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संत पापाः हृदय क्रूस की ओर उन्मुख करें

स्लोवाकिया के प्रेशव में संत पापा ने दिव्य उपासना की धर्मविधि में सहभागी होते हुए क्रूस की निशानी पर प्रकाश डाला और क्रूस का साक्षी बनने हेतु आहृवान किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 14 सितम्बर 2021 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने स्लोवाकिया की प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन प्रेशव में विजेनटाईन दिव्य उपासना की धर्म विधि में सहभागी हुए।

अपने प्रवचन में संत पापा फ्रांसिस ने कहा, “हम क्रूसित येसु को घोषित करते हैं... जो ईश्वर की शक्ति और ईश्वर का विवेक है।” संत पौलुस क्रूस के बारे में कहते हैं मानवीय ज्ञान के अनुसार यह एकदम भिन्न, एक “ठोकर” और “मूर्खता” है (1 कूरि.1.23-24)। क्रूस मृत्यु की एक निशानी है यद्यपि यह जीवन का स्रोत बना। यह एक अति दर्दनाक दृश्य था फिर भी इसके द्वारा ईश्वर के प्रेम की सुन्दरता प्रकट हुई। यही कारण है कि आज के पर्व में ईश प्रजा क्रूस की आराधना करती इसे धर्मविधि के रुप में मानती है। संत योहन का सुसमाचार हमें क्रूस के रहस्य को समझने में निर्देशित करता है। सुसमाचार लेखक स्वयं वहाँ, क्रूस के नीचे उपस्थित थे। येसु को निहारते हुए जो मरणशील क्रूस पर टंगे थे वे लिखते हैं, “उसने जो देख हैं वह उसका साक्ष्य देता है”(यो.19.35)। संत योहन उस घटना को देखते और उसका साक्ष्य देते हैं।

दुनिया की निगाहों में क्रूस असफलता की निशानी

संत पापा ने कहा कि हमारे लिए पहला कदम अवलोकन करना, देखना है। संत योहन ने क्रूस के नीचे खड़ा होकर क्या देखाॽ निश्चित ही उन चीजों को जिन्हें दूसरों ने देखाः येसु, एक निर्दोष और भले मनुष्य को जिन्हें दो अपराधियों के मध्य क्रूरतम मौत की सजा दी गई। मानव इतिहास के असंख्य अन्यायों में एक, एक खूनी बलि जो वर्तमान परिस्थिति का साक्ष्य है जो हमारी दुनिया को नहीं बदलता है, जहाँ अच्छे लोग फेंक दिये जाते और बुरे फलते-फूलते और बने रहते हैं। दुनिया की नजरों में क्रूस असफलता की निशानी है। हम भी अपने को इस जोखिम में घिरा पाते हैं जहाँ हम इस विचार से परे नहीं जा पाते, हम क्रूस को छिछली निगाहों से देखते हैं, हम भी क्रूस के संदेश को स्वीकारने में असफल हो सकते हैं कि येसु दुनिया की सारी बुराइयों को अपने ऊपर लेते हुए हमें बचाते हैं। हम अपने शब्दों के अलावे ईश्वर को स्वीकारने में असफल हो सकते हैं जो कमजोर और क्रूसित हुए, इस भांति हम अपने लिए एक ऐसे ईश्वर की कल्पना करते हैं जो शक्तिशाली और विजयी होते हैं। यह एक बड़ा प्रलोभन है। कितनी बार हम ख्रीस्तीयता को विजय धर्म के रुप में देखते हैं जो महत्वपूर्ण और प्रभावशाली है जिसकी महिमा होती और जिसे सम्मान मिलता है। यद्यपि एक ख्रीस्तीयता क्रूस के बिना दुनियादारी ख्रीस्तीयता है जो अपने में बंजर है।

