खोज

संत पापाः बुजुर्गावस्था जीवन का अति संवेदनशील पड़ाव

संत पापा फ्रांसिस ने संत योहन, सुसमाचार के अंतिम भाग पर चिंतन करते हुए बुधवारीय धर्मशिक्षा माला में बुजुर्गों और युवाओं के बीच कोमल संबंध पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 22 जून 2022 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

बुजुर्गों पर अपनी धर्मशिक्षा माला में, आज हम पुनर्जीवित येसु और पेत्रुस के बीच हुई वार्ता पर चिंतन करेंगे जो योहन के सुसमाचार का अंतिम भाग है (21.15-23)। यह एक हृदयस्पर्शी वार्ता है जहाँ हम येसु के प्रेम को उसके सभी शिष्यों, खास कर पेत्रुस और सारी मानवता के लिए चमकता हुआ पाते हैं। यह एक सुकोमल संबंध है जो उदासी भरी नहीं, वरन सीधी, मजबूत, स्वतंत्र और अपने में खुली है। सारी मानवता के संग यह एक सच्चाई का संबंध है। योहन का सुसमाचार अपने में अति आध्यात्मिक, अति उन्नत एक मार्मिक आग्रह के साथ खत्म होता है। यह हमारे लिए येसु और पेत्रुस के बीच प्रेम को उजागर करता है जो स्वाभाविक रूप में उनके मध्य एक वार्ता का सममिश्रण है। सुसमाचार लेखक हमें सचेत करते हैं कि वे हमारे लिए जीवन की वास्तविकताओं में सच्चाई का एक साक्ष्य प्रस्तुत करते (यो.21.24),जिनमें हमें सच्चाई को खोजने की आवश्यकता है।

येसु के संग हमारा संबंध

हम अपने में यह पूछ सकते हैं कि क्या येसु और शिष्यों के बीच संबंध की यह कोमलता हम अपने में पाते हैं, जो उनकी शैली के अनुरूप एकदम खुली, सुस्पष्ट, प्रत्यक्ष और मानवीय रुप में एकदम वास्तविक हैॽ येसु के संग हमारा संबंध कैसा हैॽ क्या यह शिष्यों की भांति हैॽ क्या हम बहुधा सुसमाचार के साक्ष्य को एक “मीठे” रहस्य की भांति व्यक्त करने के प्रलोभन में नहीं पड़ते जाते, जो हमारे जीवन की परिस्थिति को महिमामंडित करने की कोशिश करता होॽ यह व्यावहार, जो हमारे लिए सम्मान-सा लाता है, वास्तव में हमें येसु ख्रीस्त से दूर कर देता, यहां तक कि यह अपने में एक अति अमूर्त अवसर हो जाता है, जहाँ व्यक्तिगत हवाला देते हुए, हम अपने विश्वास को एकदम दुनियावी रुप में जीते हैं। यह य़ेसु का मार्ग नहीं है। येसु ईश्वर के शरीरधारी वचन हैं जो मानव के रुप में पेश आते हैं। वे हम से मनुष्य के रुप में, अपनी कोमलता, मित्रता और निकटता में बातें करते हैं। वे हमें अपने को मिठास स्वरुप में प्रस्तुत नहीं करते बल्कि वे हमारे निकट रहते हैं।

