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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

देवदूत प्रार्थना में पोप : हम खुले हृदय से ईश्वर की दया स्वीकार करें

संत पापा फ्रांसिस ने रविवार को देवदूत प्रार्थना के दौरान उड़ाव पुत्र के दृष्टांत पर चिंतन करते हुए कहा कि जब एक व्यक्ति का हृदय ईश्वर के हृदय के समान होता है तो वह व्यक्ति को पश्चाताप करते देखकर खुश होता है। हम भी ईश्वर की दया को ग्रहण करते हुए खुशी मनायें ताकि इस प्रकाश में हम अपने पड़ोसियों को देख सकेंगे।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 27 मार्च 2022 (रेई)- वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 27 मार्च को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, "प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।"

इस रविवार का सुसमाचार पाठ उड़ाव पुत्र के दृष्टांत को प्रस्तुत करता है (लूक.15, 11-32) यह हमें ईश्वर के हृदय के करीब लाता है, जो हमेशा दयालुता एवं कोमलता के साथ क्षमा करते हैं। वे बतलाते हैं कि ईश्वर पिता हैं, जो न केवल स्वागत करते बल्कि अपने उस पुत्र के लिए खुश होते और आनन्द मनाते हैं, जो अपनी सारी सम्पति उड़ा देने के बाद घर लौटता है। संत पापा ने कहा, "हम वही पुत्र हैं और यह सोचना हृदयस्पर्शी है कि पिता हमेशा प्यार करते एवं हमारा इंतजार करते हैं।"

अपना हृदय खोलना

किन्तु दृष्टांत में बड़ा भाई भी है जो अपने पिता से नाराज हो जाता है। यह हमें भी नाराज कर सकता है।" वास्तव में, हमारे अंदर यह पुत्र भी है, कम से कम उसका कुछ अंश, हम भी उनसे सहमत हो सकते हैं: उसने हमेशा अपना कर्तव्य पूरा किया था, घर कभी नहीं छोड़ा था इसलिए अपने पिता को उस भाई का आलिंगन करते देख क्रोधित हो गया, जिसने खराब जीवन जीया था। वह विरोध करते हुए कहता है "मैंने आपको कई सालों तक सेवा दी और आपके आदेश की कभी अवहेलना नहीं की। जबकि आपने उस बेटे के लिए उत्सव मनाया।" (29-30) मैं आपको नहीं समझता। यह बड़े बेटे की शिकायत है।

खुश होना और आनन्द मनाना

इन्हीं शब्दों से बड़े बेटे की समस्या उत्पन्न होती है। पिता के साथ संबंध में वह सब कुछ का आधार उनका आज्ञापालन, जिम्मेदारी की भावना को मानता है। संत पापा ने कहा, "यह हमारी भी समस्या हो सकती है, हमारे एवं ईश्वर के साथ, उस दृष्टिकोण को खो देना कि वे पिता हैं और एक दूरस्थ धर्म को मानना जो निषेधों और कर्तव्यों से बना हो। इस दूरी के परिणाम स्वरूप वह पड़ोसियों के प्रति कठोर हो जाता है जो अपने आपको एक भाई के रूप में नहीं देखता। दृष्टांत में बड़ा बेटा अपने पिता के पास मेरा भाई नहीं कहता, बल्कि आपका बेटा कहता है, मानो कह रहा हो कि वह उसे भाई नहीं मानता। और अंत में वह खुद घर से बाहर होने का खतरा मोल लेता है। वह कहता है, "मैं प्रवेश करना नहीं चाहता," क्योंकि वहाँ छोटा भाई था।  

इसे देखकर पिता उसे बुलाने बाहर आते हैं, "बेटा तुम तो हमेशा हमारे साथ रहे और यह सब कुछ तुम्हारा ही है (31) वे उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि उनके लिए उनके बच्चे ही जीवन हैं। संत पापा ने कहा कि माता-पिता इस बात को समझते हैं, वे ईश्वर के बहुत करीब होते हैं। एक पिता एक उन्यास में सुन्दर बात कहता है : जब मैं एक पिता बना, तब मैंने ईश्वर को समझा।" दृष्टांत में पिता बड़े बेटे के हृदय को खोलता है और दो जरूरतों को व्यक्त करता है जो आदेश नहीं बल्कि हृदय की जरूरत थी। वे इस प्रकार कहते हैं, "परन्तु आनन्द मनाना और उल्लसित होना उचित ही था क्योंकि तुम्हारा यह भाई मर गया था और फिर जी गया, यह खो गया था और मिल गया।"(32)" आइये, हम गौर करें कि आनन्द मनाने और उल्लसित होने की पिता की ये इच्छाएँ क्या हमारे हृदयों में भी हैं?