निराशा का स्वादन, आशा का दान

संत योहन, वहीं दूसरी ओर क्रूस में ईश्वर की उपस्थिति और कार्य को देखते हैं। क्रूसित येसु में वे ईश्वर की महिमा को पहचानते हैं। उन्होंने देखा कि अपने स्वरुप के बावजूद येसु असफल नहीं होते बल्कि ईश्वर बने रहते हैं जो अपने को हर नर और नारी के लिए देते हैं। उन्होंने ऐसा क्यों कियाॽ वे अपने जीवन को बचा सकते थे, वे अपने को दुःख-तकलीफों से और मानव इतिहास की क्रूरता से दूर रख सकते थे। इसके बदले वे इतिहास में प्रवेश करना चुनते हैं, अपने को मानवीय इतिहास में डूबोते हैं। यही कारण है कि उन्होंने एक कठिनतम मार्ग- क्रूस का चुनाव किया। ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया का कोई भी हताशा-निराश व्यक्ति, अपने घोर दुःख, अंधेरे, परित्यक्त परिस्थिति, अपनी ठोकर और गलतियों में उसे खोजने और पाने हेतु निरूत्साह न हो। उस परिस्थिति में जहाँ हम ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव नहीं करते, वे वहाँ आते हैं। उन्हें मुक्ति देने के लिए जो निराश थे वे स्वयं अपने ऊपर घोर दुःख को लेते हुए निराशा का स्वादन करते हैं, वे क्रूस से पुकार कर कहते हैं, “मेरे ईश्वर, मेरे ईश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया हैॽ” (मत्ती.27.46, स्त्रो.22.1) एक कराह जो हमें बचाती है। यह हमें बचाती है क्योंकि ईश्वर स्वयं अपने में छोड़ दिये जाने का अनुभव करते हैं। अब हम, उनके साथ अपने में कभी अनाथ नहीं हैं।

क्रूस अपठित किताब न हो

संत पापा ने कहा कि हम कैसे क्रूस में महिमा को देखना सीखते हैंॽ कुछ संतगण हमें इसके बारे में सीखलाते हैं जिन्होंने क्रूस को किताब की तरह प्रस्तुत किया, जिसे जानने हेतु हमें उसे खोलकर पढ़ने की आवश्यकता है। केवल किताब खरीदना, उसे देखना और अपने घर के शेल्फ में रखना ही काफी नहीं है। क्रूस के साथ भी ऐसा ही है, हम इसे सभी जहाँ पाते हैं। क्रूस हमारे गले में, घरों में, गाड़ियों और थैलियों में मिलती है। इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता यदि हम रुक कर क्रूसित येसु की ओर नहीं देखते और अपना हृदय उनके लिए नहीं खोलते हैं। यदि हम अपने को उनके घावों से स्पर्श होने नहीं देते, हमारा हृदय उनके प्रेम से ओत-प्रोत नहीं होता और हम उनके घावों को देख आंसू नहीं बहाते तो क्रूस अपठित किताब की तरह ही रहता है जिसके लेखक और शीर्षक को हम जानते हैं लेकिन उसका प्रभाव हमारे जीवन में कुछ नहीं होता। हम क्रूस को केवल भक्ति की एक वस्तु, राजनीतिक निशानी, धार्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का चिन्ह तक ही सीमित न करें।  

येसु के क्रूस पर चिंतन करना हमें साक्ष्य देने दूसरे पायदान पर लेकर आता है। यदि हम येसु पर अपनी निगाहें गड़ायें तो हम उनके चेहरे को अपने में प्रतिबिंबित होता पाते हैं। उनके गुण, हमारे गुण बनते हैं, उनका प्रेम हमारे जीवन का अंग बनता और हमें परिवर्तित करता है। यहाँ हम उन शहीदों की याद करते हैं जिन्होंने ख्रीस्त के प्रेम का साक्ष्य देने हेतु अपना रक्त बहाया। जीवन की कठिन परिस्थितियों में, जब सारी चीजें बंद कर दी गई, विश्वास की घोषणा का बंद कर दिया गया वैसे परिस्थिति में भी उन्हें ख्रीस्त का साक्ष्य दिया। कितने ही उदार लोगों ने स्लोवाकिया में येसु के नाम पर अपने प्राणों की आहूति दी। यह उनके प्रेम का प्रतिफल था जिस पर उन्होंने चिंतन किया और जिसके लिए उन्हें अपनी जान दे दी।

