खोज

Vatican News
बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा 

संत पापाः सुसमाचार एक है

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन में सुसमाचार के प्रति संत पौलुस के उत्साह पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम सुसमाचार से कोई समझौता नहीं कर सकते हैं।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 4 अगस्त 2021 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा पौल षष्ठम के सभागार में जमा हुए सभों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो सुप्रभात।

सुसमाचार और प्रेरिताई कार्य के संबंध में हम पौलुस को बहुत ही उत्साहित पाते हैं, इसके लिए वे अपने आप से बाहर चले जाते हैं। इसके सिवाय हम उनके जीवन में और दूसरी बातों को नहीं पाते हैं जो ईश्वर की ओर से उन्हें दिया गया है। सुसमाचार की घोषणा और प्रेरिताई का कार्य उनके लिए सब कुछ है जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित है। इसे घोषित करते हुए वे कहते हैं “ख्रीस्त ने मुझे बपतिस्मा देने हेतु नहीं वरन सुसमाचार घोषित करने को भेजा है (1. कुरू. 1.17)। पौलुस अपने जीवन के अस्तित्व को सुसमाचार की बुलाहट निरूपित करते हैं वे ख्रीस्त से संदेश को प्रसारित करने, सुसमाचार फैलाने जाते हैं। “धिक्कार मुझे यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ” (1 कुरू.9.16)। रोम के ख्रीस्तियों को लिखित अपने पत्र में वे अपने बारे में कहते हैं, “पौलुस, मसीह का सेवक, ईश्वर की ओर से चुना गया और सुसमाचार प्रचार के लिए नियुक्त किया गया है” (रोमि.1.1) यही उनकी बुलाहट है। संक्षेप में, वे इस बात से अवगत हैं कि उनका चुनाव सभों के बीच सुसमाचार को घोषित करने हेतु हुआ है और वे कुछ दूसरा नहीं बल्कि अपनी सारी शक्ति को इस प्रेरिताई हेतु समर्पित करते हैं।  

चार क्रियाओं में सुसमाचार की अभिव्यक्ति

यदि कारण है कि गलातियों के समुदाय से संबंधित उनकी उदासी, निराशा और यहाँ तक की उनकी कटुता को समझ सकता है, जो उनकी आंखों के सामने गलत दिशा में बढ़ रहे होते हैं जहाँ से वापस लौटना अपने में कठिन है। सारी चीजें धर्मग्रंथ के चारों और केन्द्रित हैं। पौलुस “चारों सुसमाचार” के बारे में नहीं सोचते हैं जैसा कि यह हमारे लिए स्वाभाविक है, सच्चाई यह है कि जब उन्होंने यह पत्र लिखा चारों सुसमाचार में से कोई भी नहीं लिखा गया था। उनके लिए सुसमाचार येसु ख्रीस्त की मृत्यु और पुनरूत्थान की घोषणा करना था, जो मुक्ति के स्रोत हैं। सुसमाचार को हम चार क्रियाओं में व्यक्त पाते हैं, “ख्रीस्त हमारे पापों के कारण मर गये, दफनाये गये, तीसरे दिन जी उठे और कैफस तथा बारहों को दिखाई दिये” (1 कुरू.15.3-5)। यह सुसमाचार प्रतिज्ञाओं की पूरिपूर्णत है और सारी मानव जाति के लिए मुक्ति का उपहार है। जो कोई इसे स्वीकार करता उसका मेल-मिलाप ईश्वर से होता, वह सच्चे पुत्र की भांति स्वीकारा जाता और अनंत जीवन का भागीदार बनता है।

विश्वास में स्वतंत्रता का सार

संत पापा ने कहा कि पौलुस इस बात को नहीं समझते पाते हैं कि इस महान उपहार को पाने के बाद भी गलातियों के समुदाय ने एक अन्य सुसमाचार को क्यों ग्रहण किया। हमें इस बात को ध्यान में रखने की जरुरत है कि उन ख्रीस्तीय समुदायों ने पौलुस के द्वारा घोषित किये गये सुसमाचार का परित्याग अबतक नहीं किया था। प्रेरित यह अनुभव करते हैं कि अब तक कुछ नहीं बिगड़ा है लेकिन उन्हें सक्त हिदायत देने की आवश्यकता है और वे इसे कठोरता से करते हैं। अपने पहले तर्क में वे नये सुसमाचार प्रचारकों के बारे में कहते हैं कि उनके द्वारा घोषित की गई बातें सुसमाचार नहीं हो सकती है। इसके विपरीत उनके द्वारा की गई सुसमाचार की घोषणा सत्य के सुसमाचार को विखण्डित करता है क्योंकि वह विश्वास में मिलने वाली लोगों की स्वतंत्रता में अड़चन उत्पन्न करता है। संत पापा ने कहा कि यहाँ हमारे लिए गौर करने वाली बात यह है कि विश्वास हमें स्वतंत्र होने में मदद करता है। गलातियों का समुदाय, एक नया विश्वासी समुदाय था अतः उनका विचलित होना हम समझ सकते हैं। वे मूसा द्वारा दी गई संहिता की जटिलताओं और उत्साह में येसु ख्रीस्त में मिले विश्वास को अब तक नहीं जान पाये थे, उन्होंने नये उपदेशकों की बातों को पौलुस द्वारा दिये गये संदेश का पूरक समझा।