बुजुर्गावस्था और समय ढ़लना

संत पापा ने कहा कि  पेत्रुस के संग वार्ता में हम दो तथ्यों को पाते हैं, वे बुजुर्गावस्था और समय ढ़लने के बारे विशेष रुप से कहते हैं। प्रथम भाग में हम पेत्रुस को, येसु की चेतावनी के बारे में सुनते हैं, जवानी में तुम आत्मनिर्भर थे, बुजुर्गावस्था में तुम स्वयं और अपने जीवन के मालिक नहीं रहोगे। बुजुर्गावस्था में हम व्हीलचेर का उपयोग करने लगते हैं, हमारा जीवन ऐसा ही है। अपनी बुजुर्गावस्था में हम बीमारियों के शिकार हो जाते जिन्हें हमें स्वीकारने की जरुरत है। हममें युवाओं की भांति शक्ति नहीं रह जाती है। हमारा जीवन साक्ष्य भी बुजुर्गावस्था की कमजोरी संग आगे बढ़ेंगे। संत पापा ने कहा कि हमें अपने जीवन की कमजोरी, बीमारी और मृत्यु में भी येसु का साक्ष्य देना है। इन पदों के बारे में लोयोला के संत इग्नासियुस एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं,“येसु के शिष्यों रुप जैसे हम जीवन में उनका साक्ष्य देते वैसे ही हमें मृत्यु में भी उनका साक्ष्य देना है”। अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक हमें येसु का शिष्य बने रहने की जरुरत है जैसे कि ईश्वर हमें अपनी आयु के अनुरूप बातें करते हैं। सुसमाचार लेखक अपनी व्याख्या देते हुए कहते हैं कि येसु पेत्रुस की चरम साक्ष्य, शहादत और मृत्यु की ओर इंगित करते हैं। लेकिन हम इन पदों के सामान्य अर्थ को समझ सकते हैं कि हमारे जीवन में ख्रीस्त का अनुसरण हमारी कमजोरी, असहायता की स्थिति, दूसरों पर निर्भरता के द्वारा सीखते हुए परिष्कृत हो। येसु के अनुसरण हेतु हमारा विवेक हमारे विश्वास में कायम रहता है। “प्रभु आप जानते हैं मैं आप को प्रेम करता हूँ” (15.16.17) यहाँ तक की हमारे जीवन की कमजोरी और बुढ़ापे की परिस्थितियों में भी। येसु का अनुसरण सदैव बना रहता है, हमारे अच्छे स्वास्थ्य में, हमारी बीमारी में, आत्म-निर्भरता में, हमारी आत्म-निर्भरता की कमी में, लेकिन हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम सदैव उनके पीछे चलें। संत पापा ने कहा कि मैं बुजुर्गों की आंखों में आंखें मिलकर बातें करना पसंद करता हूँ, जो चमकती हैं, वे आंखें शब्दों से अधिक बोलती हैं, वे जीवन का साक्ष्य देती हैं। यह कितना अच्छा है, हमें इसे जीवन के अंत तक बनाये रखना है। हमें जीवन भर येसु का अनुसरण करना है।

हमारी कमजोरी, हमारी मजबूती

पेत्रुस के संग येसु की यह वार्ता शिष्यों के लिए, हम सब विश्वासियों के लिए एक मूल्यवान शिक्षा है। यह बुजुर्गों के लिए भी महत्वपूर्ण है। हम अपनी कमजोरी के क्षणों में जीवन का साक्ष्य देने हेतु सीखते हैं। जीवन की ऐसी परिस्थिति में हम अपने विश्वास को मजबूत होता पाते हैं, जीवन की ऐसी परिस्थितियों में भी येसु हमारे साथ रहते हैं, जहाँ हम जीवन की राह में अपने विश्वास की समृद्धि को पाते हैं।

संत पापा कहते हैं कि हमें पुनः अपने में पूछने की जरुरत है, क्या हममें एक आध्यात्मिकता है जो हमारे जीवन की उन परिस्थितियों को सही अर्थ में परिभाषित करता हो, जहां हम अपनी शक्ति पर आत्म-निर्भर रहने के बदले अपने को दूसरों में निर्भर पाते हैंॽ हम अपने जीवन की इन परिस्थितियों- समर्पित प्रेम, न्याय की चाह में पहल, कमजोरी के समय आश्रित रहना, जीवन को विदा कहने के क्षणों, जीवन में नेतृत्व से दूर रहने की स्थिति में कैसे निष्ठावान बने रहते हैंॽ यह अपने में सहज नहीं है।

