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कजाकिस्तान में संत पापा: धर्म 'विश्व शांति और समझ के निर्माण की कुंजी'

कजाकिस्तान के नूर-सुल्तान में विश्व और पारंपरिक धर्मों के नेताओं की 7वीं कांग्रेस में अपने संबोधन में, संत पापा फ्राँसिस ने इस बात पर जोर दिया कि विश्व शांति की प्यास का जवाब देने के लिए और हम में से प्रत्येक के हृदय में बसने वाले अनंत के लिए धर्मों को मित्रता में बढ़ने की आवश्यकता है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

नूर-सुलतान, बुधवार14 सितम्बर 2022 (वाटिकन न्यूज) : कजाकिस्तान में संत पापा फ्राँसिस ने बुधवार सुबह देश की राजधानी नूर-सुल्तान में विश्व और पारंपरिक धर्मों के नेताओं की 7वीं कांग्रेस के प्रतिभागियों को संबोधित किया।

हर तीन साल में होने वाली दो दिवसीय बैठक ने दुनिया भर के धार्मिक नेताओं को इस बार ध्यान केंद्रित करने के लिए एक साथ लाया है कि कैसे धार्मिक नेता महामारी के बाद की दुनिया में आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा दे सकते हैं। धार्मिक, सांस्कृतिक, नागरिक, सरकारी और गैर-सरकारी प्रतिनिधियों से बनी इस कांग्रेस में 50 देशों के 100 से अधिक प्रतिनिधिमंडल भाग ले रहे हैं।

अनंत द्वारा आकर्षित

राष्ट्र के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव के निमंत्रण के बाद, संत पापा फ्राँसिस ने इस बैठक में व्यक्तिगत रूप से भाग लेने के लिए कजाकिस्तान की यात्रा की।

कांग्रेस में संत पापा ने सभी को "भाइयो और बहनो ... उस भाईचारे के नाम पर जो हमें एक ही स्वर्ग के बच्चों के रूप में एकजुट करता है" के रूप में संबोधित करते हुए अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने कहा कि "अनंत के रहस्य से पहले जो हमें उपर उठाता है और आकर्षित करता है, धर्म हमें याद दिलाते हैं कि हम प्राणी हैं ... सर्वशक्तिमान नहीं ... हम सब उसी स्वर्गीय लक्ष्य की ओर यात्रा कर रहे हैं।"

यह साझा प्रकृति स्वाभाविक रूप से "एक सामान्य बंधन, एक प्रामाणिक बंधुत्व" बनाती है। संत पापा ने यह याद करते हुए कहा, कि पूरे इतिहास में मध्य एशियाई राष्ट्र कजाकिस्तान प्राचीन रेशमी मार्ग की तरह विचारों, विश्वासों और व्यापार से जुड़ा देश रहा है।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि धर्मों की मुलाकात हमेशा "सम्मान, ईमानदारी से संवाद, प्रत्येक इंसान की अहिंसक गरिमा के लिए सम्मान और आपसी सहयोग" द्वारा चिह्नित मानवीय संबंधों पर आधारित होगा।

अन्य धार्मिक नेताओं के साथ संत पापा फ्राँसिस
अन्य धार्मिक नेताओं के साथ संत पापा फ्राँसिस

प्रामाणिक धार्मिकता

उन्होंने अपने संबोधन में कजाकिस्तान के सबसे प्रसिद्ध कवि और इसके आधुनिक साहित्य के पिता अबाई (1845-1904) को उद्धृत किया, जिनके लेखन में गहरी धार्मिक भक्ति और "इन लोगों की महान आत्मा" को दर्शाया गया है।

उन्होंने याद किया कि कैसे अबाई ने आध्यात्मिकता को विकसित करने के लिए जीवन और अर्थ के बारे में अंतिम प्रश्नों को अक्सर संबोधित किया। उन्हें उद्धृत करते हुए, संत पापा ने कहा कि यह "आत्मा को जीवित और मन को साफ रखता है" और लोग विश्वास के लोगों को "जीवित आत्माओं और मन के साफ व्यक्ति" तथा "एक प्रामाणिक धार्मिकता" के उदाहरण रुप में देखते हैं।

संत पापा ने याद किया कि कट्टरवाद "हर पंथ को दूषित और भ्रष्ट करता है," हमारे पास "खुला और दयालु हृदय" होना चाहिए।

