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अस्पताल में बीमार व्यक्ति से मुलाकात करते संत पापा फ्राँसिस अस्पताल में बीमार व्यक्ति से मुलाकात करते संत पापा फ्राँसिस 

विश्व रोगी दिवस के लिए संत पापा का संदेश

संत पापा फ्राँसिस ने विश्व रोगी दिवस के लिए एक देश प्रकाशित किया है जहाँ उन्होंने कोरोनावारस महामारी से पीड़ित लोगों की याद करते हुए सभी लोगों को, खासकर, गरीबी एवं हाशिये पर जीवनयापन करनेवाले लोगों के प्रति अपना आध्यात्मिक सामीप्य व्यक्त किया है एवं उन्हें कलीसिया के प्रेमपूर्ण देखभाल का आश्वासन दिया है। 11 फरवरी 2021 को 29वाँ विश्व रोगी दिवस मनाया जाएगा।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 12 जनवरी 2021 (रेई)- संत पापा ने संदेश में लिखा है कि 11 फरवरी 2021 को 29वां विश्व रोगी दिवस मनाया जाएगा जबकि उसी दिन लूर्द की माता मरियम का पर्व मनाया जाता है जो बीमार लोगों एवं परिवारों तथा समुदायों में उनकी मदद करनेवालों की विशेष याद करने का दिन है। हम उन लोगों की विशेष याद करते हैं जिन्होंने कोरोना वायरस महामारी के कारण कष्ट सहा है और अब भी सह रहे हैं। मैं सभी को अपना आध्यात्मिक सामीप्य व्यक्त करता तथा कलीसिया की प्रेमी देखभाल का आश्वासन देता हूँ।  

विश्व रोगी दिवस की विषयवस्तु है, "तुम लोग गुरूवर कहलाना स्वीकार न करो क्योंकि तुम्हारा एक ही गुरू है और तुम सब के सब भाई हो।" (मती.23˸8) इस विषयवस्तु को सुसमाचार से लिया गया है जहाँ येसु फरीसियों को उनके ढोंगीपन के लिए फटकारते हैं जो शिक्षा देते लेकिन खुद उसका पालन नहीं करते हैं। जब हमारा विश्वास शब्दमात्र रह जाता, दूसरों के जीवन एवं जरूरतों से कोई सरोकार नहीं रखता, तब धर्मसार जिसको हम अभिव्यक्त करते हैं हमारे जीवन के साथ असंगत साबित होता है, तब हम इसी खतरे में पड़ते हैं। यही कारण कि येसु कठोर शब्दों में आत्मपूजा करनेवालों को फटकारते हैं।      

उपदेश देने किन्तु उसके अनुसार नहीं चलनेवालों को येसु की फटकार, हमेशा और सभी के लिए मददगार है चूँकि हम में से कोई भी अडम्बर की बुराई से अछूता नहीं है जो हमें विश्वबंधुत्व का जीवन जीने हेतु पिता के पुत्र-पुत्रियों के रूप में बढ़ने नहीं देता है।

पाखंड और आत्म-पूजा का सामना करने के लिए येसु हमें रूकने और सुनने, दूसरों के साथ सीधे एवं व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने, उनके प्रति सहानुभूति महसूस करने और उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने की सलाह देते हैं।

11 फरवरी लूर्द की माता मरियम के पर्व के दिन काथलिक कलीसिया विश्व रोगी दिवस मनाती है जिसकी स्थापना 13 मई 1992 को संत पापा जॉन पौल द्वितीय ने की थी।

बीमारी एवं विश्वास

संत पापा ने गौर किया है कि बीमारी हमें अपनी दुर्बलता एवं दूसरों की आवश्यकता का एहसास कराता है। यह जीवन के अर्थ पर सवाल उठाता है जिसको हम विश्वास में ईश्वार के पास लाते हैं कि अपने जीवन में एक नया एवं गहरा मार्गदर्शन पा सकें।

इस संबंध में संत पापा ने बाईबिल के जोब का उदाहरण दिया है जो अपने दुर्भाग्यपूर्ण समय में अपनी पत्नी और मित्रों द्वारा त्याग दिया गया था, उसने लाचार और गलत समझा गया महसूस किया। फिर भी पाखंड का बहिष्कार किया एवं ईश्वर तथा दूसरों की ओर ईमानदारी का रास्ता चुना।

