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संत पापा फ्राँसिस ब्रातिस्लावा के संत मार्टिन महागिरजाघर में धर्माध्यक्षों, पुरोहितों,  धर्मबहनों, गुरुकुल के छात्रों और प्रचारकों संदेश देते हुए संत पापा फ्राँसिस ब्रातिस्लावा के संत मार्टिन महागिरजाघर में धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, धर्मबहनों, गुरुकुल के छात्रों और प्रचारकों संदेश देते हुए 

कलीसिया को स्वतंत्रता, रचनात्मकता, संवाद की आवश्यकता, संत पापा

संत पापा फ्राँसिस स्लोवाकिया के धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, धर्मबहनों, गुरुकुल छात्रों और प्रचारकों को सुसमाचार की स्वतंत्रता, विश्वास की रचनात्मकता और एकता को बढ़ावा देने वाले संवाद में उदार कलीसिया के लिए काम करने हेतु प्रोत्साहित किया।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

ब्रातिस्लावा,सोमवार 13 सितंबर 2021 (रेई,वाटिकन न्यूज) : अपनी प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन सोमवार, 13 सितंबर को संत पापा फ्राँसिस ने ब्रातिस्लावा के संत मार्टिन महागिरजाघर में धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, धर्मबहनों, गुरुकुल के छात्रों और प्रचारकों से मुलाकात की।

संत पापा ने महाधर्माध्यक्ष स्तानिस्लाव को स्वागत भाषण के लिए धन्यवाद दिया। संत पापा उनसे मिलने की खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उनके बीच आये हैं ताकि वे उनके अनुभव, उनके सवालों और अपने देश एवं कलीसिया के लिए उनकी इच्छाओं व आशाओं को सुन सकें। संत पापा ने कहा कि प्रारंभिक कलीसिया एकसाथ मिलकर प्रार्थना करती थी और एक साथ आगे बढ़ती थी। हमें भी उन्हीं के समान साथ चलने की जरुरत है। एक कलीसिया जो एक साथ चल सकती है, वो जीवन के पथ पर सुसमाचार की जीवित ज्वाला को ऊंचा रखती है। कलीसिया इस संसार में ईश्वर के प्रेम और शांति के राज्य की खमीर है। अतः  हमें सांसारिकता और भव्यता के बहकावे से बचाये रखना होगा।

दुनिया के भीतर जीती है कलीसिया

संत पापा ने कहा कि एक उदार कलीसिया की सुन्दरता इसमें है कि वो दुनिया से अलग नहीं है,  लेकिन दुनिया के भीतर जीवन को एक अलग नजर से देखती है। दुनिया के भीतर रहने का अर्थ है लोगों की समस्याओं, आशाओं और अपेक्षाओं को साझा करने और समझने के लिए तैयार रहना। यह हमें अपने आत्म-केंद्रित होने से बचायेगा। हमें अपने लिए, अपनी संरचनाओं के लिए, समाज हमारे बारे में क्या सोचता है, ऐसी अनावश्यक चिंता छोड़नी होगी। इसके बजाय, हमें लोगों के वास्तविक जीवन में सहभागी होने और खुद से पूछने की ज़रूरत है कि उनकी आध्यात्मिक ज़रूरतें और अपेक्षाएँ क्या हैं? वे कलीसिया से क्या उम्मीद करते हैं? इन सवालों के जवाब देने की कोशिश करना ज़रूरी है। इन सवालों का जवाब में संत पापा ने तीन शब्दों स्वतंत्रता, रचनात्मकता एवं संवाद पर प्रकाश डाला।

स्वतंत्रता

संत पापा ने कहा, “स्वतंत्रता के बिना, कोई सच्ची मानवता नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य को स्वतंत्र होने के लिए स्वतंत्र बनाया गया था। आपके देश के इतिहास के दुखद अध्याय एक महान सबक प्रदान करते हैं: जब भी स्वतंत्रता पर हमला किया गया, उसका उल्लंघन किया गया या उसका दमन किया गया तो मानवता को विकृत कर दिया गया और समाज में हिंसा, जबरदस्ती और अधिकारों के उन्मूलन का तूफान आया।

