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सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में सन्त पापा फ्राँसिस, वाटिकन सन्त पेत्रुस महागिरजाघर में सन्त पापा फ्राँसिस, वाटिकन  (ANSA)

कलीसिया की सामाजिक शिक्षा हमें आशा के मध्यस्थ बनाती है

इटली के वेरोना शहर में 26 से 29 नवम्बर तक जारी काथलिक कलीसिया की सामाजिक शिक्षा के दसवें वार्षिक सम्मेलन में, गुरुवार को, एक विडियो सन्देश भेजकर सन्त पापा फ्राँसिस ने स्मृति, बपतिस्मा एवं आशा को संयुक्त रखने के महत्व पर प्रकाश डाला।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 27 नवम्बर 2020 (रेई,वाटिकन रेडियो): इटली के वेरोना शहर में 26 से 29 नवम्बर तक जारी काथलिक कलीसिया की सामाजिक शिक्षा के दसवें वार्षिक सम्मेलन में, गुरुवार को, एक विडियो सन्देश भेजकर सन्त पापा फ्राँसिस ने स्मृति, बपतिस्मा एवं आशा को संयुक्त रखने के महत्व पर प्रकाश डाला।  

सन्देश में सन्त पापा ने, लोगों के बीच साक्षात्कार को बढ़ावा देनेवाली, सम्मेलन की रचनात्मक कार्यप्रणाली को रेखांकित किया, जिसके प्रतिभागी "अपनी संवेदनशीलता और कार्यों में भिन्न होते हुए भी जनकल्याण के निर्माण में जुटे रहते हैं।"

विशिष्ट स्थिति

सन्त पापा फ्राँसिस ने इस वर्ष की विशिष्ट स्थिति के प्रति ध्यान आकर्षित कराया जिसने कोविद-19 महामारी और इससे जुड़े स्वास्थ्य संकट के चलते "गंभीर व्यक्तिगत और सामाजिक घाव" उत्पन्न किये हैं। उन्होंने फादर आद्रियानो विन्चेन्सी की अनुपस्थिति का स्मरण दिलाया जो विगत नौ सम्मेलनों के जोशिले अनुप्राणकर्त्ता रहे थे तथा जिनकी इस वर्ष फरवरी में हत्या कर दी गई थी।

सन्त पापा ने शरणार्थियों, आप्रवासियों एवं ज़रूरतमन्दों की सेवा से जुड़े फादर विन्चेन्सी द्वारा अर्पित सेवाओं की प्रशंसा की तथा आशा व्यक्त की उनके द्वारा रोपे गये सेवा के बीज विपुल फल उत्पन्न करें तथा अन्यों को भी सेवा की प्रेरणा प्रदान करें।  

स्मृति एवं भविष्य

सन्त पापा ने कहा कि इस वर्ष का विषयः "भविष्य की स्मृति"- सभी को एक रचनात्मक दृष्टिकोण रखने के लिए आमंत्रित करता है, यह हमें "भविष्य को परखने में" सक्षम बनाता है। सन्त पापा ने कहा, "ख्रीस्त के अनुयायियों के लिये भविष्य का एक नाम है, आशा"।

उन्होंने कहा, "आशा हृदय का सदगुण है जो स्वतः को अन्धकार में बन्द नहीं करता, जो अतीत को नहीं भुलाता, जो केवल वर्तमान में नहीं जीता अपितु भावी कल को सदैव ध्यान में रखता है।"

सन्त पापा ने कहा, ख्रीस्तीयों के लिये "कल" आनन्द और आशा का साक्षात्कार है, इसलिये कलीसिया में होने का अर्थ है, विषाद के प्रलोभन में पड़े बिना, एक रचनात्मक और युगान्त- विषयक दृष्टिकोण रखना, क्योंकि, सन्त पापा फ्राँसिस के अनुसार, विषाद "एक वास्तविक आध्यात्मिक विकृति" है।

सन्त पापा ने कहा कि ख्रीस्तीय गतिकता का अर्थ अतीत की यादों पर विरही नहीं होना है अपितु, उदारता का जीवन यापन करते हुए अनन्त की ओर आगे बढ़ना है। सन्त पापा ने स्मरण दिलाया कि जो ईश्वर का है वही सब अस्तित्व में रहता है, परिणामस्वरूप, स्मृति जो आंतरिक रूप प्रेम एवं अनुभव से जुड़ी होती है, मानव व्यक्ति के सामाजिक, राजनैतिक एवं कलीसियाई क्षेत्रों के गहनतम आयामों में से एक बन जाती है।  

बपतिस्मा, जीवन एवं स्मृति

सन्त पापा ने कहा कि बपतिस्मा में हम ख्रीस्तीयों को, ईश्वर की सहभागिता में, जीवन वरदान स्वरूप मिला है, अस्तु, हमारा जीवन ख्रीस्त का ही जीवन है, जिसकी प्रकाशना हमें अपने दैनिक जीवन द्वारा करना चाहिये। उन्होंने कहा, ख्रीस्तीयों को साहस एवं रचनात्मकता के साथ येसु के सुसमाचार को प्रकाशित करना है ताकि हम एक नवीन और समावेशी अर्थव्यवस्था तथा प्रेम के योग्य राजनीति की रचना में सक्षम बन कर लोगों के बीच सेतु निर्माता बन सकें।   

27 November 2020, 11:28