सुसमाचार से कोई तोलमोल नहीं

प्रेरित इस निर्णयक विषय पर तोलमोल करने की जोखिम नहीं उठा सकते हैं। सुसमाचार एक है जिसकी घोषणा उन्होंने की है और कोई दूसरा सुसमाचार नहीं हो सकता है। हम इस बात पर ध्यान दें, पौलुस यह नहीं कहते हैं कि क्योंकि उन्होंने इन बातों की घोषणा की है अतः ये बातें सत्य हैं, नहीं। यह उनका अभिमान होगा, यह अपने में घमंण्ड की बात होती, बल्कि वे कहते हैं कि यह एकमात्र सच्चाई है क्योंकि यह येसु ख्रीस्त के बारे में है, दूसरे प्रेरित इसी सच्चाई को दूसरी जगहों में घोषित करते हैं। अतः वे लिखते हैं, “भाइयो, मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने जो सुसमाचार सुनाया, वह मनुष्य-रचित नहीं है। मैंने किसी मनुष्य से उसे न तो ग्रहण किया और सीखा, बल्कि उसे ईसा मसीह ने मुझ पर प्रकट किया” (गला.1.11.)। हम पौलुस के इन कठोर वचनों को समझ सकते हैं। वे दो बार “अभिशप्त हो” कहते हैं जो हमारा ध्यान इस ओर इंगित कराता है कि वे बातें जो हमारे विश्वास की जड़ों के हिलाती हैं उन्हें समुदाय से अलग रखा जाये। नये उपदेशक समुदाय के लिए खतरे की भांति हैं। अतः संक्षेप में कहें तो वे इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। सुसमाचार की सच्चाई से कोई समझौता नहीं, यह जिस रूप में हमारे लिए घोषित किया गया है या तो आप इसे ग्रहण करें या किसी दूसरी चीजों को। संत पापा ने जोर देते हुए कहा कि हम सुसमाचार से कोई तोलमोल नहीं कर सकते हैं। येसु ख्रीस्त में विश्वास कोई वस्तु नहीं जिसका तोलमोल किया जाये, यह मुक्ति है, यह मिलन है, यह उद्धार है। इसकी बिक्री नहीं होती है।  

सुसमाचार सदैव नवीन

इस स्थिति को पत्र के शुरू में विरोधाभाव स्वरुप वर्णन किया गया है क्योंकि ऐसा लगता है कि इसमें जो शामिल हैं वे अच्छी मनोभावनओं से प्रेरित हैं। गलाती जिन्होंने नये प्रेरितों की बातें सुनी अपने में यह सोचते हैं कि खतना के द्वारा वे ईश्वर की इच्छा को और भी करीब से पूरा करेंगे तथा पौलुस को अधिक प्रिय होंगे। पौलुस के विरोधी निष्ठा से प्रेरित हैं जो अपने पूवर्जों की रीति को जिसे उन्होंने अपने पुरखों से सीखा, नियमों के अनुपालन में सच्चे विश्वास की अभिव्यक्ति का एहसास करते हैं। अपनी निष्ठा की आड़ में वे अपनी जिद को सही ठहराते और पौलुस के प्रति शंका उत्पन्न करते हैं जिसे परंपरा के संबंध में अपरंपरागत माना जाता है। वहीं पौलुस अपने में इस बात से सजग हैं कि उनकी प्ररिताई ईश्वरीय दिव्यता से प्रेरित है जिसे पूरा करने हेतु वे पूरे जोश से आगे बढ़ते हैं। यह एक नवीन सुसमाचार है जो खत्म नहीं होता, यह कोई “फैशन” वाला सुसमाचार नहीं, यह सदा नया बन रहने वाला सुसमाचार है। उनका प्रेरितिक जोश उन्हें कठोर बनाता है क्योंकि वे नये ख्रीस्तियों को बड़ी जोखिम में देखते हैं। संक्षेप में, अच्छे इरादों के इस भूलभुलैया में दिव्य सत्य को समझने हेतु स्वयं को अलग करना आवश्यक है जो येसु, उनकी शिक्षा और पिता के प्रेम में हमारे लिए प्रकट होता है। संत पापा ने कहा कि यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि हम आत्मनिरिक्षण करना सीखें। हमने आतीत में और वर्तमान में भी इन बातों को देखा है कि कुछ उपदेशक अपनी तरह से सुसमाचार की शिक्षा देते हैं, कभी-कभी वे धर्मग्रंथ के अनुरूप सच्चे आदर्शों को घोषित करते लेकिन बहुधा यह “आन्दोलन” बन कर रह जाता है। वह ख्रीस्त का सुसमाचार नहीं वरन संस्थापक का सुसमाचार होता है यह शुरू में मददगार होता लेकिन अंतत फलदायक नहीं होता क्योंकि उनकी जड़े गहरी नहीं हैं। इसी कारण, पौलुस के स्पष्ट और निर्णायक वचन गलातियों के लिए हितकर थे और वे हमारे लिए भी लाभप्रद हैं। सुसमाचार हमारे लिए येसु ख्रीस्त का उपहार है, इसे वे हमारे लिए प्रकट करते हैं। यह वही है जो हमें जीवन देता है।

        

 

04 August 2021, 16:16