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म्यांमार के वशवासियों के साथ मिस्सा का अनुष्ठान करते हुए संत पापा म्यांमार के वशवासियों के साथ मिस्सा का अनुष्ठान करते हुए संत पापा  (ANSA)

ईश्वर म्यांमार के लोगों को शांति प्रदान करें,संत पापा

संत पापा फ्राँसिस ने रोम में रहने वाले म्यांमार के काथलिकों के लिए एक विशेष पवित्र मिस्सा समारोह की अध्यक्षता की और देश में शांति हेतु प्रार्थना में उनके साथ शामिल हुए।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार 17 मई 2021 (वाटिकन न्यूज) : म्यांमार के पीड़ित लोगों के साथ विश्वव्यापी कलीसिया की निकटता की अभिव्यक्ति के रूप में, संत पापा फ्राँसिस ने रविवार को बर्मी काथलिकों के साथ पवित्र मिस्सा समारोह का अनुष्ठान किया। फरवरी में तख्तापलट के तहत देश की चुनी हुई नागरिक सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद साढ़े तीन महीने की हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और हजारों घायल हुए हैं।

पास्का के सातवें रविवार का मिस्सा समारोह संत पेत्रुस महागिरजाघर के संत पेत्रुस के सिहासन की बलिवेदी में सम्पन्न हुआ।

संत पापा ने सुसमाचार पाठ पर चिंतन किया जहाँ येसु अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना करते हैं क्योंकि वे उनसे और दुनिया से विदा लेने की तैयारी कर रहे थे। संत पापा ने कहा कि यह पाठ हमें सिखाता है कि अपने जीवन में "नाटकीय और दर्दनाक क्षणों" से कैसे निपटा जाए। संत पापा ने कहा, अपने पिता से प्रार्थना करते समय, प्रभु ने दुनिया को "रखने"  शब्द का प्रयोग किया है। जैसा कि म्यांमार "हिंसा, संघर्ष और दमन" का अनुभव करता है, हमें यह पूछने की जरूरत है कि हमें क्या "रखने" के लिए कहा जा रहा है।

भरोसा रखें

इसके जवाब में, संत पापा ने तीन चुनौतियों का वर्णन किया: विश्वास बनाए रखना, एकता बनाए रखना और सत्य को बनाए रखना। पहले के बारे में, उन्होंने कहा, हमें निराशा से बचने के लिए विश्वास की आवश्यकता है। सुसमाचार पढ़ने से हमें पता चलता है कि कैसे येसु पीड़ा से दबे होने के बावजूद अपनी आँखें ईश्वर की ओर उठाते हैं। संत पापा ने रेखांकित किया कि येसु बुराई या दुःख से अभिभूत होकर स्वयं को त्याग नहीं देते और उन्होंने अपने शिष्यों को भी ऐसा ही मनोभाव अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। संत पापा ने आगे कहा, "विश्वास बनाए रखने के लिए, हमें अपनी निगाह स्वर्ग की ओर ऊपर रखना है" और "घृणा और प्रतिशोध के तर्क के आगे झुकना नहीं है, लेकिन प्रेमी ईश्वर पर अपनी निगाहें टिकाए रखना है, वे हमें एक दूसरे के भाई-बहन बनने के लिए बुलाते हैं।” उन्होंने कहा कि प्रार्थना इसकी कुँजी है। यह समस्याओं से पीछे हटना या पलायन करना नहीं है, बल्कि "प्रेम और आशा को जीवित रखने के लिए" आवश्यक है।

संयुक्त रहें

येसु ने पिता से प्रार्थना की कि शिष्य पूरी तरह से एकजुट हों, "एक परिवार जिसमें प्रेम और भाईचारे का शासन हो", संत पापा ने कहा कि हमें "विभाजन की बीमारी" से बचना चाहिए और हम इसे अपने दिलों में अनुभव कर सकते हैं और यह हमारे परिवारों, समुदायों में, यहां तक कि कलीसिया में भी फैल सकता है, जहां ईर्ष्या, द्वेश, स्वार्थ और न्याय करने की प्रवृत्ति बहुत अधिक है, क्योंकि "विभाजन शैतान का है, महान विभाजक।" लेकिन हम सभी "दोस्ती, प्यार और भाईचारे में रहने का साहस खोजने" का विकल्प चुन सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति, यहां तक कि "छोटी-छोटी बातों में" भी अपनी भूमिका निभा सकता है क्योंकि "शांति और बंधुत्व के प्रति प्रतिबद्धता हमेशा नीचे से आती है।" हम एक कलीसिया के रूप में ऐसा करने के लिए बुलाये गये हैं ताकि "संवाद" में "दूसरों के लिए सम्मान और वार्ता को बढ़ावा दिया जा सके।"

दिल से सच्चाई

संत पापा ने कहा कि सच्चाई को बनाए रखने के महत्व का अर्थ केवल विचारों की रक्षा करना या सिद्धांतों की एक प्रणाली का संरक्षक बनना नहीं है, बल्कि "मसीह से संयुक्त रहना और उनके सुसमाचार के प्रति समर्पित रहना" है। सत्य को बनाए रखने का अर्थ है "सुसमाचार को मानवीय और सांसारिक सोच के लिए विकृत करना नहीं, बल्कि इसके संदेश को अपनी अखंडता में संरक्षित करना... जीवन की हर स्थिति में एक नबी बनना।" युद्ध और घृणा के बीच, "सुसमाचार के प्रति निष्ठा और शांतिदूत होने के लिए प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है," जिसमें हमारे सामाजिक और राजनीतिक विकल्प भी शामिल हैं। इसमें जोखिम है, लेकिन "केवल इस तरह से चीजें बदल सकती हैं।" इसके लिए साहस की भी आवश्यकता है।"

अंत में, संत पापा ने प्रार्थना की कि "ईश्वर सभी के दिलों को शांति में बदल देंगे।" उन्होंने सभी से आशा न खोने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, "आज भी, येसु हम सभी के लिए अपने पिता के सामने प्रार्थना कर रहे हैं, कि वे हमें उस बुराई से बचाए और हमें बुराई की शक्ति से मुक्त करें।"

17 May 2021, 15:04