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आमदर्शन समारोह में धर्मशिक्षा देते संत पापा फ्रांसिस आमदर्शन समारोह में धर्मशिक्षा देते संत पापा फ्रांसिस 

संत पापाः मानव जीवन में संहिता का सार

संत पापा फ्रांसिस ने बुधवारीय धर्मशिक्षा माला में संहिता के सार को स्पष्ट किया जो येसु ख्रीस्त में एक नवीन अर्थ को प्राप्त करती और जीवन का कारण बनती है।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 18 अगस्त 2021 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा पौल षष्ठम के सभागार में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

संत पौलुस, येसु के प्रेम में मुक्ति को अच्छी तरह से समझते हैं, उन्होंने हमें इस बात की शिक्षा दी कि “प्रतिज्ञा की संतानों” (गला.4.28) स्वरुप हमें येसु ख्रीस्त में मुक्ति मिली है। हम सभी संहिता से बंधें नहीं हैं बल्कि हम सुसमाचार के अनुरूप एक उचित जीवन जीने हेतु आमंत्रित किये गये हैं। यद्यपि संहिता की दस आज्ञाएं अपने में बनी रहती हैं, लेकिन एक दूसरे रूप में। अतः आज की धर्मशिक्षा माला में हम अपने में यह सावल करते हैं, गलातियों के पत्रानुसार हमारे लिए संहिता की भूमिका क्या है? सुसमाचार पाठ में हमने सुना कि संत पौलुस संहिता को धर्मशास्त्र के रुप में प्रस्तुत करते हैं। यह एक अति सुन्दर चित्रण है जिसका अर्थ हमें सही रुप में समझने की आवश्यकता है, जिसकी चर्चा हमें अपने विगत धर्मशिक्षा माला में की।

संहिता का अर्थ 

संत पौलुस ख्रीस्तियों को इस बात की सलाह देते हैं कि वे मुक्ति विधान के इतिहास को, साथ ही उनके व्यक्तिगत जीवन को दो भागों में बांटें- ख्रीस्त में विश्वासी बनने के पहले और विश्वास प्राप्त करने के बाद का जीवन। इसके केन्द्र-विन्दु में हम येसु की मृत्यु और पुनरूत्थान को पाते हैं जिसकी घोषणा संत पौलुस विश्वास में करते हैं जो मुक्ति के स्रोत हैं। यह येसु ख्रीस्त हैं जिसमें विश्वास के कारण हम सबों ने मुक्ति पायी है। अतः संहिता के संदर्भ में, हम येसु ख्रीस्त में विश्वास को लेकर “शुरू” और “बाद” को पाते हैं क्योंकि संहिता अब भी, दस आज्ञाएं के रुप में है, लेकिन येसु ख्रीस्त के आने के पहले और बाद के मनोभावों में हम अंतर पाते हैं। पहले का इतिहास संहिता के अधीन था वहीं बाद का इतिहास पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देशित किया गया (गला.5.25)। यहां हम संत पौलुस को पहली बार “संहिता के अधीन” वाक्य को घोषित करते हुए सुनते हैं। इसमें अंतर्निहित अर्थ हमारे लिए एक नकारात्मक विचार को प्रकट करते हैं, जिसका तात्पर्य दासता से हैं। प्रेरित इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं जब कोई “कानून के अधीन” होता तो वह “सुरक्षा में” और “कैद” में रहता है, जो एक तरह से हिरासत में रहना है। संत पौलुस कहते हैं कि यह लम्बें समय तक मूसा से येसु के आने तक बना रहा, जो किसी के पाप में रहने तक कायम रहता है।  

संत पापा ने कहा कि संहिता और पाप की व्याख्या संत पौलुस रोमियों के नाम अपने पत्र में विशिष्ट रुप में कहते हैं जो गलातियों के नाम लिखे गये पत्र के कुछ सालों बाद लिखा गया। संक्षेप में, संहिता गलतियों को परिभाषित करती और लोगों को पापों का एहसास दिलाती है, या हम अपने सामान्य अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि नियम हमें पापों के लिए उत्प्रेरित करते हैं। रोमियों के नाम अपने पत्र में संत पौलुस लिखते हैं, “जब हम अपने दैहिक स्वभाव के अधीन थे, तो संहिता से प्रेरित पापमय वासनाएं हमारे अंगों में क्रियाशील थीं और मृत्यु के फल उत्पन्न करती थीं। किन्तु अब हम उन बातों के लिए मर गये हैं, जो हमें बंधन में जकड़ती थीं, इसलिए हम संहिता से मुक्त हो गये हैं (रोम.7.5-6)। क्यों ? क्योंकि येसु ख्रीस्त के द्वारा हमारे लिए मुक्ति आयी है। संत पौलुस संक्षेप में नियम के बारे में अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं,“मृत्यु का दंश तो पाप है और पाप को संहिता से बल मिलता है” (1 कुरि. 15.56)।