क्रूस साक्ष्य की मांग, जीत नहीं

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि वर्तमान समय के बारे में भी सोचता हूँ जहाँ साक्ष्य देने के अवसरों का अभाव नहीं है। यहाँ हम उन लोगों को नहीं पाते जो ख्रीस्तीय को प्रताड़ित करते हैं जैसे कि विश्व के दूसरे स्थानों में होता है। यद्यपि हमारा साक्ष्य दुनियादारी और चलता है के मनोभाव के कारण अपने में कमजोर हो जाता है। क्रूस एक स्पष्ट साक्ष्य की मांग करता है क्योंकि यह कोई झण्डा नहीं जो हिलाया जाता बल्कि यह शुद्ध रुप में एक नये जीवन की निशानी है। यह सुसमाचार के धन्यवचनों की निशानी है। वह व्यक्ति जो क्रूस का साक्ष्य अपने हृदय में धारण करता है वह किसी को शत्रु की भांति नहीं देखता बल्कि वह सभों को अपने भाई-बहनों के रुप में देखता है जिनके लिए येसु ने अपने प्राण दिये। क्रूस का साक्ष्य आतीत की गलतियों में नहीं रहता और न ही वर्तमान समय में विलाप करता है। क्रूस के साक्षी धोखे और सांसारिक दिखावे के तरीकों को नहीं अपनाते हैं- वे अपने को दूसरों के ऊपर नहीं थोपते बल्कि अपने जीवन को दूसरों के लिए निछावर करते हैं। वे केवल अपनी भलाई नहीं चाहते जिससे वे धर्मियों की भांति देखें जायें, ऐसा होता तो यह धार्मिक आडम्बर होगा जो क्रूसित येसु का एक साक्ष्य नहीं है। क्रूस के साक्ष्यियों का केवल एक ही मनोभाव होता है जो स्वामी के कार्य करने का तरीका, जो नम्र प्रेम है। वे अपने में विजयी होने की चाह नहीं रखते क्योंकि वे जानते हैं कि ख्रीस्त का प्रेम उनके प्रति दिन के जीवन में फलप्रद होगा, जो सारी चीजों को अंदर से नवीन बनाता है जैसे कि एक बीज जमीन पर गिरता, मरता और जीवन देता है।

क्रूस ज्ञान में विश्वास का प्रसार

संत पापा ने कहा कि आप सभों ने इस तरह के साक्ष्यों को देखा है। आप उन लोगों की याद करें जिन्होंने आप के विश्वास को प्रोषित करते हुए इसे बढ़ने में मदद की है। नम्र, साधारण लोगों ने प्रेम के कारण अपने जीवन को अर्पित कर दिया है। वे हमारे नायक हैं हमारे प्रति दिन के नायक, उनके जीवन ने इतिहास को बदल दिया है। साक्ष्यों के द्वारा दूसरे साक्ष्यों की उत्पत्ति होती है क्योंकि वे जीवन देते हैं। विश्वास का प्रसार ऐसे ही होता है न कि दुनियावी शक्ति के द्वारा, यह क्रूस के ज्ञान से बढ़ता है, यह संरचनाओं में नहीं अपितु साक्ष्य में विकसित होता है। येसु आज भी हम सभों से कहते हैं, “क्या तुम मेरे साक्षी बनना चाहते होॽ”

कलवारी में योहन के साथ ईश्वर की माता खड़ी थीं। क्रूस की किताब को विस्तृत रुप में खुला और किसी ने नहीं देखा जैसे कि उन्होंने देखा है, वे हमें नम्र प्रेम का साक्ष्य देती हैं। उनकी मध्यस्थता द्वारा हम क्रूसित येसु के हृदय की ओर अभिमुख होने की कृपा मांगें। तब हमारा विश्वास अपने में फलहित होगा, तब हमारे साक्ष्य अपने में पूर्णरूपेण फलदायक होंगे।

 

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विजेनटाईन दिव्य उपासना धर्मविधि की तस्वीरें
14 September 2021, 16:02