पश्चाताप करनेवालों के निकट आना

संत पापा ने कहा, "उनके लिए आनन्द मनाना जो पश्चाताप करते हैं या पश्चाताप करने के रास्ते पर होते हैं, जो संकट में हैं अथवा दूर हैं उन्हें अपना सामीप्य प्रकट करना चाहिए।" हमें क्यों ऐसा करना चाहिए? क्योंकि यह हमें भय और निराशा से ऊपर उठने में मदद देता है, जो अपनी गलतियों को याद करने से आता है। जिन लोगों ने गलती की है, वे अक्सर अपने ही दिल से बदनामी महसूस करते हैं; उन्हें दूरी, उदासीनता और तीखे शब्द मदद नहीं करते। इसलिए, पिता के अनुसार, दिल से उसका स्वागत किया जाना चाहिए, जो उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। एक खुला हृदय, सच्चाई से सुनने, पारदर्शी मुस्कान कितना अच्छा कर सकता है, सहज महसूस करा सकता है। पिता कह सकता था, ठीक है बेटा घर वापस आ जाओ, अपना काम पुनः शुरू करो, और यह एक अच्छी क्षमाशीलता हो सकती थी किन्तु नहीं, ईश्वर आनन्द मनाये बिना क्षमा नहीं करते। उन्हें खुशी हो रही है क्योंकि उनका बेटा वापस आ गया है।

हृदय ईश्वर के समान होना

और पिता के अनुसार हमें आनन्द मनाना है। जिनका हृदय ईश्वर के समान है वह किसी व्यक्ति को पश्चाताप करते देख आनन्द मनाता है, चाहे वह कितनी भी बड़ी गलती क्यों न की हो। वह गलतियों में स्थिर बना नहीं रहता, बुराई पर अंगुली नहीं दिखाता, लेकिन अच्छाई पर प्रसन्न होता है क्योंकि पिता की अच्छाई हमारी भी अच्छाई है। संत पापा ने कहा, "क्या हम दूसरों को इस तरह देखना जानते हैं? तब संत पापा ने एक कहानी बतलायी। तीन या चार साल पहले उड़ाव पुत्र पर एक संगीत (पॉप ओपेरा) कार्यक्रम था....और कहानी के अंत में जब वह बेटा पिता के पास लौटने का विचार करता है तब वह अपने एक मित्र से मिलता और इसके बारे उसे बतलाता है, "जानते हो, मैं डर रहा हूँ कि कहीं मेरे पिता मुझे अस्वीकार न कर दें, मुझे क्षमा करने से इंकार न कर दें तब उसका मित्र सलाह देता है, कि अपने पिता के पास एक पत्र लिखे और कहे कि पिताजी मैं माफी मांगता हूँ, मैं घर लौटना चाहता हूँ किन्तु मैं नहीं जानता कि आप स्वीकार करेंगे, यदि आप मुझे स्वीकार करना चाहते हैं तो खिड़की पर एक सफेद रूमाल लगा दीजिएगा।" तब वह चलने लगा और जब वह घर के निकट पहुँचा तो क्या देखता है कि खिड़की में न केवल एक रूमाल बल्कि अनेक रूमाल टंगे थे। इस तरह पिता पूर्ण आनन्द के साथ हमारा स्वागत करते हैं। ये ही हमारे पिता हैं।  

संत पापा ने चिंतन करने हेतु प्रेरित करते हुए कहा, "क्या हम दूसरों के लिए खुश होना जानते हैं? कुँवारी मरियम हमें ईश्वर की करुणा को स्वीकार करने में मदद दे ताकि यह प्रकाश बन जाए जिसमें हम अपने पड़ेसी को देख सकें।"

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपने प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

देवदूत प्रार्थना में संत पापा का संदेश

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27 March 2022, 17:17