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आमदर्शन समारोह में संत पापा फ्रांसिस आमदर्शन समारोह में संत पापा फ्रांसिस  (Vatican Media)

संत पापाः आत्म-परिक्षण के लिए प्रार्थना अपरिहार्य

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में आत्म-परिक्षण पर अपनी धर्मशिक्षा माला की पुनः शुरूआत की और प्रार्थना पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघऱ के प्रांगण में जमा हुए सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

हम आत्म-परिक्षण पर अपनी धर्मशिक्षा माला को पुनः जारी करते हैं क्योंकि यह अपने में बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमें यह जानने में मदद करता है कि हमें क्या हो रहा है, हमारे अंदर कौन-सी मनोभावनाएं, विचारें हिलोरे ले रही हैं। वे कहाँ से आती और हमें कहाँ ले जाती हैं, वे हमें कौन-सा निर्णय लेने को प्रेरित करती हैं। अतः आज हम इसके मुख्य कारक प्रार्थना पर जिक्र करेंगे। आत्म-परिक्षण करने हेतु हमें प्रार्थना के वातवरण में रहने की जरूर है।

आत्म-परिक्षण हेतु प्रार्थना अपरिहार्य

प्रार्थना आध्यात्मिक रूप में आत्म-परिक्षण करने के लिए एक अपरिहार्य कारक है विशेषकर जब यह स्नेह में हमें ईश्वर की ओर उन्मुख करता जहाँ हम अपनी सरलता और घनिष्टता में एक मित्र की भांति उनसे बातें करते हैं। यह अपने विचारों से परे जाना है जहाँ हम अपनी प्रेममयी सरलता में ईश्वर के संग एक गहरे संबंध में प्रवेश करते हैं। संतों के जीवन का रहस्य ईश्वर के संग उनकी घनिष्ठता और विश्वास को व्यक्त करता है जहाँ वे दिन-व-दिन उनकी योजना को जानने और पहचानते हैं, जो ईश्वर को अच्छे लगते हैं। सच्ची प्रार्थना ईश्वर के संग हमारी घनिष्टता और उनपर हमारा विश्वास है, जहाँ हम अपनी प्रार्थनाओं को तोते की तरह नहीं करते हैं। सच्ची प्रार्थना स्वतः ही प्रेम से उत्पन्न होती है। यह घनिष्टता हमसे इस भय तो दूर करती है कि उनकी योजना, जिसके फलस्वरुप हम कई बार परीक्षा के दौर से होकर गुजरते जो हमारे हृदय को विचलित और कटुता से भर देती है, हमारे लिए अच्छे नहीं हैं।  

आत्म-परिक्षण पूर्ण निश्चितता नहीं है

संत पापा ने कहा कि आत्म-परिक्षण पूर्ण निश्चितता नहीं है क्योंकि इसका संबंध जीवन से है और जीवन सदैव तर्कसंगत नहीं होता है। जीवन के कई रुप हैं जिन्हें हम सिर्फ एक विचार की तरह पिरोकर नहीं रख सकते हैं। हमारी चाह होती है कि हम यह जानें कि हमें क्या करने की आवश्यकता है लेकिन जब उन्हें करने की बात होती तो हम उन्हें जानते हुए भी सदैव अपने कार्यों में नहीं करते हैं। हमने कितनी बार जीवन में संत पौलुस के विचारों को अनुभव किया है, “मैं अच्छाई को नहीं करता जिन्हें मैं करना चाहता हूँ बल्कि बुराई करता जिन्हें मैं नहीं करना चाहता हूँ”(रोम. 7. 19)। मानव के रुप में हम केवल तर्क नहीं हैं, हम यंत्र नहीं हैं, हमें कार्य हेतु सिर्फ निर्देशों की जरूर नहीं है।

संत मरकुस के सुसमाचार में येसु एक अपदूतग्रस्त व्यक्ति को चंगाई प्रदान करते हैं (मर.1.21-28)। कफरनाहूम के मंदिर में अपदूत ग्रस्ति व्यक्ति की मुक्ति ईश्वर के एक झूठे प्रतिरुप को तोड़ती है जिसे शैतान शुरू से हमारे लिए व्यक्त करता है, “ईश्वर हमारी खुशी नहीं चाहते है”। अपदूतग्रस्त यह जानता है कि येसु ख्रीस्त ईश्वर हैं लेकिन वह उन पर विश्वास नहीं करता है। इसके विपरीत वह कहता है,“आप मेरा सर्वनाश करने आये हैं” (24)।

