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बुजूर्गों से पोप ˸ ईश्वर के दूत हमारे सांत्वनादाता

संत पापा फ्रांसिस ने 22 जून को नाना-नानी और बुजुर्गों का दिवस घोषित करते हुए एक उनके नाम एक वीडियो संदेश प्रेषित किया।

संजय दिलीप एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 22 जून 2021 (रेई) - बुजुर्गों के लिए प्रथम विश्व दिवस के अवसर पर संत पापा फ्रांसिस ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा,“मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ”। (मत्ती. 28.20) अपने स्वर्गारोहण के पूर्व येसु ने अपने शिष्यों से यह प्रतिज्ञा की। प्रिय नाना-नानी, दादा-दादी और बुजुर्ग मित्रों आज वे उस वाक्य को पुनः आप के लिए दुहराते हैं। रोम के धर्माध्यक्ष और उम्र में आप सभों के जैसा ही मैं नाना-नानी और बुजुर्गों के लिए स्थापित प्रथम विश्व दिवस के दिन, उसी वाक्य को दुहराता हूँ, “मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ”। कलीसिया सदा आप के निकट है और आप की चिंता करती है। वह आप को प्रेम करती और आप को अकेला नहीं छोड़ना चाहती है।

जीवन का कठिन दौर

संत पापा ने कहा कि मैं इस बात अवगत हूँ कि यह संदेश एक कठिन समय में आता है जब हम महामारी को एक क्रोधित आंधी की भांति हमारे बीच में पाते हैं। यह हम सभों के लिए एक कठिन दौर रहा है विशेष करके हम उम्रदार लोगों के लिए। हममें से बहुत बीमार हुए, कई दूसरे मर गये या अपने प्रियजनों और सहयोगियों को खो दिया, वहीं दूसरों को लम्बे समय तक अकेले रहने को बाध्य होना पड़ा।

ईश्वर हमारी इस परिस्थिति से वाकिफ हैं। वे उनके निकट हैं जो अपने में अकेले छोड़ दिये जाने का अनुभव करते और अकेले हैं, महामारी के दौरान हमारे अनुभव बहुत ही कष्टप्रद हैं। येसु के नाना संत जोवाकिम जैसे की हम परपंरा के अनुरूप जानते हैं वे अपनों के बीच अपने को अकेला पाते हैं क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी वैसे ही उसी जीवन-संगिनी पत्नी अन्ना का अनुभव भी रहा, जो अपने में व्यर्थ समझी गई। अतः ईश्वर अपने एक दूत को भेजकर उन्हें अपनी सांत्वना प्रदान करते हैं। शहर के बाहर द्वार पर जब वह अपने में दुःखित था ईश्वर का एक संदेशवाहक प्रकट हुआ और कहा, “जोवाकिम, जोवाकिम। ईश्वर ने आपकी प्रार्थना सुन ली है”। गियोटो के प्रसिद्ध भित्तिचित्रों में से एक, इस परिदृश्य को रात के पहर स्वरुप रेखाकिंत किया गया है। यह निद्राहीन, चिंता भरी, प्रतीक्षामय रातों को ब्यां करती है जिसके हम सभी आदी हो गये हैं।

ईश्वर हमारे लिए दूत भेजते

जीवन की सबसे अंधेरी रात में, जैसे की महामारी के महीनों में हम अपने को पाते हैं, ईश्वर हमारे लिए दूतों को भेजते जिससे वे हमें सांत्वना दें और इस बात की याद दिलायें,“मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ”। वे आप को और मुझ को यही कहते हैं। आज के दिन का अर्थ यही है जिसे मैंने पहली बार इस वर्ष आप सभों के साथ मानने की सोची, जब सामाजिक जीवन धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है। हर नाना-नानी, दादा-दादी और बुजुर्ग जो विशेष रुप से हमारे बीच अकेलेपन का अनुभव करते हैं एक स्वर्गदूत से मिलन का अनुभव करें।

