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देवदूत प्रार्थना में संत पपा फ्रांसिस देवदूत प्रार्थना में संत पपा फ्रांसिस  

संत पापाः येसु से मिलन पूर्वधारणाओं से मुक्ति की मांग

संत पापा फ्रांसिस ने अपने रविवारिय देवदूत प्रार्थना के पूर्व दिये गये संदेश में हमें पूर्वाग्रहों से स्वतंत्र होते हुए ईश्वर से मिलने और विस्मित होने का आह्वान किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, 04 रविवार, 2021 (रेई)  संत पापा फ्रांसिस ने रविवारीय देवदूत प्रार्थना के पूर्व संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो सुप्रभात।

आज का सुसमाचार हमें येसु के गावों वालों के अविश्वास के बारे में कहता है। गलीसिया के दूसरे गाँवों में उपदेश देने के बाद येसु नाजरेत आते हैं जहाँ वे मरियम और योसेफ संग पले-बढ़े थे। एक रविवार को वे यहूदियों के मंदिर में शिक्षा देने लगे। उनके सुननेवालों में से बहुतों ने अपने में यह सवाल किया, “उसे यह ज्ञान कहाँ से मिलाॽ लेकिन, क्या यह बढ़ई और मरियम का बेटे नहीं जो हमारे पड़ोस में रहते हैं जिन्हें हम अच्छी तरह जानते हैंॽ (1-3) इस तरह की प्रतिक्रिया का उत्तर येसु एक प्रसिद्ध कहावत से देते हैं, “एक नबी का अपने गाँव में सम्मान नहीं होता। हम इसे बहुत बार कहते हैं।

जानना और पहचानना

हम येसु के गाँव वालों के मनोभावों पर चिंतन करें। हम कह सकते हैं कि लेकिन उन्होंने येसु को नहीं पहचाना। जानने और पहचाने में एक अंतर है। एक अर्थ में हम एक व्यक्ति के बारे में में बहुत सारी चीजों को जान सकते हैं, उसके एक विचार, उसके बारे में दूसरों से सुन कर कि वे क्या कहते हैं, हम शायद उस व्यक्ति से यदाकदा अपने पड़ोस में मिलते हुए उसे जाने सकते हैं लेकिन यह काफी नहीं है। यह एक ज्ञान मात्र है जो अपने में साधारण, छिछला है इसके द्वारा हम व्यक्ति की विशेषता को नहीं पहचानते हैं। हम सभी इसी जोखिम में पड़ जाते हैं हम सोचते हैं कि हम उस व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, इससे भी खराब तक होता है जब हम उस व्यक्ति को अपने पूर्वग्रह के कारण एक तरह से अपनी अवधारण में सीमित कर देते हैं। येसु के गाँव वाले उसे तीस सालों से एक ही तरह जानते और उन्होंने सोचा कि वे उसके बारे में सबकुछ जानते हैं। लेकिन क्या यह वही लड़का नहीं है जिसे हमने बढ़ते देखा, मरिया और बढई का बेटाॽ उसे ये सारी चीजों कहाँ से मिलींॽ वे सच्चाई में विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने येसु के बारे में सच्चाई का अनुभव कभी नहीं किया। वे केवल बाहरी स्तर तक बने रहे और येसु के नये रुप को स्वीकार नहीं किया।

संत पापा ने कहा कि और यहीं हम मुसीबत की जड़ को पाते हैं-जब हम आदतन की सुविधा और पूर्वग्रह की तनाशाही को अपने में हावी होने देते तो हम नयी चीजों के लिए खुला होने और अपने को आश्चर्यचकित होने के लिए बंद कर देते हैं।

पूर्वग्रह का प्रभाव

हम अपने मनोभावों और अपनी पूर्वधारणाओं के कारण नियंत्रण किये जाते हैं। जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने अनुभवों से और यहां तक कि लोगों से उन बातों की चाह करते हैं जो  हमारे  विचारों और सोचने के तरीकों से मेल खाता है जिससे हमें उनमें बदलाव लाना न पड़े। हम ईश्वर के संग भी ऐसे ही पेश आ सकते हैं और अपने पड़ोसियों के संग भी, हम अपने में ऐसा सोच सकते हैं कि हम येसु को जानते हैं, हम उन्हें इस हद तक जानते हैं कि उन्हें जानने हेतु चीजों को सदैव दुहराने की जरुरत नहीं। उनका ज्ञान हमारे लिए काफी है। लेकिन नई चीजों के लिए खुला नहीं होते हुए और उससे भी बढ़कर उन्हें सुनने, ईश्वर के द्वारा आश्चर्यचकित होने हेतु खुला रहने से बिना हमारा विश्वास एक थकान भरी स्तुति बन जाती जो धीरे-धीरे मर जाती और यह केवल एक अभ्यास, एक सामाजिक आदत बन जाती है।

