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प्रभु प्रकास महापर्व पर सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में सन्त पापा फ्राँसिस, तस्वीरः 06.01.2023  प्रभु प्रकास महापर्व पर सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में सन्त पापा फ्राँसिस, तस्वीरः 06.01.2023  

विश्वास हमारी अपनी योग्यता का फल नहीं, सन्त पापा फ्राँसिस

06 जनवरी प्रभु प्रकाश महापर्व के उपलक्ष्य में सन्त पापा फ्राँसिस ने सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित कर प्रवचन किया तथा इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित कराया कि विश्वास हमारी अपनी योग्यता, गुणों एवं विचारों का फल नहीं है बल्कि यह ईश्वर की देन है।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 6 जनवरी 2023 (रेई, वाटिकन रेडियो): 06 जनवरी प्रभु प्रकाश महापर्व के उपलक्ष्य में सन्त पापा फ्राँसिस ने सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित कर प्रवचन किया तथा इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित कराया कि विश्वास हमारी अपनी योग्यता, गुणों एवं विचारों का फल नहीं है बल्कि यह ईश्वर की देन है।   

हृदय की अथक खोज

सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा, उदित होते तारे के सदृश, येसु सभी लोगों को प्रबुद्ध करने और मानवता की रातों को रोशन करने के लिए आते हैं। आज, पूर्व के तीन राजाओं के साथ हम भी अपनी आँखों को स्वर्ग की ओर उठायें और पूछें कि जन्म लेनेवाला बालक कहाँ है? कहाँ हम प्रभु के दर्शन कर सकते हैं?  

उन्होंने कहा कि तीन राजाओं के अनुभव से हम सीखते हैं कि मनुष्य की बेचैन पूछताछ के बीच हमें उस "जगह" का ज्ञान होता है जहाँ प्रभु रहना पसन्द करते हैं। पूर्व के इन ज्ञानियों का साहसिक कार्य हमें सिखाता है कि विश्वास हमारे अपने गुणों, विचारों और सिद्धांतों से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि यह ईश्वर की देन है।

सन्त पापा ने कहा कि प्रभु की कृपा हमें उदासीनता को दूर करने में मदद करती तथा जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने हेतु हमारे दिलोदिमाग को खोलती है। ऐसे प्रश्न जो हमें अपनी इस धारणा को पीछे छोड़ने हेतु चुनौती देते हैं कि सब कुछ ठीक है, ऐसे प्रश्न जो हमें उस चीज़ के प्रति उदार बना देते जो हमसे परे है।

उन्होंने कहा कि प्रश्न करनेवालों की बेचैनी ही पूर्व के इन ज्ञानियों के लिये शुरुआत थी। अनंत के लिए तृष्णा से भरे हुए, वे आकाश को देखते हैं, खुद को एक तारे की चमक पर अचंभित पाते हैं, तथा सभ्यताओं की प्रगति और मानव हृदय की अथक खोज को प्रेरित करने वाली पारलौकिक की खोज का अनुभव करते हैं। आसमान में उदत तारे ने उनके आभ्यन्तर में एक प्रश्न छोड़ दिया था: वह बच्चा कहाँ है जिसका जन्म हुआ है?