दूतों के विभिन्न चेहरे

कई बार उन दूतों के चेहरे हमारे लिए अपने नाती-पोतों के रुप में होते हैं, दूसरों के लिए परिवार के सदस्यगण, लम्बें समय तक साथ रहे जीवनसाथी या उन लोगों के रुप में जिनसे हमारी भेंट इस कठिन परिस्थिति में हुई, जब हमने इस बात का एहसास किया कि आलिंगन और भेंट हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। मुझे यह सोच कर दुःख होता है कि कुछ स्थानों में ये अब भी संभंव नहीं है।

ईश्वर शब्दों के रुप में हमारे लिए अपना संदेश को भेजते हैं जो हमारे हाथों में हैं। हम इसे रोज दिन सुसमाचार के रुप में पढ़ने की कोशिश करें, स्त्रोत से प्रार्थना करें, नबियों को पढ़ें। ईश्वर उनके द्वारा हमें अपनी निष्ठा में सांत्वना देते हैं। धर्मग्रंथ हमें इस बात को भी समझने में मदद करता है कि ईश्वर हमें अपने जीवन में क्या करने को कहते हैं। हर घड़ी, जीवन के हर समय में वे हमें अपनी दाखबारी में मजदूरों की तरह भेजते हैं (मत्ती.20.1-16)। संत पापा ने कहा कि अपनी सेवानिवृति की आयु में मुझे रोम का धर्माध्यक्ष नियुक्त किया गया और मुझे लगा कि मैं अपने में कुछ नया नहीं कर सकता हूँ। ईश्वर सदैव हमारे साथ हमारे निकट रहते हैं। वे नई संभावनाओं में हमारे साथ रहते, नये विचारों में, नई सांत्वनाओं में सदैव हमारा साथ देते हैं। ईश्वर जो अनंत हैं कभी अपने में सेवानिवृत नहीं होते हैं।

प्रेरितिक जिम्मेदारी

संत मत्ती के सुसमाचार में येसु अपने शिष्यों से कहते हैं,“तुम लोग जाकर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ।” ये वाक्य आज हमारे लिए भी कहे जाते हैं। वे हमारी बुलाहट को अच्छी तरह समझने और हमारी जड़ों को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। यह हमारे विश्वास को युवाओं में प्रसारित करने और अपने से छोटों की चिंता करने में सहायक होते हैं। हम आज विचार करें कि इस उम्र में हमारी बुलाहट आज क्या हैॽ अपनी जड़ों की हिफाजत करना, अपने विश्वास को अपने से छोटों को देना और उनकी देखरेख करना। हम इसे कभी न भूलें।

इससे कोई फर्क नहीं होता कि हमारी उम्र कितनी है, हम अब भी कार्यशील हैं या नहीं, हमारे परिवार हैं या हम अकेले हैं, आप अपनी छोटी उम्र में ही नाना-नानी ही क्यों न बन गये हैं, हम अपने में आत्मनिर्भर हैं या हमें दूसरों पर आश्रित रहना होता है। क्योंकि सुसमाचार की घोषणा और अपने संस्कारों को अपने नाती-पोतों के देने के संबंध में हम अपने में कभी सेवानिवृत नहीं होते हैं। आप को आगे आते हुए इस कार्य को कुछ नये रुप में करना है।