हम आश्चर्यचकित हों

संत पापा ने कहा कि मैं आश्चर्यचकित होने की बात कही। आश्चर्यचकित होना क्या हैॽ यह तब होता है हमारा मिलन ईश्वर से होता है। हम बहुत बार सुसमाचार में पढ़ते हैं कि बहुत बार वे लोग जिन्होंने येसु से मिला और उन्हें पहचाना उन्हें आश्चर्य की अनुभूति हुई। ईश्वर से हमारा मिलन हमें इस राह में चलने को मदद करें हम अपने में आश्चर्यचकित हों। यह हमारे लिए प्रतिज्ञा पत्र की भांति है कि ईश्वर से मिलन सत्य है न की रिवाजी कार्य।

शरीरधारण एक ठोकर

संत पापा ने कहा कि अंततः क्यों येसु के गाँव वालों ने उन्हें नहीं पहचाना और उनमें विश्वास नहीं कियाॽ क्योंॽ इसके क्या कारण हैंॽ संक्षेप में हम कह सकते हैं कि उन्होंने देहधारण के ठोकर को स्वीकार नहीं किया। उन्हें शरीरधारण के इस रहस्य को नहीं जाना, उन्होंने इस रहस्य को नहीं स्वीकार किया। उन्होंने इसका कारण नहीं जाना और इसे एक कलंक की तरह देखा कि ईश्वर की दिव्यता शरीर में कैसे प्रकट हो सकती है, ईश्वर का पुत्र बढ़ई का पुत्र कैसे हो सकता है, ईश्वर का चेहरा, उसके शब्द साधारण व्यक्ति के कार्यों में कैसे अभिव्यक्त हो सकते हैं। यह अपने में एक ठोकर के समान है ईश्वर का शरीरधारण करना, दैनिक जीवन में उनका साक्षात रुप। ईश्वर हमारे लिए नाजरेत के येसु में मानव के रुप में आये, वे हमारे लिए राह में एक मित्र बनें, वे हमारी तरह बन गये। “आप हममें से एक हैं” हम येसु से यह कह सकते हैं। यह कितनी सुन्दर प्रार्थना है। हममें से एक हमें समझता है हमारे साथ रहता है, हमें क्षमा करता और हमें इतना अधिक प्रेम करता है। वास्तव में, एक अमूर्त, दूर में रहने वाले ईश्वर से हम अधिक सहज महसूस करते हैं जो हमारे जीवन की स्थितियों में सहभागी नहीं होते, जो दूर से हमारे विश्वास, तकलीफों को, समाज को स्वीकार करते हैं। या हम विशेष प्रभावकारी कार्यों में विश्वास करना चहाते हैं जिसे ईश्वर खास रुप में करते हैं जो हम में विशिष्ट मनोभावों को उत्पन्न करता है। इन सारी चीजें के बदले ईश्वर हमारे लिए शरीरधारण करते हुए नम्र, विनीत और गुप्त रूप में हमारे निकट आते हैं। वे हमारे सामान्य जन-जीवन का अंग बनते हैं।

येसु के गांव वालों के साथ यही होता है वे उन्हें नहीं पहचान पाते हैं। यह हमारे साथ भी होता है वे हमारे बीच से पार होते और हम उन्हें नहीं पहचानते हैं। संत पापा ने संत अगुस्टीन के सुन्दर वचनों को दुहराते हुए कहा, “मुझे ईश्वर का भय है,प्रभु का कि वे कब मेरे निकट से गुजर जायें”। “लेकिन अगुस्टीन तुम क्यों डरते होॽ मैं डरता हूँ कि मैं उन्हें पहचान नहीं पाऊंगा। मैं भयभीत हूं कि वे कब मेरे निकट से होकर गुजर जायें”। हम उन्हें नहीं पहचानते हैं हम उनके द्वारा ठोकर खाते हैं हम इस सच्चाई के बारे में चिंतन करें।

हम माता मरियम से निवेदन करें जिन्होंने ईश्वर के रहस्य को नाजरेत के दैनिक जीवन में स्वगात किया जिससे हमारी आंखें और हमारे हृदय पूर्वग्रहों से मुक्त हो सकें, हमारी आंखें आश्चर्य हेतु खुली रहें, “हे प्रभु हम आप से मिल सकें”। जब हम उनसे मिलेंगे तो हमें आश्चर्य होगा, हम सामान्य जीवन में उनसे मिलते हैं जहाँ हमारी आंखें विस्मय में खुली रहती हैं क्योंकि वे नम्र और गुप्त रुप में हमारे दैनिक जीवन में उपस्थित रहते हैं। 

05 July 2021, 10:45