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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस   (Vatican Media)

देवदूत प्रार्थना में संत पापा : जीवन को हृदय से देखना शुरू करें

रविवार को देवदूत प्रार्थना के दौरान संत पापा फ्राँसिस ने संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में विश्वासियों को निमंत्रण दिया कि जीवन एवं दुनिया को हृदय से देखना शुरू करें। आज का सुसमाचार पाठ हमें स्मरण दिलाता है कि दूसरों को दोष देने के बदले हम अपने अंदर देखें और उसे शुद्ध करने के लिए ईश्वर से याचना करें जिससे कि हम विश्वास में बढ़ सकें।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटकिन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 29 अगस्त 2021 (रेई)- वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 29 अगस्त को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, "अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।"

आज की धर्मविधि का सुसमाचार पाठ कुछ सदुकियों एवं फरीसियों को प्रस्तुत करता है जो येसु के मनोभाव से आश्चर्य चकित होते हैं। वे ठोकर खाते हैं क्योंकि उनके शिष्य शुद्धीकरण की रीति की परम्परा को पूरा किये बिना भोजन करते हैं। वे आपसे में सोचते हैं कि "ऐसा करना धार्मिक अभ्यास के विपरीत है।" (मार.7,2-5)

संत पापा ने कहा, "हम भी अपने आप से पूछ सकते हैं : क्यों येसु और उनके शिष्य इन परम्पराओं का पालन नहीं करते हैं? आखिरकार, ये चीजें बुरी नहीं हैं बल्कि अच्छे धार्मिक संस्कार हैं, साधारण तौर पर, भोजन लेने से पहले धो लेना चाहिए। क्यों येसु ऐसा नहीं करते हैं?" उन्होंने कहा, "क्योंकि उनके लिए महत्वपूर्ण है विश्वास को उसके केंद्र में लाना।" सुसमाचार में हम लगातार देखते हैं : विश्वास को केंद्र में लाया जाना और उस खतरे से बचाया जाना जो सदुकियों के लिए और हमारे लिए भी लागू होता है कि बाह्य औपचारिकताओं को पूरा करना एवं हृदय तथा विश्वास को पीछे रखना। कई बार हम आत्मा का मेकअप करते हैं, बाहरी औपचारिकता पूरी करते और विश्वास को हृदय में नहीं रखते हैं : यह एक खतरा है। यह दिखावे की धार्मिकता का खतरा है। बाहर से अच्छा दिखाई देना जबकि हृदय को शुद्ध करने में असमर्थ होना। बाहरी भक्ति में हमेशा ईश्वर को व्यवस्थित करने का प्रलोभन होता है किन्तु येसु इस भक्ति के लिए तैयार नहीं होते हैं। येसु बाहरी दिखावा पसंद नहीं करते हैं वे ऐसा विश्वास चाहते हैं जो हृदय का स्पर्श करता है।  

वास्तव में, उसके तुरन्त बाद, वे लोगों को एक बड़ी सच्चाई के बारे बतलाने के लिए बुलाते हैं : "ऐसा कुछ भी नहीं है जो बाहर से मनुष्य में प्रवेश कर उसे अशुद्ध कर सके; बल्कि जो मनुष्य में से निकलता है वही उसे अशिद्ध करता है। (पद.15) क्योंकि बुरे विचार भीतर से अर्थात् मनुष्य के मन से निकलते हैं।" (21)  

 संत पापा ने कहा कि ये शब्द क्रांतिकारी हैं क्योंकि उस समय की मानसिकता के अनुसार ऐसा माना जाता था कि कुछ भोजन या बाह्य सम्पर्क ही व्यक्ति को अशुद्ध बना देते हैं। येसु इस दृष्टिकोण को बदलते हैं : जो बाहर से आता है वह व्यक्ति को हानि नहीं पहुँचाता बल्कि जो अंदर से आता है वही हानि पहुँचाता है।   

संत पापा ने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, "प्यारे भाइयो एवं बहनो, यह हमारे लिए भी है। हम बहुधा सोचते हैं कि बुराई बाहर से आती है, समाज के उन लोगों से जिनसे हम सम्पर्क करते हैं जो हमारी बुराई चाहते हैं।" कितनी बार हम हमारे साथ जो कुछ होता है उसके लिए दूसरों को, समाज को और विश्व को दोष देते हैं- कि यह दूसरों की, अधिकारियों की अथवा दुर्भाग्य की गलती है। और हम दोष देने में समय बिताते हैं किन्तु दूसरों को दोष देने में समय बिताना, समय बर्बाद करना है। हम क्रोधी बनते, कड़वे हो जाते हैं एवं ईश्वर को हमेशा हृदय से दूर रखते हैं। सुसमाचार के उन लोगों के समान जो शिकायत करते, जो ठोकर खाते, विवाद उत्पन्न करते और येसु को स्वीकार नहीं करते हैं। शिकायत करनेवाला व्यक्ति सच्चा संस्कारी नहीं हो सकता : गुस्सा करने, बदले की भावना रखने और उदास रहनेवाला व्यक्ति ईश्वर के लिए अपना द्वार बंद कर लेता है।

देवदूत प्रार्थना के दौरान संत पापा फ्रांसिस का संदेश

"आज हम प्रभु से निवेदन करें कि वे हमें दूसरों को दोष देने से मुक्त करें, हम प्रभु से कृपा की याचना करें कि हम शिकायतों द्वारा दुनिया को दूषित करने में समय नष्ट न करें, क्योंकि यह ख्रीस्तीय स्वभाव नहीं है। इसके विपरीत येसु हमें जीवन और दुनिया को देखने एवं हृदय से शुरू करने का निमंत्रण देते हैं। यदि हम अंदर देखेंगे तो करीब उन सभी चीजों को पायेंगे जिनसे हम बाहर घृणा करते हैं। और यदि हम ईमानदारी से ईश्वर से हृदय को शुद्ध करने की याचना करेंगे तो हम दुनिया को शुद्ध करना शुरू करेंगे क्योंकि यह बुराई को जीतने का एक अचूक रास्ता है कि हम अपने अंदर में इसे जीतना शुरू करें।" कलीसिया के पहले धर्माचार्यों, मठवासियों से जब पूछा जाता था, कि पवित्रता का मार्ग क्या है? मुझे किस तरह शुरू करना है? तो वे बतलाते थे कि पहला चरण है अपने आपको दोषी समझना। हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करना है। संत पापा ने प्रशन किया, "हम दिन में कितनी बार, दिनभर में कम से कम एक बार या सप्ताह में एक क्षण अपने को दोषी स्वीकार कर पाते हैं? ...संत पापा ने कहा कि अपने आपको दोषी स्वीकार कर पाना प्रज्ञा है। उन्होंने सभी विश्वासियों को ऐसा करने का प्रोत्साहन दिया।   

संत पापा ने माता मरियम से प्रार्थना करने का आह्वान करते हुए कहा, "कुँवारी मरियम जिसने अपने हृदय की शुद्धता से इतिहास को बदल दिया, हमें अपने हृदय को शुद्ध करने में मदद दे। सबसे पहले और सबसे बढ़कर दूसरों को दोष देने एवं सब कुछ में शिकायत करने की प्रवृति पर काबू पाते हुए।"

इतना कहकर संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरतिक आशीर्वाद दिया।

देवदूत प्रार्थना में संत पापा का संदेश

 

29 August 2021, 16:52