बुलाहट को नवीकृत करें

इस विकट परिस्थिति में आप की बुलाहट का नवीनीकरण हुआ है। आप आश्चर्य करेंगे- यह कैसे हो सकता हैॽ मेरी शक्ति क्षीण हो गई है और मैं नहीं सोचता कि मैं कुछ अधिक कर सकता हूँॽ मैं कैसे कुछ अलग कर सकता हूँ जब आदतें मेरे जीवन का अंग बन गई हैंॽ मैं कैसे अपने को गरीबों के लिए दे सकता हूँ जब मुझे अपने परिवार के लिए ही इतना कुछ करना हैॽ मैं कैसे अपनी निगाहों को विस्तृत कर सकता हूँ जब मैं अपने घर से बाहर निकल ही नहीं सकताॽ क्या मेरा अकेलापन मेरे लिए कॉफी नहीं हैॽ हममें से कितने इस सावल को अपने में पूछते हैं क्या मेरा अकेलापन मेरे लिए बोझ मात्रा नहीं हैॽ येसु को भी निकोदेमुस से यह सवाल सुनना पड़ा जब उन्होंने कहा,“बुढ़ापे में एक मानव पुनः कैसे जन्म ले सकता हैॽ” (यो.3.4) यह हो सकता है येसु उत्तर देते हैं, यदि हम अपने हृदयों को पवित्र आत्मा के कार्य हेतु खोलें, जो हमें जहाँ चाहते वहाँ निर्देशित करते हैं। पवित्र आत्मा की स्वतंत्रता अपने में ऐसी है कि वे जो चाहते और जहाँ चाहते अपनी कार्यों को करते हैं।

महामारी नई राह खोले

मैंने इस तथ्य का अवलोकन किया है कि हम इस परिस्थिति से बाहर, पहले की भांति नहीं निकल सकते हैं यह तो हम बेहतर होंगे या और भी खराब। और ईश्वर न करें कि हम इस परिस्थिति से अपने लिए कुछ भी सीख न लें...यदि हम इस बात पर गौर न करें कि कितने ही बुजुर्ग श्वासयंत्रों की कमी के कारण मर गये...यदि यह अत्यन्त दुःखद परिस्थिति अपने में व्यर्थ साबित हो, बल्कि यह हमारे लिए नई जीवन शैली का कारण बने। यदि हम अपने में इस बात का अनुभव करें कि हमें एक दूसरे की जरुरत है तो यह हमारे लिए नये जन्म का अनुभव होता। हम अकेले नहीं बच सकते हैं। हम एक दूसरे के कर्जदार हैं। हम सभी एक दूसरे के लिए भाई-बहनें हैं।

तीन स्तम्भ

हमें आप की आवश्यकता है जिससे आप हमें भ्रातृत्व और सामाजिक मित्रता, कल के भविष्य का निर्माण करने में मदद करें- एक दुनिया जहाँ हम एक साथ अपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ इस तूफान की समाप्ति के उपरांत जीवनयापन करेंगे। हमें इस बात की आवश्यकता है कि हम एक साथ मिलकर सक्रिया रुप से विखंडित समाजों को नवीन बनाने हेतु सहयोग करें। इस संदर्भ में तीन चीजें हैं जिसे आप के सिवाय और बेहतर रूप में हमारे लिए कोई नहीं कर सकता है। वे तीन स्तम्भ हमारी लिए सपने, यादें और प्रार्थना हैं। अपने जीवन की इस नई यात्रा में चले हेतु ईश्वर हमें अपनी निकटता में शक्ति प्रदान करें।

नबी योवेल इस प्रतिज्ञा की घोषणा करते हैं, “आप के बुजुर्ग सपने देखेंगे और युवा नई दृश्य” (यो3.1)। विश्व का भविष्य हमारे लिए पुराने और नये विधान के मध्य है। यदि युवा नहीं तो कौन बुजुर्गों के सपनों को आगे लेते हुए सकार कर सकता हैॽ इसी सर्थकता हेतु हमें सपने देखना सदैव जारी रखना है। न्याय, शांति और एकता के हमारे सपने युवाओं के लिए नयी राहों को तैयार करेंगे जिसके फलस्वरुप हम एक साथ मिलकर भविष्य का निर्माण कर सकेंगे। आप को यह दिखलाने की जरुरत है कि हम अपनी मुसीबतों से आगे निकलते हुए नवीनता को प्राप्त कर सकते हैं। आप ने एक से अधिक बार इस तरह के अनुभवों को अपने में संजोयकर रखा है। मैं निश्चित रुप में कह सकता हूँ कि आप ने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया है यद्यपि आपने उन पर विजय प्राप्त की है। अपने उन अनुभवों के आधार पर हमें इस समय से पार होने में सहायता कीजिए।

