खोज

संत पापाः क्रूसित येसु को निहारने में हमारी मुक्ति

कजाकिस्तान के नूर-सुल्तान में क्रूस विजय का समारोही मिस्सा बलिदान अर्पित करते हुए संत पापा ने क्रूस में निहित मानव मुक्ति पर चिंतन किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी- बुधवार 14 सितम्बर 2022 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने कजाकिस्तान की अपनी प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन नूर-सुल्तान में यूखरिस्तीय बलिदान अर्पित किया।

संत पापा फ्रांसिस ने क्रूस विजय के त्योहार का मिस्सा बलिदान अर्पित करते हुए अपने प्रवचन में कहा कि क्रूस मौत का फंदा है। यद्यपि आज हम क्रूस विजय का महोत्सव मनाते हैं क्योंकि क्रूस के इसी काठ पर येसु अपने को बलि अर्पित कर, प्रेम से पाप और दुनिया की बुराइयों पर विजय प्राप्त की। आज का पाठ हमें दो विरोधी साँप, एक कांटने वाला और दूसरा बचानेवाला का जिक्र करता है।

अविश्वास की सजा

संत पापा ने काटने वाले पहले सांप के बारे में जिक्र करते हुए कहा कि ये साँप उन लोगों को पुनः एक बार काटते हैं जो ईश्वर के विरूध भुनभुनाते हुए पाप करते हैं। ईश्वर के विरूध भुनभुनाना उन बातों की ओर हमारा ध्यान इंगित कराता है कि इस्रराएली जनता ईश्वर की प्रतिज्ञाओं और अपने विश्वास में कमजोर हो गयी थी। ईश प्रजा मरूभूमि से प्रतिज्ञात देश की ओर यात्रा करते हुए अपने में निराश और थक गयी थी। उनकी आशा धूमिल हो गई थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे ईश्वर द्वारा की गई प्रतिज्ञा को भूल गये थे। वे इस बात पर भी विश्वास नहीं करते हैं कि ईश्वर ही उन्हें समृद्धि के देश में प्रवेश करने हेतु अपनी शक्ति से विभूषित करेंगे।

साँप का प्रलोभन

संत पापा ने कहा कि यह कोई संयोग की बात नहीं कि एक बार ईश्वर में विश्वास नहीं करने के कारण वे जहरीले साँपों के द्वारा डंसे जाते हैं। उन्होंने धर्मग्रंथ की प्रथम पुस्तिका उत्पत्ति ग्रंथ की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुए पहले साँप के बार में कहा कि कैसे आदम और हेवा के हृदय को जहर से भर देता है जो ईश्वर पर संदेह करने लगते हैं। साँप के वेश में शैतान उन्हें फुसलाते हुए कहता है कि ईश्वर अच्छे नहीं हैं, वे तुम्हारी स्वतंत्रता और खुशी से ईर्ष्या करते हैं, इस भांति वह उनमें अविश्वास के बीज बोता है। अब मरूभूमि में हम साँपों को पुनः पाते हैं जो जहरीले हैं। यह आदि पाप की वापसी है, इस्रराएली ईश्वर पर संदेह करते और उन पर विश्वास नहीं करते हैं। वे जीवनदाता ईश्वर के विरूद्ध भुनभुनाते और उनका विरोध करते हैं नतीजन उन्हें मृत्यु का शिकार होना पड़ता है। अविश्वासी हृदयों के साथ ऐसा ही होता है।

आत्म-निरक्षण करें

संत पापा ने कहा कि यहाँ हमें अपने व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन की परख करने का निमंत्रण दिया जाता है कि कब हम ईश्वर के प्रति और अपने भाई-बहनों के प्रति विश्वासी बने रहने में असफल होते हैं। हमने अपने जीवन की मरूभूमि में कितनी बार सूखेपन, हताशी और धैर्यहीनता का अनुभव करते हुए अपनी जीवन यात्रा लक्ष्य से भटक गये। उन्होंने एक कलीसिया, एक समाज और व्यक्तिगत रुप में अपने जीवन का आत्म-निरक्षण हेतु आहृवान किया जहाँ हम अविश्वास रूपी साँप के द्वारा काटे जाते, मोहभंग और हताश, निराशावाद और त्याग देने वाले जहर का अनुभव करते हुए अपने में बंद हो जाते तथा उत्साह की कमी का एहसास करते हैं।

शांति सह-अस्तित्व की भांति है

संत पापा ने कजाकिस्तान के दुखों की ओर ध्यान गड़ाते हुए कहा कि मैं इस देश के जहरीले हिंसा रुपी साँपों, नास्तिक उत्पीड़न और उन सभी कठिन परिस्थितियों की याद करता हूँ जहाँ लोगों की स्वतंत्रता और उनकी गरिमा को ठेस पहुंची। हमें उन्हें याद रखने की आवश्यकता है यदि ऐसा नहीं होता तो वे अतीत की बीती घटनाएं बन कर रह जायेंगी, और हम अपने में यह सोचेंगे कि हम सही मार्ग में हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शांति की स्थापना हमेशा के लिए एक बार नहीं होती है बल्कि सम्पूर्ण मानव विकास, सामाजिक न्याय, विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच एकता में सह-अस्तित्व की तरह होता है, जिसे हमें हर दिन नये सिरे से हासिल करने की जरुरत है। यदि हम कजाकिस्तान में “भ्रातृत्व, वार्ता और समझ को विकासित करने की चाह रखते तो हम सभों से निष्ठा की मांग की जाती है...हमें एकता के सेतु और दूसरे देशों और संस्कृतियों के संग सहयोग करने की जरुरत है”। इससे पहले, हमें चाहिए कि हम ईश्वर में अपने विश्वास को नवीकृत करें- हम ऊपर उनकी ओर निहारे और वैश्विक क्रूसित प्रेम से सीखें।

