खोज

Vatican News
विश्व युवा दिवस के दौरान पापस्वीकार करते युवा -  19.03.2020 विश्व युवा दिवस के दौरान पापस्वीकार करते युवा - 19.03.2020  

प्रेरितिक पेनितेन्सियेरी पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों से सन्त पापा

वाटिकन स्थित परमधर्मपीठीय प्रेरितिक पेनितेन्सियोरी द्वारा आन्तरिक मंच पर आयोजित 31 वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को शुक्रवार को सम्बोधित शब्दों में सन्त पापा फ्राँसिस ने पुनर्मिलन संस्कार के महत्व पर प्रकाश डाला।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 12 मार्च 2021 (रेई,वाटिकन रेडियो): वाटिकन स्थित परमधर्मपीठीय प्रेरितिक पेनितेन्सियोरी द्वारा आन्तरिक मंच पर आयोजित 31 वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को शुक्रवार को सम्बोधित शब्दों में सन्त पापा फ्राँसिस ने पुनर्मिलन संस्कार के महत्व पर प्रकाश डाला।   

पुनर्मिलन संस्कार की तीन अभिव्यक्तियां

परमधर्मपीठीय पेनितेन्सियेरी के अध्यक्ष कार्डिनल माओरो पियाचेन्सा के प्रति सन्त पापा ने आभार व्यक्त किया तथा पाठ्यक्रम के सभी प्रतिभागियों का हार्दिक अभिवादन किया। पुनर्मिलन संस्कार की तीन अभिव्यक्तियों का व्याख्या कर सन्त पापा ने कहा कि सर्वप्रथम है,  "प्रेम के प्रति समर्पण"; दूसरा: "प्रेम से मनपरिवर्तन"; और तीसरा: "प्रेम के अनुरूप उसकी प्रतिक्रिया"।

सन्त पापा ने कहा, "प्रेम के प्रति समर्पण का अर्थ है, विश्वास का सच्चा कार्य। विश्वास को कभी भी अवधारणाओं की सूची या बयानों की श्रंखला में नहीं रखा जा सकता, इसलिये कि विश्वास ईश्वर एवं मानव के बीच एक खास सम्बन्ध है। ईश्वर बुलाते हैं तथा मनुष्य उत्तर देता है। इस प्रकार विश्वास करुणा के साथ, स्वयं ईश्वर के साथ साक्षात्कार है, जो करुणावान हैं।" सन्त पापा ने सचेत किया जो व्यक्ति स्वतः को ईश प्रेम के प्रति समर्पित नहीं रखते वे दुनियाबी जाल में फंस जाते हैं, जो अन्ततः, दुख, क्लेष और एकाकीपन को जन्म देता है।

उन्होंने कहा कि अपने पापों के लिये दुखी होना विश्वास का कार्य है जिसे हर विश्वासी को करना चाहिये, तथा इस दुख को विश्वासी के मन में उत्पन्न करने के लिये पुनर्मिलन संस्कार प्रदान करनेवाले हर याजक को, प्रशिक्षण एवं प्रार्थना द्वारा, सक्षम होना चाहिये।  

मनपरिवर्तन को कार्यरूप मिले    

सन्त पापा ने कहा कि पुनर्मिलन संस्कार का अर्थ यही है कि व्यक्ति स्वतः को ईश्वर के प्रति एवं पड़ोसी के प्रति प्रेम के कारण समर्पित रखे तथा पश्चातप द्वारा मनपरिवर्तन के लिये तैयार रहे। उन्होंने कहा कि पश्चाताप और मनपरिवर्तन तक ही ईश्वर के साथ मानव का पुनर्मिलन सम्पन्न नहीं हो जाता अपितु यह तब सम्पन्न होता है जब व्यक्ति अपने कार्यों द्वारा यह दर्शाये कि वह सचमुच में रूपान्तरित हो गया है। इसका अर्थ है, दया एवं उदारता के कार्यों द्वारा भाई और पड़ोसी की मदद कर जीवन में सच्चा परिवर्तन लाना। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि जो व्यक्ति ईश्वर द्वारा क्षमा कर दिया गया है, वह अन्यों को क्षमा न करे।  

प्रेरितिक पेनितेन्सियेरी का उक्त पाठ्यक्रम प्रतिवर्ष चालीकाकाल की अवधि में आयोजित किया जाता है, जो कि पश्चातप और मनपरिवर्तन, आतिथ्य एवं करुणा का उपयुक्त समय है। इस वर्ष कोविद-19 महामारी के चलते उक्त पाठ्यक्रम ऑनलाईन आयोजित किया गया है जिसमें लगभग 870 धर्माधिकारी एवं याजक भाग ले रहे हैं।  

12 March 2021, 12:01