प्रभु ने जोब की पुकार सुनी और पुष्ट किया कि उसकी पीड़ा कोई सजा नहीं थी, न ही ईश्वर से अलग होने की स्थिति और न ही ईश्वर की उदासीनता का चिन्ह।

बीमार एवं देखभाल करनेवालों के बीच सामीप्य

संत पापा ने कहा है कि बीमारी के अनेक चेहरे हैं। वे लोग भी बीमार हैं जो परित्यक्त हैं जो लोग बहिष्कार और सामाजिक अन्याय के शिकार हैं तथा अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं।

वर्तमान के इस महामारी ने हमारी स्वास्थ्य प्रणाली में असमानताओं को बढ़ा दिया है तथा रोगियों, बुजूर्गों, दुर्बलों तथा कमजोर लोगों की देखभाल में उदासीनता को उजागर किया है जो सुविधाओं को हमेशा एक समान प्राप्त नहीं कर सकते हैं। महामारी ने स्वास्थ्यकर्मियों, स्वयंसेवकों, पुरोहितों एवं धर्मसमाजियों के समर्पण एवं उदारता पर भी प्रकाश डाला है।  

संत पापा ने यह कहते हुए उन लोगों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की है कि वे पुरुषों एवं स्त्रियों की मूक भीड़ हैं जिन्होंने दूसरी ओर नहीं देखा बल्कि रोगियों की पीड़ा में सहभागी हुए जिनको उन्होंने अपना पड़ोसी एवं हमारे मानव परिवार के सदस्य के रूप में देखा।

संत पापा ने कहा कि यह सामीप्य एक बहुमूल्य मरहम है जो बीमार लोगों को उनकी पीड़ा में सांत्वना और आराम प्रदान करता है। ख्रीस्तीय के रूप में हम इसी सामीप्य को येसु ख्रीस्त भले समारी के प्रेम के चिन्ह स्वरूप महसूस करते, जो पाप से घायल हर स्त्री एवं पुरूष के निकल दया से आते हैं।

उन्होंने कहा है कि एक समुदाय के रूप में हम भी पिता के समान दयालु बनने एवं प्रेम करने के लिए बुलाये गये हैं, खासकर, हमारे पीड़ित भाइयों एवं बहनों के प्रति जिन्हें बहुत अधिक दूसरों की जरूरत है।

भाईचारापूर्ण एकात्मता एवं संबंध

संत पापा ने हमारे पड़ोसियों के प्रति भ्रातृत्वपूर्ण एकात्मता के महत्व पर भी प्रकाश डाला है जो कई रूपों में प्रकट होता है। सेवा करने का अर्थ है हमारे परिवारों, हमारे समाज और हमारे बीच के कमजोर लोगों की मदद करना।" हमें अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं एवं सत्ता की चाह को किनारे करना तथा सबसे कमजोर चेहरों को देखना, उनके शरीर का स्पर्श करना, उनके करीब आना एवं उनकी मदद करना है।  

संत पापा ने कहा है कि एक चिकित्सा को प्रभावशाली होने के लिए इसे सापेक्ष होना चाहिए, क्योंकि यह रोगी के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को सक्षम बनाता है।  

उपचार का यह मार्ग एक भरोसेमंद पारस्परिक संबंध पर आधारित है जो बीमार लोगों की देखभाल करने में डॉक्टरों, नर्सों, पेशेवरों और स्वयंसेवकों की मदद करता है। बीमार व्यक्ति एवं उनकी देखभाल करनेवालों के बीच संबंध, आपसी विश्वास, सम्मान, खुलापन और तत्परता पर आधारित होना चाहिए। यह रक्षात्मक दृष्टिकोण से ऊपर उठने, बीमारों की गरिमा का सम्मान करने, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की व्यावसायिकता की रक्षा करने और रोगियों के परिवारों के साथ अच्छे संबंध को बढ़ावा देने में मदद देगा।

संत पापा ने अंत में कहा कि "येसु ने इसे चंगाई प्रदान कर प्रमाणित कर दिया है, जादू के द्वारा नहीं बल्कि एक मुलाकात के द्वारा, पारस्परिक संबंध के द्वारा।"  

 

12 January 2021, 19:06