बचाने वाला साँप

संत पापा ने बचाने वाले साँप, दूसरे चिन्ह के बारे में कहा कि जहरीले साँपों के दंश से लोगों के मरने पर ईश्वर ने मूसा की विनय प्रार्थना सुनी और उसे कांसे का एक साँप बना कर डण्डे पर लगाने का निर्देश दिया। “यदि किसी को साँप काटता था तो वह काँसे के साँप की ओर दृष्टि डाल कर अच्छा हो जाता था”(गण.21.8-9)। यद्यपि हम कह सकते हैं कि ईश्वर क्यों उनके बीच से जहरीले साँपों को नहीं हटाते बल्कि मूसा को निर्देश देते हैं। यह ईश्वर का बुराई, पाप औऱ अविश्वास के संग कार्य करने के तरीके को व्यक्त करता है। ईश्वर मानव के बीच व्याप्त बुराई और बेकार की चीजों को समाप्त करने का चुनाव नहीं करते हैं। जहरीले साँप खत्म नहीं होते बल्कि वे सदैव रहते हैं, हमारा इंतजार करते, हमें काटने को तैयार रहते हैं। हम किसी चीज में परिवर्तन को पाते हैं, ईश्वर तब क्या करते हैंॽ

पाप और मृत्यु का जहर येसु में समाप्त

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार में येसु हमें कहते हैं कि जिस तरह मूसा ने मरूभूमि में साँप को ऊपर उठाया उसी भांति ईश पुत्र ऊपर उठाया जायेगा, जिससे जो कोई उनमें विश्वास करें उसे अनंत जीवन प्राप्त हो” (यो.3.14-15)। यह हमारे लिए निर्णयक परिवर्तन है, वह साँप जो हमें बचाता है आज हमारे बीच में है। येसु अपने क्रूस मरण द्वारा हम मृत्यु के जहरीले दंश से मरने नहीं देते हैं। अपने दुःखों और तकलीफों का सामना करते हुए वे हमें एक नई क्षितिज प्रदान करते हैं। यदि हम ईश्वर पर अपनी निगाहें बनाये रखते तो बुराई का दंश हमें प्रभावित नहीं करता है क्योंकि अपने क्रूस की शक्ति से उन्होंने पाप और मृत्यु की जहरीली शक्ति  को सदैव के लिए कुचल डाला है। दुनिया में फैल रही बुराई के संदर्भ में यह पिता का प्रत्युत्तर था जिन्होंने हमारे लिए अपने एकलौठे पुत्र को दिया। “मसीह का कोई पाप नहीं था, ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें  पाप का भागीदार बनाया” (2 कुरि.5.21)। संत पापा ने कहा कि हम कह सकते हैं कि वे क्रूस पर “एक साँप बने”  जिससे हम उनकी ओर दृष्टि गड़ाते हुए बुराई रुपी साँपों से बचे रहें।

येसु की मुक्ति अलग है

भाइयो एवं बहनों संत पापा ने कहा, “यह वह मार्ग है, हमारी मुक्ति का मार्ग, हमारे पुनर्जन्म और पुनरूत्थान-जहाँ हम क्रूसित येसु की ओर देखने हेतु बुलाये गये हैं”। क्रूस से हम अपने जीवन और अपने लोगों के जीवन इतिहास को एक नये तरीके से देख सकते हैं। क्रूस से हम प्रेम करना सीखते हैं न कि घृणा करना,करूणा न की उदासीनता, क्षमादान न की बदला लेना। येसु अपनी खुली बाहों से हमें आलिंगन करना चाहते हैं जो पिता ईश्वर की चाह है। हम उसी भ्रातृत्वमय प्रेम को एक-दूसरे के संग, हर किसी से साझा करने हेतु बुलाये जाते हैं। वे हमें ख्रीस्तीय प्रेम को दिखलाते हैं। यह शक्ति और प्रतिष्ठा का बलपूर्ण प्रयोग नहीं है। येसु से मिलने वाली मुक्ति हमारे लिए अलग ही है जो अपने में “यदि”, “ऐसा” या “लेकिन” जैसे बातें नहीं कहती बल्कि अपने में नम्र कृतज्ञ और सार्वभौमिक प्रेम है।

ख्रीस्तीय होना विषहीन जीवन जीना

संत पापा ने पुनः इस बात पर जोर दिया कि येसु ख्रीस्त क्रूस से बुराई रूपी साँप के सभी विष को दूर करते हैं। अतः ख्रीस्तीय होने का अर्थ विषहीन जीवन जीना है, एक-दूसरे की आलोचना नहीं करना, शिकायत, दोषारोपन और किसी की टीका-टिप्पणी नहीं करना, पाप रूपी बुराई को पृथ्वी में प्रसारित नहीं करने कहता जो अविश्वास से आती है। उन्होंने कहा कि हमारा पुनर्जन्म क्रूसित येसु के बेधित बगल से हुआ है। अतः हम मृत्यु के विष से अलग रहें और प्रार्थना कंरे कि हम ईश्वर की कृपा से पूर्ण ख्रीस्तीय बनते हुए नये जीवन की खुशी, प्रेम और शांति का साक्ष्य दे सकें। 

Thank you for reading our article. You can keep up-to-date by subscribing to our daily newsletter. Just click here

14 September 2022, 16:20