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने इसमें सहयोग किया, और मैं इस यात्रा के उपहार के लिए ईश्वर का धन्यवाद करता हूँ! और मैं सभी के प्रति, अपना आभार प्रकट करता हूँ। संत पापा ने उन सभी लोगों के लिए ईश्वर से आशीष की कामना की, जिनसे वे मिले और उन्हें शांति एवं भाईचारे के रास्ते पर मार्गदर्शन करें! सभी को नमस्कार!

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18 सितंबर 2024, 16:04
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