खोज

Vatican News

संत पापाः धर्म में विचारमंथन और कार्य का मेल

स्लोवाकिया के कलीसियाई एकतावर्धक सम्मेलन को अपने संबोधन में संत पापा फ्रांसिस ने आंतरिक गुलामी से बचने का आहृवान करते हुए सुसमाचार प्रचार और आपसी एकता हेतु दो उपाय सुझाये।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रोमवार, 13 सितम्बर 2021 (रेई) संत पापा ने स्लोवाकिया की अपनी प्रेरितिक यात्रा के पहले दिन रविवार को बातिस्लवा में एकतावर्धक कलीसियाई सम्मेलन के सदस्यों को संबोधित करते हुए उन्हें आंतरिक गुलामी से बचे रहे का आहृवान किया।

अपनी कृतज्ञता के भाव व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि मैं स्लोवाकिया में एक तीर्थ यात्री की भांति आया हूँ। मुझे आप से मिल कर आपार हर्ष हो रहा है। यह ख्रीस्तीय विश्वास की निशानी है और हम आशा करते हैं कि यह इस देश में एक बीज और भ्रातृत्व का खमीर बने।

आंतिरक गुलामा से बचे

आप के समुदायों ने सालों के अविश्वासी सतावट उपरांत एक नई शुरूआत की है जब धार्मिक स्वतंत्रता को घोर रुप में दबाया गया। अंततः स्वतंत्रता लौट कर आयी। आप सभी विश्वास में बढ़ोतरी की सुन्दरता का अनुभव करते हैं लेकिन वहीं आप इसका भी अनुभव करते हैं कि विश्वास की स्वतंत्रता को जीना कितना कठिन है। क्योंकि हम सदैव गुलामी की ओर लौटने की परीक्षा को पाते हैं जो शासन की गुलामी से भी बढ़कर बुरी, एक आंतरिक गुलामी है।

दोस्तोवेस्की ने इसके बारे में विस्तर से लीजेंड ऑफ द गैंड इनक्यूसिटर में व्याख्या की है। येसु दुनिया में आते और पुनः  एक बार कैद हो जाते हैं, वे येसु को मानव स्वतंत्रता पर अनावश्यक बल देने हेतु कोसते हैं। वे कहते हैं, “आप दुनिया में खाली हाथ जाना चाहते हैं, स्वतंत्रता के प्रतिज्ञा के साथ,  जिसकी वे अपनी सादगी और जन्मजात विकार में कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, स्वतंत्रता भयावह और भयानक है, क्योंकि मनुष्य के लिए स्वतंत्र होने से ज्यादा असहनीय कुछ नहीं हो सकता है।” (The Brothers Karamazov, Part II, Book V, Ch. 5) वे आगे कहते हैं मनुष्य एक आरामदायक गुलामी हेतु अपनी स्वतंत्रता का विनियम शीघ्रता से करता है, वह उसे उसके हाथों में देता जो उसके लिए निर्णय लेता है जब तक उसे भोजन और सुरक्षा प्राप्त होता है। वे यहाँ तक कि येसु को गाली देते हैं क्योंकि उन्होंने राजा बनना स्वाकीर नहीं किया, जिससे मनुष्यों के अंतःकरण को कुचला जा सके और शक्ति से शांति स्थापित की जा सके। इसके बदले येसु सदैव स्वतंत्र प्रदान करते हैं जबकि मानवता ऱोटी और छोटी चीजों के लिए रोती है।

अपने में सीमित होना खतरनाक

प्रिय भाइयो, यह हमारे साथ न हो। आइए हम एक-दूसरे की सहायता करें जिससे हम रोटी और छोटी चीजों में संतुष्ट होकर न रह जायें। यह अपने में खतरनाक है जब हम यह सोचते हैं कि सभी चीजें सामान्य हो गई हैं, जब हम सोचते हैं कि चीजें अपने में शांत हो गई हैं और हम शांति और चैन की आशा में अपने को स्थापित करने की सोचते हैं। तब हमारे जीवन का लक्ष्य “येसु से मिलने वाली स्वतंत्रता में नहीं रह जाता है” (गला. 2.4) उनकी सच्चाई जो हमें स्वतंत्र करती है (यो.8.32)। यहाँ यूरोप के हृदय से हम अपने में सवाल कर सकते हैं कि क्या हम ख्रीस्तियों ने सुसमाचार प्रचार और उसका साक्ष्य देने में अपने कुछ जोश को खो दिया हैॽ क्या सुसमाचार की सच्चाई हमें मुक्त करती हैॽ या हम अपने में यह सोचते हैं कि हम अपने में स्वतंत्र हैं क्योंकि हमने अपने लिए आरामदायक स्थानों को बना लिया है जो हमें सभी चीजों को नियंत्रण में रखने और बिना विचलित हुए शांति में आगे बढ़ने को मदद करता हैॽ रोटी और सुरक्षा से संतुष्ट क्या हमने एकता के उस मनोभाव को खो दिया है जिसके लिए येसु प्रार्थना करते हैं, एक एकता जो निश्चित तौर पर हमारे लिए प्रौढ़ स्वतंत्रता, सुदृढ़ निर्णय, सहनशीलता और त्याग से प्राप्त होती है, जो विश्व के लिए विश्वास का कारण बनता है (यो.17.21)ॽ हम केवल उन बातों की चिंता न करें जो हमारे व्यक्तिगत समुदाय के लिए हितकर है। हमारे भाइयों और बहनों की स्वतंत्रता भी हमारी स्वतंत्रता है क्योंकि हमारी स्वतंत्रता उनकी स्वतंत्रता के बिना अधूरी है।