सपनों की यादें

सपने इस भांति यादें में उलझे हैं। मैं दुःखित हृदय से युद्धों के बारे में सोचता हूँ यह हमारे लिए जरुरी है कि हम युवाओं को शांति का मूल्य समझने में मदद करें। आप में से जितनों ने युद्ध के दर्द का अनुभव किया है आप इस अनुभूति को युवाओं के संग साझा कर सकते हैं। अपनी यादों को सजीव रखना हर बुजुर्ग का एक सच्चा प्रेरितिक कार्य है आप अपनी यादों को दूसरों के संग बांटें। एडित बुर्क जो शोहा के भंयानक कष्ट से बच निकली कहती है, “अपने दर्द भरी अनुभुतियों के द्वारा किसी एक की अंतरात्मा को जागृत करना भी अपने में एक बड़ा प्रयास है, यादें मेरे लिए जीवन है।” संत पापा ने अपने जीवन के दुःख भरे क्षणों की याद की जहाँ स्वयं उनके दादा-दादियों को पलायन का शिकार होना पड़ा था। आज भी कितने ही लोग हैं जिन्हें भविष्य की आशा में अपने जीवन की सारी चीजों का परित्याग करना पड़ता है। इस तरह की यादें हमें एक संवेदनशील मानवता और स्वागत योग्य विश्व का निर्माण करने हेतु मदद करे। यादों के बिना हम निर्माण के कार्य नहीं कर सकते हैं, वे हमारे लिए घर निर्माण हेतु नींव की भांति हैं।

बुजुर्गों की प्रार्थनाएं कलीसिया की सांसें

हम अंततः प्रार्थना में आते हैं। मेरे भूतपूर्व संत पापा जो पहले ही एक बुजुर्ग संत की भांति हैं जो कलीसिया के लिए प्रार्थना करते हुए अपने कार्यों को जारी रखते हैं एक बार कहा, “बुजुर्गों की प्रार्थना दुनिया को बचा सकती है.. उन्होंने इसे 2012 अपने धर्माध्यक्षीय काल के अंत में कहा। यहां हम बहुत सुन्दर बात को देखते हैं। आप की प्रार्थनाएं अति मूल्यवान हैं कलीसिया के लिए एक बड़ी सांस जो दुनिया के लिए जरूरी है। खास कर परिवार के लिए उत्पन्न हुए इस कठिन परिस्थिति में जब एक ही नाव पर सवार होकर तूफानी समुद्र के पार जाने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी प्रार्थनाएं दुनिया और सारी कलीसिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं यह सभों में इस शांतिमय विश्वास को जगाता है कि हम तुरंत तट पर होंगे।

अपने वीडियो संदेश के अंत में संत पापा फ्रांसिस ने धन्य चार्ल्स डी फौकॉल्ड के जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि वे आल्जीरिया में एक मठवासी के रुप में रहते हुए सभों के लिए एक भाई बने रहने की चाह रखी। उनका जीवन हमें यह दिखलाता है कि मरूभूमि में अकेले गरीबी का जीवन व्यतीत करते हुए भी हम दुनिया के गरीबों के लिए निवेदन करते तथा विश्व के लिए भाई या बहन बन सकते हैं।

संत पापा ने निवेदन किया कि हम सभी गरीबों और दुखियों के प्रति अपना हृदय खोलें और उनकी आवश्यकताओं के लिए निवेदन करें। हम अपना हृदय खोलते हुए इस बात को दुहराना सीखें विशेष कर युवाओं के लिए जो सांत्वना देता है “मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ”। इस भांति हम अपने जीवन में सदैव आगे बढ़ते जायें।

22 June 2021, 16:40