"श्रेष्ठता की खोज और बंधुत्व के पवित्र मूल्य उन निर्णयों को प्रेरित और प्रकाशित कर सकते हैं जो भू-राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिस्थितिक और मौलिक रूप से आध्यात्मिक संकटों के बीच किए जाने की आवश्यकता है, लोगों के बीच सुरक्षा और सहमति को नुकसान जो कि लोकतंत्र के साथ-साथ कई आधुनिक संस्थान वर्तमान में अनुभव कर रहे हैं। विश्व शांति की प्यास और प्रत्येक स्त्री और पुरुष के हृदय में बसे अनंत की प्यास का जवाब देने के लिए हमें धर्म की आवश्यकता है।"

धार्मिक स्वतंत्रता

संत पापा फ्राँसिस ने तब धार्मिक स्वतंत्रता के महत्व को "वास्तव में मानव और समग्र विकास के लिए एक आवश्यक शर्त" के रूप में इंगित किया। मनुष्य स्वतंत्र रूप से बनाया गया है, प्रत्येक व्यक्ति को "अपने स्वयं के विश्वास की सार्वजनिक गवाही देने का अधिकार है, वह इसे प्रस्तावित कर सकता है परंतु किसी पर भी जोर  से धर्मांतरण नहीं कर सकता।

इस कांग्रेस के विषय पर विचार करते हुए कि महामारी के बाद की दुनिया में आध्यात्मिक और सामाजिक समर्थन कैसे प्रदान किया जाए, संत पापा ने चार चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया और विशेष रूप से धर्मों से उद्देश्य की एक बड़ी एकता की दिशा में एक साथ काम करने का आग्रह किया।

अन्य धार्मिक नेताओं के साथ संत पापा फ्राँसिस
अन्य धार्मिक नेताओं के साथ संत पापा फ्राँसिस

दुर्बलता और जिम्मेदारी

संत पापा ने कहा कि कोविड-19 महामारी ने सभी को "एक ही नाव में बैठा दिया है।"  इसने हमारी सामान्य दुर्बलता और मदद की आवश्यकता को उजागर किया।

उन्होंने महामारी से उत्पन्न "एकजुटता की शक्तिशाली भावना" की प्रशंसा की, लेकिन चेतावनी दी कि हमें इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्मों को "अग्रणी पंक्ति में उपस्थित होने के लिए कहा जाता है, क्योंकि एकता के प्रवर्तक गंभीर चुनौतियों के बीच हमारे मानव परिवार को और भी अधिक विभाजित करने का जोखिम उठाते हैं।"

"यह हम पर निर्भर है, हम जो ईश्वर में विश्वास करते हैं, वर्तमान समय में अपने भाइयों और बहनों की मदद करने के लिए हमारी दुर्बलता को न भूलें ... एक शब्द में, महामारी के दौरान उभरी साझा दुर्बलता की भावना हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। हम सब आगे बढ़ें, जैसा हमने पहले नहीं किया था, लेकिन अब और अधिक विनम्रता और दूरदर्शिता के साथ।”

संत पापा ने तब कहा कि विश्वासियों को मानवता की "देखभाल करने के लिए" कहा जाता है और वे "एकता के शिल्पकार, सहयोग के गवाह बनते हैं जो हमारे समुदाय, जातीय, राष्ट्रीय और धार्मिक संबद्धता की सीमाओं को पार करता है।" उन्होंने कहा कि हम गरीबों, उपेक्षितों, असहायों, चुपचाप दुख सहने वालों की पीड़ा के देखकर शुरू करते हैं।

"मैं जो प्रस्तावित करता हूँ वह न केवल अधिक ध्यान और एकजुटता का मार्ग है, बल्कि हमारे समाजों के लिए उपचार का मार्ग भी है। क्योंकि गरीबी ही महामारियों और अन्य महान बुराइयों के प्रसार को सक्षम बनाती है जो गरीबी और असमानता के क्षेत्र में पनपती हैं।"