प्रकाश बनने हेतु अपने को प्रकाशित करें

इस धरती पर सुसमाचार प्रचार की शुरूआत भ्रातृत्व में ईश बंधुओं सीरिल और थेसेलोनिया के मेथोदियुस के द्वारा हुई। ख्रीस्तीयता का साक्ष्य एकता और सुसमाचार प्रचार के जोश में प्रकट होता है, वे हमें येसु के नाम में अपने बीच भ्रातृत्वमय एकता को बढ़वा देते हुए इस यात्रा में बने रहने हेतु मदद करें। इस कार्य हेतु, हम अपने में कैसे यह आशा कर सकते हैं कि यूरोप ख्रीस्तीयता की जड़ों की पुनः खोज करे जब हम स्वयं अपने बीच पूर्ण एकता को मजूबत नहीं पाते हैंॽ हम यूरोप को आदर्शों से मुक्त होने का सपना कैसे देख सकते हैं जब हम व्यक्तिगत विश्वासी समूहों की आवश्यकताओं के मध्य येसु से आने वाली स्वतंत्रता को धारण करने में साहस की कमी का अनुभव करते हैॽ यूरोप को सुसमाचार से प्रभावित और समृद्ध होने की आशा करना अपने में कठिन है यदि यह सच्चाई हमें विचलित नहीं करती कि हम एक दूसरे की चिंता नहीं करते और अपने में पूर्ण एकता में नहीं हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ, ऐतिहासिक कारणों और राजनीतिक संबंध हमारे रास्ते में दुर्गम बाधाएं नहीं होनी चाहिए। संत सीरिल और मेथोदियुस “एकतावर्धकवर्ता के अग्रदूत” हैं वे हमें पवित्र आत्मा में विभिन्नताओं का मेल-मिलाप करने में हमारी सहायता करें। वे हमें एकरूपता के बिना, एक एकता में बने रहने हेतु मदद करें जो हमारे लिए येसु ख्रीस्त से आने वाली स्वतंत्रता की निशानी है, ईश्वर जो हमारे अतीत के बंधनों को ढीला करते और हमारे भय तथा चिंताओं से चंगाई प्रदान करते हैं।

संत पापा के दो सुझाव

अपने समय में संत सीरिल और मेथोदियुस ने ईश्वर के वचनों को अपनी भूमियों पर प्रस्फुटित होने दिया (यो.1.14)। संत पापा ने सुसमाचार की स्वतंत्रता और एकता को प्रसारित करने हेतु अपनी ओर दो भ्रातृत्वमय सुझावों को साझा किये। प्रथम को उन्होंने विचारमंथन की संज्ञा दी जो स्लाविक लोगों की विशेष पहचान के प्रस्तुत करती है। संत पापा ने कहा कि यह विचारमंथन की प्रक्रिया विश्वास के अनुभव में आधारित है जो दर्शनिक और ईशशास्त्रीय अवधारणओं से परे जाता है जिससे फलस्वरुप हम रहस्य का आलिंगन करते हैं। हम एक दूसरे में इस आध्यात्मिक परपरा को जगाने की कोशिश करें जो यूरोप के लिए अति आवश्यक है। पश्चिमी कलीसिया खास रूप से इसकी प्यासी है, जहाँ हमें ईश्वरीय आराधना की सुन्दरता को पुनः स्थापित करना है और इस संदर्भ में विश्वासी समुदाय को चाहिए कि वे कार्यक्रमों को संगठनात्मक दक्षता के तर्ज पर न देखें।

संत पापा फ्रांसिस ने कार्य करने को अपने दूसरे सुझाव के रुप में प्रस्तुत किया। एकता अपने में अच्छे विचारों और कुछ मूल्यों पर सहमति मात्र से हासिल नहीं की जा सकती है बल्कि इसके लिए मिलकर कुछ ठोस कार्य करने की आवश्यकता है क्योंकि वे हमें येसु के निकट लाते हैं। वे कौन हैंॽ वे गरीब है क्योंकि उनमें येसु उपस्थित रहते हैं (मत्ती.25.40)। करूणा के कार्य हमारी क्षितिज को विस्तृत करता है जिसके फलस्वरूप हम अपने पूर्वग्रहों और नसमझी पर विजय प्राप्त करते हैं। यह एक गुण के रुप में इस देश की एक महत्वपूर्ण परंपरा है जिसे बच्चे एक कविता की सुन्दर पंक्तियों के रुप में हृदय से सीखते हैं, “जब कोई अजनबी अपने हृदय में विश्वास के साथ हमारे द्वार पर दस्तक देता है, चाहे वह कोई भी है, चाहे वह निकट या दूर कहीं से भी आता हो, दिन या रात, ईश्वर का उपहार हमारी मेज पर प्रतीक्षा कर रहा होता है” (सामो, चालुपका, मोर हो, 1864)। ईश्वरका उपहार हमारे मेज में उपस्थित रहें जिससे यद्यपि हम एक ही यूखारिस्त भोज में सहभागी न भी हो, हम गरीबों की सेवा करते हुए येसु का स्वागत कर सकें। यह हजारों शब्दों के बदले एक शानदार निशानी होगी जिसके द्वारा नागर समाज इस को समझ सकेगा विशेष रुप से इस कठिन परिस्थिति में कि केवल सबसे कमजोरों के संग रहते हुए हम वर्तमान समय की महामारी से निजात पा सकते हैं।

 

 

13 September 2021, 15:23