संहिता शिक्षाशास्त्र

इस संदर्भ में, हम संहिता की शैक्षणिक भूमिका के संदर्भ को पूरी तरह से समझते हैं। संहिता शिक्षाशास्त्र है जो हमें येसु की ओर ले चलती है। प्राचीन शिक्षण प्रणाली में, शिक्षण की वैसी कोई भूमिका नहीं थी जैसे कि आज है विशेषकर एक बालक या बालिका को शिक्षा हेतु सहयोग नहीं मिलता था। उस समय, वास्तव में वह एक दास की भांति थी जिसका कार्य स्वामी के पुत्र को गुरू के पास ले जाना और घर लाने का था। इस प्रकार उसका कार्य खतरों से उसकी रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना था कि वह अपने में उचित व्यवहार करता हो। शिक्षण का कार्य बल्कि अनुशासनात्मक था। जब लड़का वयस्क हो गया, तो शिक्षक का उत्तरदायित्व अपने में खत्म हो गया। जिस शिक्षक की की चर्चा संत पौलुस करते हैं वह शिक्षक नहीं वरन एक सहचर था जो लड़के के साथ स्कूल जाता था, लड़के की देखरेख करता था और उसे घर ले जाता था।

संहिता सकारात्मक किन्तु सीमित

इस संदर्भ में संत पौलुस संहिता की चर्चा इस्रराएल के इतिहास में उसके द्वारा अदा की गई भूमिका को स्पष्ट करने हेतु करते हैं। तोरा, संहिता ईश्वर की ओर से दिया गया लोगों के लिए महान कार्य था। आब्रहम के चुनाव उपरांत संहिता ईश्वर का द्वार दूसरा बड़ा कार्य था जिससे लोग अपने जीवन में आगे बढ़ सकें। इसमें निश्चित रूप से प्रतिबंधात्मक कार्य थे लेकिन यह लोगों की सुरक्षा करता था, यह उन्हें शिक्षित, अनुशासित और कमजोरियों से उनकी रक्षा करता था। यह विशेष रूप से गैर-ख्रीस्तियों से लोगों की रक्षा करता था क्योंकि उस समय उन बोलबाला था। अतः यही कारण है कि हम प्रेरित संत पौलुस को अवयस्क शब्दों की व्याख्या करते हुए पाते हैं,“जब उत्तराधिकारी अवयस्क है, वह सारी संपति होते हुए भी दास से किसी तरह भिन्न नहीं। वह पिता द्वारा निर्धारित समय तक अभिभावकों और कारिन्दों के अधीन है। उसी तरह, जब तक हम अवयस्क थे तब तक संसार के तत्वों के अधीन थे (गला.4.1-3)। संक्षेप में, संत पौलुस का विश्वास यह है कि संहिता का कार्य निश्चित रुप से सकारात्मक है किन्तु यह समयानुसार सीमित है। यह अपने को अधिक प्रसारित नहीं कर सकता क्योंकि यह व्यक्तिगत रुप से व्यक्तियों की प्रौढ़ता और उनकी स्वतंत्रता से संलग्न है। एक बार कोई अपने विश्वास को प्राप्त करता तो संहिता का प्रारंभिक मूल्य समाप्त हो जाता और किसी दूसरे का अधिकार प्रशस्त होता है। इसे स्पष्ट करते हुए संत पापा ने कहा कि संहिता खत्म हो गई अब येसु पर विश्वास करते हुए हम जो चाहे कर सकते हैं, ऐसा नहीं है। संहिता बनी हुए है लेकिन वह हमारा न्याय नहीं करती है। येसु ख्रीस्त हमारा न्याय करते हैं। संहिता को पूरा करना जरुरी है परन्तु वह हमारा न्याय नहीं करती है बल्कि येसु से मिलन द्वारा हमारा न्याय होता है। विश्वास का गुण येसु को ग्रहण करना है जिसके फलस्वरुप हमें अपने हृदय को खोलना है। हम संहिता का पालन करें लेकिन वे हमारे लिए येसु से मिलन हेतु सहायक बनें।

संहिता की सही समझ  

संत पापा ने कहा कि संहिता की महत्वपूर्णतः पर एक शिक्षण जरूरी है और इसका उचित रुप में प्रतिपालन भी जिससे यह हमारे लिए नसमझी का कारण न बने और हमें गलत मार्ग में अग्रसर न करे। हम अपने आप से यह पूछने की जरुरत है कि क्या हम अब भी उस समय में जीते हैं जहाँ हमें संहिता की जरूरत है? क्या हम अपने में पूर्ण रूपेण इस बात से वाकिफ हैं कि हम ईश्वरीय संतान होने की कृपा मिली है जिससे हम प्रेम में जीवनयापन कर सकें। संत पापा ने लोगों के मध्य कई सवाल रखे, मैं कैसे जीवन जीता हूँ? भय में कि यदि मैं ऐसा नहीं करता तो नरक जाऊँगा? या उस आशा में जहां येसु ख्रीस्त में मुझे मुक्ति का उपहार मिला है? वहीं दूसरी ओर क्या मैं संहिताओं को नकारता हूँ? नहीं। मैं उनका अनुपालन करूं लेकिन हूबहू नहीं क्योंकि मैं जानता हूँ कि येसु ख्रीस्त मेरा न्याय करते हैं।  

18 August 2021, 16:15