ईश्वर दबाव नहीं डालते

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि हममें से बहुत से ख्रीस्तीय ऐसा ही सोचते हैं कि येसु ईश्वर के पुत्र हैं लेकिन हम यह संदेह करते हैं कि वे हमारी खुशी नहीं चाहते हैं। वास्तव में, हममें से कुछ यह सोचते हैं कि उनकी बातों को गंभीरता से लेना अपने जीवन का विनाश करना है, अपनी चाहतों और तमन्नाओं से अपने को दूर करना है। ऐसे विचार कभी-कभी हमारे जीवन में उठते हैं- कि ईश्वर हमारे जीवन से बहुत अधिक मांग करते हैं और हम अधिक मांग करने वाले ईश्वर से भयभीत हो जाते हैं। इस भांति, ईश्वर सचमुच में हमें प्रेम नहीं करते हैं। इसके विपरीत, ईश्वर से मिलन को हमने एक खुशी के रुप में निरूपित किया। संत पापा ने कहा,“जब प्रार्थना में मेरी मुलाकात ईश्वर से होती है तो मैं खुशी का अनुभव करता हूँ, हम सभों को खुशी होती है, यह कितनी सुन्दर बात है”। वहीं, दुःख या भय दूसरी ओर हमें ईश्वर से दूर करता है। “यदि तुम स्वर्गराज्य में प्रवेश करना चाहते हो तो नियमों का पालन करो” येसु ने उस धनी व्यक्ति से कहा (मत्ती.19.17)। दुर्भाग्यवश उस जवान युवक के लिए कुछ चीजें रोड़ा बनीं जिसके कारण वह अपने हृदय की चाहतों को पूरा नहीं कर पाता है, “वह भले गुरू का अनुसरण निकटता से नहीं कर पाया”। वह अपने में नेक चाह रखने वाला, गुणवान युवक था। उसने येसु से मिलने की पहल की थी लेकिन वह अपने प्रेम की दुविधा भरी स्थिति में था, उसके लिए धन अधिक महत्वपूर्ण था। निर्णय लेने हेतु येसु उस पर दबाव नहीं डालते हैं, लेकिन सुसमाचार के पद में हम पाते हैं कि वह व्यक्ति “उदास” होकर चला गया। वे जो ईश्वर से विमुख होते वे अपने जीवन में कभी खुश नहीं होते हैं चाहे उनके पास कितनी भी धनी संपति और संभवनाएँ क्यों न हो। येसु अपना अनुसरण करने हेतु हमपर कभी दबाव नहीं डालते हैं। वे हमें अपनी इच्छा को प्रकट करते हैं लेकिन वे हमें पूरी स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। यह येसु के संग हमारी प्रार्थना की अति सुन्दर चीज है, वे हमें पूरी स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। जबकि ईश्वर से दूरी हमें दुःखी कर देती है।

प्रार्थना का प्रभाव अनोखा

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि आत्म-परिक्षण अपने में सहज नहीं है क्योंकि जो दिखता है वह भ्रामक है लेकिन वहीं ईश्वर से संग हमारे घनिष्ठता धीरे से हमारी दुविधाओं और भयों को हमसे दूर करती और हम अपने जीवन में “ईश्वरीय ज्योति” का संचार होता पाते हैं जैसे कि संत योहन हेनरी न्यूमैन अपनी सुन्दर अभिव्यक्ति में हमें कहते हैं। संतगण दिव्य ज्योति से चमकते और अपने साधारण जीवन के द्वारा ईश्वर की उपस्थिति को प्रकट करते हैं जिसके फलस्वरुप असंभव चीजें संभव होती हैं। ऐसा कहा गया है कि एक दंपति जो लम्बें समय तक एक साथ रहते हैं एक दूसरे को प्रतिबिंबित करते हैं। एक प्रभावकारी प्रार्थना के बारे में भी कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है- यह धीरे-धीरे लेकिन प्रभावकारी ढ़ंग से हमें चीजों को समझने में मदद करती है, हम यह एहसास करते हैं मानो हृदय की गहराई से फूट कर कुछ चीज निकल रही हो।

हम इस कृपा की याचना करें, कि हम ईश्वर के संग एक मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित कर सकें जैसे की हम अपने दोस्तों के संग वार्ता करते हैं (आध्यात्मिक साधना 53)। हम एक दूसरे के लिए भी इसी कृपा की याचना करें कि हम येसु ख्रीस्त को अपने मित्र की भांति देख सकें जो सदैव हमारे संग निष्ठावान बन रहते हैं, वे हमें बैल्कमेल नहीं करते हैं, उससे भी बढ़कर वे हमारा परित्याग कभी नहीं करते हैं यद्यपि हम उनसे दूर चले जाते हों। संत पापा ने कहा, “वे हमारे हृदय द्वार के पास रहते हैं। वे चुपचाप खड़े रहते हैं क्योंकि वे हमारे प्रति सदैव निष्ठावान हैं”। हम उन्हें अपने हृदय में प्रेम से, घनिष्टता से पुकारे, अपने थोड़े शब्दों में ही लेकिन चिन्हों और अच्छे कार्य में। 

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28 September 2022, 15:59