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रोमन मिस्सा ग्रंथ रोमन मिस्सा ग्रंथ 

1962 के रोमन मिस्सा ग्रंथ के उपयोग के संबंध में नए मानदंड

संत पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार को स्थानीय धर्माध्यक्षों को इसके उपयोग की अनुमति देने के निर्णय के लिए पूर्व-वाटिकन मिस्सा ग्रंथ के उपयोग को फिर से परिभाषित करने के लिए एक मोतु प्रोप्रियो प्रकाशित किया। पूर्व-वाटिकन धर्मविधि में भाग लेने वाले समूहों को द्वितीय वाटिकन महासभा और परमाध्यक्ष के मजिस्टेरियम द्वारा तय किए गए धर्मविधि सुधार की वैधता से इनकार नहीं करना चाहिए।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शनिवार 17 जुलाई 2021 (वाटिकन न्यूज) : दुनिया भर के धर्माध्यक्षों से परामर्श करने के बाद, संत पापा फ्राँसिस ने अपने पूर्ववर्ती,  संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें द्वारा 14 साल पहले दी गई 1962 के मिस्सा ग्रंथ के उपयोग को नियमित करने वाले मानदंडों को "रोमन धर्मविधि के असाधारण रूप" को संशोधित करने का निर्णय लिया है। संत पापा  फ्राँसिस ने 16 जुलाई2021 को मोतु प्रोप्रियो ‘ट्रडिशियोनिस कुस्तोदेस’ (परंपरा के संरक्षक) प्रकाशित किया है, जो 1970 से पहले रोमन धर्मविधि के उपयोग के बारे में है। संत पापा अपने मोतु प्रोप्रियो के साथ एक अन्य पत्र में अपने फैसले के पीछे के कारणों की व्याख्या करते है।

 मुख्य बिंदु

1962 के मिस्सा ग्रंथ के अनुसार मनाए जाने वाले मिस्सा समारोह अब पल्लियों में नहीं होंगे। धर्माध्यक्षों को स्थान  और दिन निर्धारित करना होगा जहाँ यह पवित्र मिस्सा मनाया जाएगा। यह आवश्यक है कि धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों द्वारा अनुमोदित अनुवादों का उपयोग करके पाठों को "स्थानीय भाषा में" घोषित किया जाए। धर्माध्यक्ष अनुष्ठाता को अपना प्रतिनिधि बनायेंगे। धर्माध्यक्ष को मूल्यांकन भी करना है कि "आध्यात्मिक विकास हेतु प्रभावशीलता" के अनुसार पूर्व-वाटिकन धर्मविधि के उत्सव को बनाए रखना है या नहीं। यह भी आवश्यक है कि नामित पुरोहित का मन न केवल पवित्र मिस्सा के अनुष्ठान में हो, बल्कि विश्वासियों के प्रेरितिक और आध्यात्मिक देखभाल भी हो। धर्माध्यक्षों को ध्यान रखना है कि वे "नए समूहों की स्थापना को अधिकृत न करें।"

इस मोतु प्रोप्रियो के प्रकाशन के बाद अभिषेक किए गए पुरोहित, जो पूर्व-वाटिकन मिस्सा समारोह का अनुष्ठान करना चाहते हैं, "उन्हें अपने धर्माध्यक्ष के पास औपचारिक अनुरोध प्रस्तुत करना चाहिए जो इस प्राधिकरण को देने से पहले परमधर्मपीठ से परामर्श करेंगे।" जबकि जो पुरोहित पहले से ही पूर्व-वाटिकन मिस्सा समारोह मनाते आ रहे हैं वे अपने धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष से इसे जारी रखने के लिए प्राधिकरण का अनुरोध कर सकते हैं। "पोंटिफिकल कमीशन एक्लेसिया देई द्वारा बनाए गए", समर्पित जीवन के लिए बने संस्थान और प्रेरितिक जीवन के समुदायों, अब धर्मसंघी जावन एवं धर्मसमाजियों की प्रेरिताई के लिए गठित परमधर्मपीठीय धर्मसंघ की क्षमता के अंतर्गत आएंगे। दिव्य उपासना के लिए गठित विभाग और समर्पित जीवन के संस्थानों के लिए बने विभाग इन नए प्रावधानों के पालन की निगरानी करेगा।

