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देवदूत प्रार्थना के दौरान  धर्मबहनें देवदूत प्रार्थना के दौरान धर्मबहनें  (AFP or licensors)

पूर्वी चर्चों में नए संस्थान हेतु परमधर्मपीठ की स्वीकृति आवश्यक

एक 'मोतू प्रोप्रियो' प्रेरितिक पत्र में संत पापा फ्राँसिस ने पूर्वी कलीसियाओं के कानून संहिता के सिद्धांत 435 §1 और 506 §1 में संशोधन किया है, जिसमें नए धार्मिक संस्थानों की स्थापना के लिए परमधर्मपीठ की लिखित मंजूरी की आवश्यक है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार 07 दिसम्बर 2020 (रेई) : संत पापा फ्राँसिस द्वारा सोमवार को जारी मोतू प्रोप्रियो (स्व लिखित) प्रेरितिक पत्र में पूर्वी कलीसियाओं के कानून संहिता के सिद्धांत 435 §1 और 506 §1 में संशोधन किया गया।

संत पापा ने अपने पत्र में लिखा कि कलीसिया के शुरुआती दिनों से, कुछ विश्वासियों ने महसूस किया कि वे अपने जीवन को ईश्वर और अपने भाइयों और बहनों की सेवा के लिए विशेष रूप से समर्पित करेंगे और समुदाय के सामने गरीबी, ब्रहमचर्य और आज्ञाकारिता का व्रत लेते हुए दुनिया से अपने को अलग करते हैं। समुदाय इस बात का साक्षी है।

इस तरह का समर्पित जीवन  पहले पूर्व में और फिर पश्चिम में फैलता गया। सामूदायिक जीवन जीने के लिए नियम बनाये गये और सुपीरियर के अधीन रहने लगे।

धर्मसंघीय परिवारों का विस्तार

द्वितीय वाटिकन महासभा कहता है कि ईश्वर द्वारा लगाए गए एक पेड़ में असंख्य शाखाएं निकलने लगी। एकान्त और सामुदायिक जीवन के विभिन्न रूप और विभिन्न परिवार विकसित हुए, जिससे मसीह के शरीर रुपी कलीसिया की भलाई हेतु अनेक कार्य विकसित हुए।”(लूमन जेन्सियुम, 43)।

कलीसिया पवित्र आत्मा के उपहारों की समृद्धि की अभिव्यक्ति के रूप में समर्पित जीवन के विभिन्न रूपों का स्वागत करती है। कलीसियाई अधिकारी, विशेष रूप से धर्माध्यक्ष अपने धर्मप्रांत में समर्पित लोगों के सामूहिक जीवन को नियंत्रित करते हैं और नये धर्मसमाज की शुरुआत करते हैं साथ ही "बेकार या जोशहीन संस्थान को टाल देते हैं।" (पी सी.19)

यह परमधर्मपीठ की जिम्मेदारी है कि वे दोनों की विवेकाधीन प्रक्रिया में धर्माध्यक्ष का साथ दें जो एक नए संस्थान या समुदाय की सर्वव्यापी मान्यता और प्रेरक उद्देश्य की प्रामाणिकता के परीक्षण का अंतिम निर्णय लेता है।

संशोधन

 इस परिप्रेक्ष्य में संत पापा कानून संहिता के सिद्धांत 435 §1 और 506 §1 में संशोधन करते हैं जो इस प्रकार हैः

435 §1  प्राधिधर्माध्यक्ष अपने क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर एक स्वायत्त मठ की स्थापना या अन्य मामलों में  परमधर्मपीठ से लिखित अनुमति पत्र लें।

 506 §1 धर्माध्यक्ष अपने धर्मप्रांत में परमधर्मपीठ की पूर्व लिखित अनुमति के बाद धर्मसमाज की स्थापना कर सकते हैं। लेकिन वे प्राधिधर्माध्यक्षीय कलीसिया की क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर, प्राधिधर्माध्यक्ष जानकारी के बिना नये संस्थान की स्थापना नहीं कर सकते।

ओसरवातोरे रोमानो में प्रकाशन के माध्यम से,यह 8 दिसंबर 2020 को लागू होगा और फिर एक्टा अपोस्टोलिका सेडिस की आधिकारिक टिप्पणी में प्रकाशित किया गया।

07 December 2020, 15:17