स्वतंत्रता एक बार और सभी समय के लिए अपने आप से प्राप्त नहीं की जा सकती। यह एक प्रक्रिया है, कभी-कभी थका देने वाली और कभी-कभी नवीनीकरण की आवश्यकता होती है। स्वतंत्रता हमारी पसंद, विवेक और दृढ़ता के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी की मांग करती है। बाइबिल में हम पाते हैं कि इस्राएली मिस्र में राजा फराऊँ के अत्याचार के अधीन पीड़ित थे, वे दास थे और फिर यहोवा ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया। अपने शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए और सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव करने के लिए, उन्हें एक कठिन यात्रा करनी पड़ी, रेगिस्तान को पार करना पड़ा। कठिनाईयों का सामना करते वक्त वे सोचने लगे: “क्या हम पहले से बेहतर नहीं थे? कम से कम हमारे पास कुछ प्याज थे।" यह महान प्रलोभन है: स्वतंत्रता में शामिल प्रयास और जोखिम से बेहतर कुछ प्याज। संत पापा ने कहा कि कलीसिया में भी इस तरह की परिस्थितियाँ आती है जब हम जोखिमों का सामना करने के बजाय प्याज याने रेडीमेड उत्तर और आराम की खोज करने लगते हैं।

 एक कलीसिया जिसके आध्यात्मिक जीवन में भी स्वतंत्रता के साहसिक कार्य के लिए कोई जगह नहीं है। कलीसिया चाहती है कि सभी समान रुप से सोचें, आँख बंद किये सभी नियमों का पालन करें। जहाँ किसी को अपने विचारों को प्रकट करने की स्वतंत्रता न हो। कुछ लोगों को इसकी आदत हो सकती है। लेकिन कई अन्य - विशेष रूप से युवा - एक ऐसे विश्वास से आकर्षित नहीं होते हैं जो उन्हें कोई आंतरिक स्वतंत्रता नहीं छोड़ता है।

संत पापा ने विशेष रुप से धर्माध्यक्षों और पुरोहितों से कहा कि वे ईश्वर के साथ एक परिपक्व और मुक्त संबंध के लिए लोगों को प्रशिक्षित करने से न डरें। यह दृष्टिकोण, यह आभास दे सकता है कि आप अपने नियंत्रण, शक्ति और अधिकार को कम कर रहे हैं, फिर भी प्रभु की कलीसिया विवेक पर हावी होने और रिक्त स्थान पर कब्जा करने की कोशिश नहीं करती, बल्कि लोगों के जीवन में आशा का "स्रोत" बनती है। इस देश में कई लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं शुरू की गई हैं, लेकिन स्वतंत्रता नाजुक बनी हुई है। इस कारण से उन्हें कठोर धार्मिकता से मुक्त होने में मदद करें। सुसमाचार की घोषणा मुक्तिदायक हो, कभी दमनकारी न हो। कलीसिया स्वतंत्रता और स्वागत का प्रतीक बने!

रचनात्मकता

संत पापा ने कहा कि स्लोवाकिया की कलीसिया को एक महान परंपरा विरासत में मिली है। उनकी धार्मिक विरासत संत सिरिल और मेथोडियुस के उत्कृष्ट सुसमाचार प्रचार और प्रेरिताई से पैदा हुई थी। वे हमें सिखाते हैं कि सुसमाचार प्रचार केवल अतीत की पुनरावृत्ति नहीं है। सुसमाचार का आनंद हमेशा मसीह हैं, लेकिन यह सुसमाचार समय और इतिहास के माध्यम से जिन मार्गों से गुजरती है, वे भिन्न हो सकते हैं। सुसमाचार के प्रचार के जुनून में, उन्होंने बाइबिल के अनुवाद के लिए एक नई वर्णमाला, धर्मविधि और ख्रीस्तीय सिद्धांत का भी आविष्कार किया। उन्होंने सुसमाचार प्रचार करने के लिए नई भाषाओं का आविष्कार किया; वे ख्रीस्तीय संदेश का अनुवाद करने में रचनात्मक थे और वे उन लोगों के इतिहास के इतने करीब आ गए जिनसे उनका सामना हुआ कि उन्होंने उनकी भाषा सीखी और अपनी संस्कृति को आत्मसात किया। उनकी संस्कृति में विश्वास का बीज बोया। संत पापा ने उनसे प्रश्न किया कि संत सिरिल और मेथोडियुस के पदचिन्हों पर चलते हुए क्या स्लोवाकिया को भी आज इसकी जरूरत नहीं है? क्या यह शायद यूरोप के लोगों के सामने कलीसिया का सबसे जरूरी काम विश्वास की घोषणा करने के लिए नए "अक्षर" खोजना नहीं है? आज कई लोगों के लिए, वह परंपरा धार्मिक विरासत अतीत का अवशेष है। यह अब उनके जीवन जीने के तरीके को प्रभावित नहीं करता है। हमें उन लोगों के समान रचनात्मक होनी चाहिए जिन्होंने छत खोलकर लकवा व्यक्ति को येसु के सामने लाया। संत पापा कहा कि हमारे प्रेरितिक कार्यों में, मिस्सा के समय प्रवचन देने में रचनात्मक होना चाहिए। संत पापा ने जोर देते हुए कहा कि प्रवचन बहुत लम्बा न हो, अच्छी और रोचक होने के बावजूद विश्वासी लम्बे  समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते ।