दस्तावेज़ के साथ लिखे पत्र में, संत पापा फ्राँसिस बताते हैं कि 1692 रोमन मिस्सा ग्रंथ के उपयोग के लिए उनके पूर्ववर्तियों द्वारा दी गई स्थापित रियायतें सबसे ऊपर "मॉनसिन्योर लेफेब्रे के आंदोलन के विरुद्ध मत के उपचार को बढ़ावा देने की इच्छा से प्रेरित थीं।" इस मिस्सा ग्रंथ के उपयोग का अनुरोध करने वाले विश्वासियों के सदस्यों की "न्यायसंगत आकांक्षाओं" का उदारतापूर्वक स्वागत करने के लिए धर्माध्यक्षों को निर्देशित अनुरोध भी "कलीसिया की एकता को बहाल करने के इरादे" से प्रेरित था। संत पापा फ्राँसिस ने देखा कि, "कलीसिया में कई लोग इस संकाय को संत पापा पियुस पांचवें द्वारा प्रख्यापित रोमन मिस्सा ग्रंथ को स्वतंत्र रूप से अपनाने और इसे संत पापा पॉल छठे द्वारा प्रख्यापित रोमन मिससा ग्रंथ के समानांतर उपयोग करने के रूप में मानते थे।"

संत पापा फ्राँसिस याद करते हैं कि मोतु प्रोप्रियो ‘समोरम पोंटिफिकुम (2007) के साथ घोषित संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें के फैसले को "इस विश्वास से कायम रखा गया था कि इस तरह का प्रावधान द्वितीय वाटिकन महासभा के प्रमुख उपायों में से एक को संदेह में नहीं डालेगा या इस तरह से इसके अधिकार को कम नहीं करेगा।" चौदह साल पहले, संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने "पल्ली समुदायों में विभाजन के डर को निराधार घोषित किया, क्योंकि 'रोमन मिस्सा ग्रंथ के उपयोग के दो रूप एक दूसरे को समृद्ध करेंगे।"

हालाँकि, धर्म के सिद्धांत के लिए गठित धर्मसंघ द्वारा धर्माध्यक्षों के बीच परिचालित हालिया प्रश्नावली के जवाब में संत पापा फ्राँसिस लिखते हैं, "एक ऐसी स्थिति जो मुझे दुखी करती है और मुझे हस्तक्षेप करने करने के लिए मजबूर करती है।" संत पापा फ्राँसिस कहते हैं, संत पापा बेनेडिक्ट की एकता सुनिश्चित करने की इच्छा, "अक्सर गंभीर रूप से अवहेलना की गई है," और उदारता के साथ दी जाने वाली रियायतों के "अंतराल को चौड़ा करने, मतभेदों को मजबूत करने और असहमति को प्रोत्साहित करने हेतु उपयोग किया गया है जो कलीसिया को घायल करते हैं, उनके मार्ग को अवरुद्ध करते हैं और उसे विभाजन के खतरे में डाल देते हैं।"

संत पापा ने व्यक्त किया कि वे "हर तरफ से पूजन धर्मविधि के दुरुप्योग से चिंतित और दुखी हैं।" इसके अलावा, वे इस तथ्य की निंदा करते हैं कि "1962 के रोमन मिस्सा ग्रंथ के वाद्य उपयोग अक्सर न केवल धर्मवधि सुधार की अस्वीकृति की विशेषता है, बल्कि द्वितीय वाटिकन महासभा का भी निराधार और अस्थिर दावा है, कि इसने परंपरा और 'सच्ची कलीसिया' के प्रति विश्वासघात किया है। महासभा पर संदेह करने के बारे में, संत पापा फ्राँसिस बताते हैं, "उन धर्माध्यक्षों के इरादों पर संदेह करना है जिन्होंने एक विश्वव्यापी परिषद में पेत्रुस के साथ और पतरस के अधीन अपनी एकता की शक्ति का प्रयोग किया और अंतिम विश्लेषण में, खुद पवित्र आत्मा पर संदेह किया, जो कलीसिया का मार्गदर्शन करता है।"

संत पापा फ्राँसिस पिछली रियायतों को संशोधित करने के अपने निर्णय लेने का अंतिम कारण बताते हैं, "कई लोगों के शब्दों और दृष्टिकोणों में और भी अधिक स्पष्ट है कि द्वितीय वाटिकन महासभा से पहले की धार्मिक पुस्तकों के अनुसार उत्सवों के चुनाव और "सच्चा कलीसिया" के नाम पर कलीसिया और उसके संस्थानों की अस्वीकृति के बीच घनिष्ठ संबंध है।" यहाँ व्यक्ति इस तरह से व्यवहार कर रहा है जो एकता का खंडन करती है और विभाजनकारी प्रवृत्ति को पोषित करती है, कोई कहता है 'मैं पौलुस का हूँ, तो कोई कहता है मैं अपोलो का हूँ, कोई कहता है मैं केफस का हूँ और कोई कहता है मैं मसीह का हूँ' - जिसके विरुद्ध प्रेरित पौलुस ने इतनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की (1 कुरिं 1:12-13)।  संत पापा ने कहा, "मसीह की देह की एकता की रक्षा में, मैं अपने पूर्ववर्तियों द्वारा प्रदान की गई क्षमता को रद्द करने के लिए विवश हूँ।"

 

 

17 July 2021, 16:16