शांति की चुनौती

दूसरी वैश्विक चुनौती जिस पर संत पापा ने प्रकाश डाला, वह है शांति की चुनौती।

यद्यपि धार्मिक नेताओं द्वारा विशेष रूप से हाल के दशकों में चर्चा की गई, युद्ध और टकराव की विभीषिका अभी भी दुनिया को परेशान कर रही है। संत पापा ने कहा कि इसके लिए महान धर्मों द्वारा सक्रिय रूप से एकजुट होने और शांति के लिए प्रतिबद्ध होने के लिए "आगे बढ़ने" की आवश्यकता है। वर्तमान समय में लोगों को सम्मानजनक और जिम्मेदार संवाद में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाना है।

"ईश्वर शांति है। वे युद्ध के रास्ते में कभी नहीं, हमेशा शांति के रास्ते में हमारा मार्गदर्शन करते हैं। आइए, हम संघर्षों को हल करने की आवश्यकता पर जोर देने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करें, शक्ति के अनिर्णायक साधनों, हथियारों और धमकियों से नहीं, लेकिन केवल स्वर्ग द्वारा प्राप्त आशीष और मनुष्य के योग्य: मुलाकात, संवाद और धैर्यपूर्ण बातचीत से, जो विशेष रूप से युवा और आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुए प्रगति करते हैं। ... मैं आपसे विनती करता हूँ , आइए, हम हथियारों में नहीं, बल्कि शिक्षा में धन निवेश करें!”

भाईचारे की स्वीकृति

हमारे सामने तीसरी चुनौती "भाईचारे की स्वीकृति" है। संत पापा ने कहा कि आये दिन "जन्मे और अजन्मे बच्चे, प्रवासी और बुजुर्ग लोग अलग रखे जाते हैं ... फिर भी हर इंसान पवित्र है।"

युद्ध, गरीबी और जलवायु परिवर्तन के कारण बड़े पैमाने पर लोगों के पलायन को याद करते हुए संत पापा ने कहा कि दुनिया को इसकी याद दिलाना विशेष रूप से धर्मों का कार्य है।

"सृष्टिकर्ता, जो अपने प्रत्येक प्राणी की देखभाल करते हैं, हमें दूसरों में एक भाई या बहन का चेहरा देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। अतः यह हमारा कर्तव्य है कि हम दूसरों को अपने ही भाई-बहनों के रुप में स्वीकार करें।"

"आइए, हम आतिथ्य, स्वीकृति, करुणा की कला को फिर से खोजें। आइए, हम भी शर्मिंदा होना सीखें: हाँ, पीड़ित लोगों के लिए करुणा से पैदा हुई उस स्वस्थ शर्म का अनुभव करना, सहानुभूति और उनकी स्थिति एवं उनके भाग्य के लिए चिंता, जिसे हम महसूस करते हैं और साझा करते हैं। यह करुणा का मार्ग है, जो हमें बेहतर इंसान और बेहतर विश्वासी बनाता है।"

हमारे आम घर की देखभाल

अंतिम चुनौती जिसका सामना हम सभी करते हैं वह है, "अपने आम घर की देखभाल।" हमें प्राकृतिक पर्यावरण को प्रदूषण, शोषण और तबाही से होने वाले नुकसान से बचाना है।

उन्होंने कहा कि कैसे "शोषण की मानसिकता" हमारे आम घर को नष्ट कर रही है और "दुनिया की सम्मानजनक और धार्मिक दृष्टि" को ग्रसित कर रही है।

एक साथ आगे बढ़ना

अंत में, संत पापा फ्राँसिस ने सभी को "एक साथ आगे बढ़ने" के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि धर्मों की यात्रा मित्रता द्वारा अधिकाधिक चिह्नित हो सके।

"ईश्वर... हमें लगातार संवाद और सही उद्देश्य के माध्यम से खुला और भ्रातृत्वपूर्ण मित्रता विकसित करने में सक्षम करें। हम कभी भी समन्वयवाद के कृत्रिम और सुलहकारी रूपों को अपना लक्ष्य न बनायें, बल्कि अपनी पहचान को मजबूती से बनाए रखें, साहस के साथ दूसरों की भिन्नता और भाईचारे के लिए खुला रहें। केवल इस तरह से, इन अंधकारमय समय में, जिसमें हम रहते हैं, हम अपने सृष्टिकर्ता के प्रकाश को फैलाने करने में सक्षम होंगे।”

विश्व और पारंपरिक धर्मों के नेताओं की 7वीं कांग्रेस में संत पापा फ्राँसिस का संबोधन

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14 September 2022, 15:13