संवाद

संत पापा ने कहा कि एक कलीसिया जो लोगों को आंतरिक स्वतंत्रता और जिम्मेदारी में प्रशिक्षित करती है, जो अपने इतिहास और संस्कृति में रचनात्मक होने में सक्षम है, दुनिया के साथ संवाद करने में भी सक्षम है, उन लोगों के साथ भी जो "हमारे" होने के बिना मसीह को स्वीकार करते हैं और यहां तक कि उनके साथ भी जो नास्तिक हैं। यह कलीसिया संत सिरिल और संत मेथोडियुस के नक्शेकदम पर चलते हुए, पूर्व और पश्चिम, विभिन्न परंपराओं और संवेदनाओं को एक साथ रखती है। एक समुदाय, जो प्रेम के सुसमाचार की घोषणा करते हुए, विश्वासियों के बीच, विभिन्न ख्रीस्तियों की स्वीकारोक्ति के बीच और लोगों के बीच मित्रता और संवाद को फलने-फूलने के लिए संभव बनाती है।

संत पापा फ्राँसिस ने इस बात को रेखांकित किया कि "एकता और संवाद हमेशा नाजुक होते हैं, विशेष रूप से एक दर्दनाक इतिहास की पृष्ठभूमि के खिलाफ जिसने अपने निशान छोड़े हैं," फिर भी घाव "हमेशा उनके मार्ग को बदल सकते हैं, जो प्रभु के घावों की नकल करते हैं।”

संत पापा ने एक कहावत को याद किया: "यदि कोई तुम पर पत्थर फेंके, तो उसे बदले में रोटी दो," यह कहावत हमें येसु के निमंत्रण की याद दिलाता है "हिंसा के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए सताने वालों के सामने दूसरा गाल भी प्रस्तुत करना।" हमें, भलाई करके बुराई पर काबू पाना है (सीएफ, रोमियों 12:21) संत पापा ने जेसुइट कार्डिनल कोरेज की कहानी को भी याद किया, जो सताए जाने, कैदी होने और जबरन श्रम की सजा दिए जाने के बाद बीमार पड़ गए थे। जब कार्डिनल वर्ष 2000 की जयंती के लिए रोम आए, तो वे काटाकुम्ब गए और अपने उत्पीड़कों के लिए मोमबत्ती जलाई, उनके लिए प्रभु से दया की याचना की। संत पापा ने कहा, "यह सुसमाचार है! यह जीवन में और इतिहास में विनम्र और धैर्यवान प्रेम के माध्यम से बढ़ता है।"

अंत में संत पापा ने उन्हें सुसमाचार की स्वतंत्रता में, विश्वास की रचनात्मकता में और उस संवाद में अपनी यात्रा में बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसका स्रोत ईश्वर की दया में है, जिसने हमें भाई-बहन बनाया है और हमें शांति एवं सद्भाव के निर्माता बनने के लिए बुलाया है। संत पापा ने सभी को पुनः धन्यवाद देते हुए अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

 

13 September 2021, 15:07