येसु का अनुसरण

जीवन का यह नया मोड़ हमारे लिए निश्चय ही परीक्षा की एक घड़ी होती है। हम अपनी बुढ़ापे में नेतृत्व को धारण किये रखना चाहते हैं। अपनी बुजुर्गावस्था को स्वीकारने के द्वारा हम नेतृत्व में विराम लाते हैं। वहीं हम परिवार में, समाज में, मित्रमंडली में अपनी उपस्थिति को दूसरे रूपों में व्यक्त करते हैं। यह उत्सुकता पेत्रुस के लिए भी आती है। पेत्रुस उस शिष्य की ओर देखते हुए जिसे येसु प्रेम करते थे कहते हैं,“प्रभु इनका क्या होगाॽ” क्या उसे मेरा “अनुसरण” करने की जरुरत हैॽ क्या वह “मेरा” स्थान लेगाॽ क्या वह मेरा उत्तराधिकारी होगाॽ येसु स्पष्ट रुप में उसे कहते हैं,“इससे तुम्हें क्याॽ तुम मेरा अनुसरण करो”। तुम दूसरों की चिंता किये बिना अपने जीवन की राह में बढ़ते चलो। हमारे लिए यही आवश्यक है, हम अपने सम्पूर्ण जीवन में, जीवन के हर क्षण में येसु ख्रीस्त का अनुसरण करें। जब हम दूसरों के जीवन में ताक-झांक करने लगते तो येसु हमें कहते हैं, “इससे तुम्हें क्याॽ तुम मेरा अनुसरण करो।” यह कितना सुन्दर है। बुजुर्गों को इस बात से ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए कि युवाजन हमारी राह में चल रहे हैं, हमारा स्थान ले रहे हैं, हमसे आगे बढ़ते जा रहे हैं। अपनी वफादारी में प्रेम की शपथ लेना, विश्वास के कारण निष्ठा में बने रहना, यहां तक कि उन परिस्थितियों में भी जहाँ वे अपने जीवन को अलविदा कहने के करीब आते हैं, यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रशंसा की विषय होती और इसके लिए बुजुर्ग ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं। विदा लेने हेतु सीखना, बुजुर्गों की प्रज्ञा है। संत पापा ने कहा कि उन्हें चाहिए कि वे आनंदपूर्ण अपने जीवन से विदा लें। “मैंने अपना जीवन जीया, मैं अपने विश्वास में कायम रहा, मैं पापी था फिर भी मैंने अच्छे कार्य किये” यह कहना एक बुजुर्ग के लिए कितना सुन्दर है। विदाई के समय यह बुजुर्गों में शांति लाती है।

बुजुर्गों को निहारें

यहां तक ​​कि जबरदस्ती निष्क्रिय अनुसरण करना, जो उत्साहमय चिंतन और प्रभु के वचन को सुनने से आता है- जैसे कि लाजरूस की बहन मरियम ने किया- बुजुर्गों के जीवन का सबसे अच्छा हिस्सा बनता है। यह हमसे कभी छीना नहीं जायेगा (लूका. 10.42)। संत पापा ने कहा कि हम बुजुर्गों की ओर देखें और उनकी मदद करें जिससे वे अपनी प्रज्ञा को जी सकें और उस सुन्दरता और अच्छाई को हमें सौंप सकें। हम उनकी सुनें। उन्होंने बुजुर्गों को युवाओं की ओर प्रेम भरी दृष्टि से देखने का आहृवान किया जिससे वे बोयी गई चीजों को आगे ले सकें। एक बुजुर्ग युवा को देखे बिना और युवाजन बुजुर्गों को ओर निहारे बिना अपने में खुशी का अनुभव नहीं कर सकते हैं। 

Thank you for reading our article. You can keep up-to-date by subscribing to our daily newsletter. Just click here

22 June 2022, 16:03