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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस   (Vatican Media)

देवदूत प्रार्थना ˸ साक्षी खुद को शब्दों में नहीं खोते, बल्कि फल

संत पापा फ्रांसिस ने देवदूत प्रार्थना के दौरान संत पेत्रुस एवं पौलुस के साक्ष्य पर प्रकाश डाला तथा गौर किया यद्यपि दोनों संत हमेशा आदर्श नहीं रहे, किन्तु हमें याद दिलाते हैं कि ईश्वर का प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए, न ही ढिंढोरा पीट कर उनकी घोषणा की जानी चाहिए बल्कि साक्ष्य के द्वारा उनका साक्ष्य दिया जाना चाहिए।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 29 जून 21 (रेई)- संत पापा फ्राँसिस ने कलीसिया के संरक्षक संत पेत्रुस एवं संत पौलुस के महापर्व के अवसर पर 29 जुलाई को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में विश्वासियों के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया।

तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?

प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित करते हुए कहा, "सुसमाचार पाठ (मती. 16:13-19) के केंद्र में प्रभु अपने शिष्यों से एक निर्णायक सवाल करते हैं : "तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?"(15) यह एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसको येसु आज हमसे पूछ रहे हैं : "मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ?" मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ उनके लिए जिन्होंने विश्वास को स्वीकार किया है किन्तु मेरे वचन पर नहीं चलते? मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ जो लम्बे समय से ख्रीस्तीय हो किन्तु आदत से थक चुके हो और अपने पहले प्यार को खो दिया हो? मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ जो कठिन समय से गुजर रहे हो और अपने आपको उठाने की जरूरत है ताकि पुनः शुरू किया जा सके? येसु हम सभी से पूछ रहे हैं कि मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ, आइये, आज हम उन्हें हृदय से उत्तर दें।

लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?

इस सवाल से पहले येसु ने एक दूसरा सवाल पूछा था : लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ? (13) संत पापा ने कहा कि यह अपने बारे लोगों के विचार जानने की कोशिश थी किन्तु इसमें येसु की रूचि नहीं थी, फिर भी, उन्होंने क्यों सवाल पूछा? क्योंकि वे अंतर को रेखांकित करना चाहते थे जो ख्रीस्तीय जीवन का मौलिक अंतर है। कुछ लोग हैं जो पहले सवाल पर रूकते हैं वे येसु के बारे बातें करते हैं; और कुछ दूसरे लोग हैं जो येसु से बात करते हैं, उनके पास अपना जीवन लाते हैं, उनके साथ संबंध बनाते हैं और निर्णायक कदम उठाते हैं। प्रभु की रूचि इसी में, हमारे विचारों के केंद्र में, हमारे स्नेह के संदर्भ बिन्दु बनने में है, संक्षेप में कहा जा सकता है कि उनकी रूचि हमारे जीवन के प्रेम बनने में है।  

संत पेत्रुस एवं संत पौलुस का साक्ष्य

आज हम जिन संतों का पर्व मना रहे हैं उन्होंने यही कदम उठाया और साक्षी बने। वे येसु के प्रशंसक नहीं थे बल्कि उनके अनुकरण करनेवाले थे। वे दर्शक नहीं थे बल्कि सुसमाचार के नायक थे। उन्होंने शब्दों पर विश्वास नहीं किया किन्तु कार्यों पर विश्वास किया। पेत्रुस ने मिशन के बारे बातें नहीं कीं, वे मनुष्यों के मछुआरे थे; पौलुस ने प्रबुद्ध किताबें नहीं लिखीं परन्तु पत्र लिखी जैसा उसने जीया था। दोनों ने प्रभु के लिए और अपने भाई-बहनों के लिए जीवन व्यतीत किया। वे हमारा आह्वान करते हैं क्योंकि हम पहले प्रश्न पर रुकने की जोखिम उठाते हैं ˸ अपना दृष्टिकोण एवं राय देना, बड़े विचार रखना और सुन्दर शब्दों से कहना चाहते हैं किन्तु उन्हें कभी कार्य में परिणत नहीं करते। उदाहरण के लिए, अक्सर हम कहा करते हैं कि हम ऐसी कलीसिया को पसंद करते हैं जो सुसमाचार के प्रति अधिक विश्वस्त है, लोगों के अधिक करीब है, अधिक नबी के समान एवं मिशनरी है किन्तु व्यवहारिक रूप में हम कुछ नहीं करते। संत पापा ने कहा कि यह देखना दुखद है कि बहुत सारे लोग बोलते, टिप्पणी करते एवं बहस करते हैं किन्तु बहुत कम लोग साक्ष्य देते हैं। साक्षी अपने शब्दों में नहीं खोते बल्कि वे फल लाते हैं। वे दूसरों और दुनिया की शिकायत नहीं करते किन्तु खुद शुरू करते हैं। वे याद दिलाते हैं कि ईश्वर की प्रदर्शनी नहीं की जानी चाहिए किन्तु उन्हें दिखाया जाना चाहिए, ढिंढोरा के साथ घोषित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उदाहरण के द्वारा दिखाया जाना चाहिए।

साक्षी हमेशा आदर्श नहीं हो सकते

पेत्रुस और पौलुस के जीवन को देखते हुए एक आपत्ति हो सकती है, जी हाँ, वे साक्षी थे किन्तु हमेशा आदर्श नहीं थे। पेत्रुस ने येसु को अस्वीकार किया था और पौलुस ने ख्रीस्तियों पर अत्याचार किया था। इस तरह उन्होंने अपनी कमजोरियों को भी दिखाया। संत पेत्रुस सुसमाचार लेखकों से कह सकते थे कि मेरी गलतियों को न लिखा जाए किन्तु सुसमाचार में उनकी सभी कमजोरियों के साथ कहानी को स्पष्ट रूप से लिखी गई है। संत पौलुस ने भी वैसा ही किया, अपनी सभी गलतियों एवं कमजोरियों को पत्र में दर्शाया। यहीं उनका साक्ष्य शुरू हुआ। अपने आपकी सच्चाई के साथ, अपने दोहरेपन और झूठ को प्रकाश में लाते हुए। ईश्वर हमारे द्वारा महान कार्य कर सकते हैं जब हम अपनी छवि को बचाने के लिए सावधान नहीं होते। बल्कि ईश्वर एवं दूसरों के सामने पारदर्शी होते हैं। आज प्रभु हमसे सवाल कर रहे हैं – मैं तुम्हारे लिए कौन हूँ? अपने साक्ष्यों के द्वारा पेत्रुस और पौलुस हमसे आग्रह करते हैं कि हम अपने मुखौटे को हटायें, अपने बहाने के छोड़ दें जो हमें गुनगुने और औसत दर्जे के बनाते हैं। प्रेरितों की रानी माता मरियम, इसमें हमारी सहायता करें। वे हम में येसु की गवाही देने की इच्छा जगाएँ।

29 June 2021, 16:17