जीवन के प्रश्न

उत्तर में सन्त पापा ने कहा, भाइयों और बहनों, विश्वास की यात्रा तब शुरू होती है जब ईश्वर की कृपा से हम उस बेचैनी के लिए जगह बनाते हैं जो हमें जागृत और सतर्क रखती है। यह तब शुरू होता है जब हम प्रश्न पूछने के इच्छुक होते हैं, जब हम अपनी दिनचर्या से असंतुष्ट होते हैं और प्रत्येक नए दिन की चुनौतियों को गंभीरता से लेते हैं। जब हम अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलकर जीवन के असहज पहलुओं का सामना करने का निर्णय लेते हैं: दूसरों के साथ हमारे संबंध, अप्रत्याशित घटनाएं, परियोजनाओं को शुरू करने की आवश्यकता, सपनों को साकार करना, भय का सामना करना, शारीरिक और मानसिक कष्ट का सामना करने के लिये तत्पर हो उठते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में, हमारे दिल की गहराई में, हम खुद को उन अपरिवर्तनीय प्रश्नों के सामने पाते हैं जो हमें प्रभु की तलाश करने के लिए प्रेरित करते हैं: मुझे खुशी कहाँ मिलेगी? मुझे जीवन की वह परिपूर्णता कहाँ से मिलेगी जिसकी मैं अभिलाषा करता हूँ? मुझे ऐसा प्यार कहाँ मिलेगा जो मिटता नहीं है, ऐसा प्यार जो कमज़ोरी, असफलता और विश्वासघात के बावजूद भी टिका रहता है? मेरे संकटों और मेरे कष्टों के बीच कौन से छिपे हुए अवसर मौजूद हैं?

सन्त पापा ने कहा कि हर दिन, हम जिस हवा में सांस लेते हैं, वह "आत्मा को शांत करने वाली" प्रतीत होती है, हमारी आंतरिक बेचैनी उपभोग की नई वस्तुओं, आनंद के खाली वादों और निरन्तर चलनेवाले मीडिया विवादों तथा फिटनेस की भनक आदि से आती है। व्यक्ति बस जीवन का मज़ा लेने की बात सोचते हैं जबकि यदि येसु के दर्शन करनेवाले तीन ज्योतिषियों ने ऐसा किया होता, तो वे कभी भी प्रभु का साक्षात्कार नहीं कर पाते। हालाँकि, ईश्वर हमारी बेचैन पूछताछ के भीतर सदैव उपस्थित हैं। उस पूछताछ में, जिसमें हम "उन्हें वैसे खोजते हैं जैसे रात भोर की तलाश करती है ... वे उस मौन मौजूद हैं जो हमें मृत्यु और सभी मानवीय भव्यता के अंत में परेशान करता है। वे हमारे हृदय की गहराई में समाहित न्याय और प्रेम की लालसा में मौजूद हैं।

ईश वचन को ध्यानपूर्वक सुनें

सन्त पापा ने कहा कि हमारा अनवरत प्रश्न करना हमें हताशा और वीरानी की ओर ले जा सकता है जब तक कि हम स्वयं को, अपने अस्तित्व की गहराई में, ईश्वर के मुखमण्डल और उसके वचन की सुंदरता की ओर अभिमुख नहीं कर देते। बेनेडिक्ट सोलहवें ने तीन ज्ञानियों के विषय में कहा था: "उनकी बाहरी तीर्थयात्रा, उनकी आंतरिक यात्रा की अभिव्यक्ति थी, उनके दिलों की आंतरिक तीर्थयात्रा।"

सन्त पापा ने कहा कि हमारे विश्वास के बारे में भी यही बात सच है: प्रभु के साथ निरंतर संवाद में निरंतर यात्रा के बिना, उनके वचन को ध्यानपूर्वक सुने बिना, दृढ़ता के बिना, विश्वास विकसित नहीं हो सकता। वह स्थान जहाँ हम प्रभु का साक्षात्कार करते हैं, वह है आराधना, आराधना और भक्ति के आश्चर्य में ही हम प्रभु के मुखमण्डल का दर्शन पा सकते हैं।

काथलिक धर्मानुयायियों से सन्त पापा फ्राँसिस ने निवेदन किया कि वे खुद को आराधना और भक्ति के चमत्कार के सिपुर्द कर दें, तब ही हम देख पायेंगे कि अंधेरी रातों में भी एक ज्योति चमकती है: येसु की ज्योति, भोर का जगमगाता तारा, न्याय का सूर्य, ईश्वर का दयालु प्रताप, जो प्रत्येक पुरुष और स्त्री तथा पृथ्वी के समस्त लोगों से प्रेम करता है।

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06 January 2023, 11:47