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सन्त पापा फ्राँसिस, तस्वीरः 16.03.2022 सन्त पापा फ्राँसिस, तस्वीरः 16.03.2022   (ANSA)

ग्राविसिमुम एडुकासियोनिस न्यास के सदस्यों से सन्त पापा फ्राँसिस

सन्त पापा फ्राँसिस ने "खंडित दुनिया में लोकतंत्र की शिक्षा" शीर्षक से आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेनेवाले ग्राविसिमुम एडुकासियोनिस नामक परमधर्मपीठीय न्यास के सदस्यों से शुक्रवार को मुलाकात कर उन्हें अपना सन्देश दिया।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 18 मार्च 2022 (रेई, वाटिकन रेडियो): सन्त पापा फ्राँसिस ने "खंडित दुनिया में लोकतंत्र की शिक्षा" शीर्षक से आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेनेवाले ग्राविसिमुम एडुकासियोनिस नामक परमधर्मपीठीय न्यास के सदस्यों से शुक्रवार को मुलाकात कर उन्हें अपना सन्देश दिया।

कब्जे की इच्छा से दूर रहें

न्यास के सदस्यों के समक्ष दिन के सुसमाचार पर चिन्तन करते हुए सन्त पापा फ्राँसिस ने कहा कि सन्त मत्ती रचित सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि प्रभु येसु आधिपत्य या किसी चीज़ पर कब्जे के प्रलोभन से हमें सावधान करते हैं।

उन्होंने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया कि सुसमाचारी दृष्टांत में निहित किरायेदार, दाख की बारी पर कब्जा करने की इच्छा से अंधे हो जाते हैं तथा हिंसा के उपयोग और मारने में भी संकोच नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि यह हमें याद दिलाता है कि जब मनुष्य ईश्वर के कार्य में एक सहयोगी के रूप में अपने व्यवसाय से इनकार करता है और ख़ुद को उसके स्थान पर रखने का प्रयास करता है, तो वह ईश सन्तान होने की गरिमा को खो देता है और अपने भाइयों का दुश्मन बन जाता है।

सन्त पापा ने कहा कि सृष्टि के संसाधन हर एक को उसकी ज़रूरत के अनुसार अर्पित किये गये हैं, ताकि कोई भी व्यर्थ का संग्रह न करे और न ही किसी अन्य को अभाव में जीना पड़े। इसके विपरीत, जब स्वार्थी अधिपत्य दिलों, रिश्तों तथा राजनीतिक और सामाजिक संरचनाओं में भर जाता है, तो लोकतंत्र का सार विषमय हो जाता है।

सर्वसत्तावाद और धर्म के प्रति उदासीनता

सर्वसत्तावाद और धर्म के प्रति उदासीनता पर चिन्तन करते हुए सन्त पापा ने स्मरण दिलाया कि सन्त जॉन पौल द्वितीय ने अपने विश्व पत्र चेन्तेसिमुस आन्नुस में इस तथ्य को रेखांकित किया था कि एक राज्य सर्वसत्तावादी तब होता है जब "वह राष्ट्र, समाज, परिवार, धार्मिक समुदायों और स्वयं लोगों को अवशोषित करने लगता है।" इस प्रकार सन्त पापा ने कहा कि वैचारिक उत्पीड़न का प्रयोग करके, सर्वसत्तावादी राज्य समाज के मूल्यों तथा व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते तथा स्वतंत्रता को दबा देते हैं।  

इसी प्रकार, सन्त पापा ने कहा, धर्म के प्रति उदासीनता या कट्टरपंथी धर्मनिरपेक्षता, जो वैचारिक होती है, लोकतंत्र की भावना को और अधिक सूक्ष्म तरीके से विकृत करती है: पारलौकिक आयाम को समाप्त कर वह किसी भी प्रकार के उदारीकरण, खुलेपन और सम्वाद की सम्भावना को शनैः- शनैः कमज़ोर कर देती है।

उन्होंने कहा कि जब परम सत्य को मान्यता नहीं दी जाती है, तब सत्ता के उद्देश्यों के लिए मानवीय विचारों एवं विश्वासों का आसानी से शोषण किया जा सकता है, जैसा कि सन्त पापा बेनेडिक्ट ने अपने विश्व पत्र कारितास इन वेरिताते में लिखा है, "वह मानवतावाद जो ईश्वर को अलग कर देता है वह मानवतावाद एक अमानवीय मानवतावाद है।"

लोकतंत्रवाद की शिक्षा

सन्त पापा ने कहा कि ग़लत एवं भ्रामक विचारधाराओं पर विजय पाने के लिये शिक्षा अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जिसके लिये आपका न्यास विभिन्न शिक्षा योजनाओं एवं पहलों द्वारा लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रसार हेतु सर्वाधिक प्रभावी रणनीतियों की तलाश द्वारा नित्य प्रयास करता आया है।

सन्त पापा ने कहा कि युवाओं में लोकतंत्रवाद की तृष्णा जगाना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि इसका अर्थ है एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने के मूल्य को समझाना और उसकी सराहना करने में उनकी मदद करना, जो हालांकि सदैव परिपूर्ण नहीं हो सकता है, तथापि नागरिकों की भागीदारी, विकल्पों के चयन, कार्रवाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने में सक्षम होता है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने कहा कि युवाओं को यह सिखाना ज़रूरी है कि प्रेम में सामान्य जन कल्याण और अच्छाई निहित है तथा यह कि सैन्य बल द्वारा इसका बचाव नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई समुदाय या राष्ट्र बलपूर्वक ख़ुद को मुखर करना चाहता है, तो वह अन्य समुदायों या अन्य राष्ट्रों की हानि के लिए ऐसा करता है तथा अन्याय, असमानता और हिंसा का प्रवर्तक बन जाता है। सन्त पापा ने कहा कि भले ही विनाश का रास्ता आसान लगे, यह बहुत अधिक मलवा पैदा करता है। इसके विपरीत, प्रेम ही वह तत्व है जो मानव परिवार को बचा सकता है।

सत्ता को सेवा रूप में जीना

सन्त पापा ने कहा कि सत्ता को सेवा के रूप में जीने के लिए युवाओं को शिक्षित करना नितान्त आवश्यक है। उन्होंने कहा, "समुदाय की सेवा में ख़ुद को लगाने के इच्छुक लोगों" को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है।"

उन्होंने कहा, "हम सभी सेवा के लिए बुलाये गये हैं, परिवार में, कार्य स्थलों में, सामाजिक जीवन में हम सेवा हेतु  बुलाये गये हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ईश्वर ने हमें कुछ भूमिकाएँ सौंपी हैं, जो कि हमारी व्यक्तिगत पुष्टि अथवा सन्तुष्टि के लिए नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि हमारे कामों से पूरे समुदाय का विकास हो सके।"

शिक्षा को विश्व के कल्याण का अस्त्र बनाने हेतु प्रयासों को जारी रखने हेतु न्यास के सदस्यों को प्रोत्साहन देते हुए सन्त पापा ने कहा कि यूक्रेन पर हो रहे आक्रमणों के परिप्रेक्षय में शिक्षा का महत्व और भी अधिक अर्थगर्भित हो उठता है, ताकि हम विश्व के समक्ष उन मूल्यों को नित्य बढ़ावा दें जो सार्वभौमिक भाईचारे को प्रोत्साहित कर प्रेम पर आधारित मानव परिवार की रचना में सक्षम बन सके।  

 

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18 March 2022, 11:30