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संत पापा फ्राँसिस धर्मशिक्षा देते हुए संत पापा फ्राँसिस धर्मशिक्षा देते हुए  (ANSA)

प्रेम कलीसिया की रहस्यात्मक जड़, संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में प्रार्थना पर धर्मशिक्षा देते हुए कलीसिया की चार विशेषताओं पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 18 नवम्बर 2020 (रेई)- संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो सुप्रभात।

दुनिया में कलीसिया के पहले कदम प्रार्थना के रुप में थे। प्रेरित चरित के लेखों और प्रेरितों के कार्यों में हम कलीसिया की क्रियाशील छवि को पाते हैं, जो प्रेरितिक कार्य का जिक्र करता है। येरुसालेम का प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय हमारे लिए अन्य दूसरे ख्रीस्तियों के अनुभवों का संदर्भ प्रस्तुत करता है। संत लूकस प्रेरित चरित में लिखते हैं, “वे दत्तचित्त होकर प्रेरितों की शिक्षा सुना करते थे, भ्रातृत्व के निर्वाह में ईमानदार थे और प्रभु भोज तथा सामूहिक प्रार्थनाओं में नियमित रुप से शामिल हुआ करते थे”(प्रेरि.2.42)।

कलीसिया की चार विशेषताएं

संत पापा ने कहा कि हम यहाँ कलीसियाई जीवन की चार विशेषताओं को पाते हैं, पहला प्रेरितों की शिक्षा को सुनना, दूसरा समुदाय की देखभाल करना, तीसरा रोटी तोड़ना और चौथा प्रार्थना करना। ये हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि कलीसियाई जीवन का सार अर्थपूर्ण तब होता है जब हम प्रार्थना में येसु के संग सुदृढ़ बने रहते हैं। उपदेश और धर्मशिक्षा हमें गुरू के कार्यों का साक्ष्य देते हैं, जहाँ हम भ्रातृत्वमय एकता में बनते रहते हुए अपने स्वार्थ और विशेषवाद से ऊपर उठते हैं। रोटी तोड़ना हमें अपने बीच में येसु ख्रीस्त की उपस्थिति का एहसास दिलाती, वे हमसे दूर कभी नहीं जाते हैं बल्कि वे हमारे बीच रहते और हमारे साथ चलते हैं। वहीं प्रार्थना हमें पिता संग वार्ता के अवसर प्रदान करती है जो येसु ख्रीस्त में पवित्र आत्मा के माध्यम होता है।

ईश्वर कलीसिया के निर्माता

कलीसिया में यदि चीजें जो इन चार बातों के बाहर विकसित होतीं, तो वे अपने में निराधार होती हैं। संत पापा ने कहा कि हम अपने जीवन की किसी भी परिस्थिति को चार बातों- धर्मशिक्षा, भ्रातृत्वमय एकता की निरंतर खोज, रोटी तोड़ना अर्थात यूखारिस्तीय जीवन और प्रार्थना के आधार पर परख सकते हैं। वे परिस्थितियाँ जहाँ इन चार बातों का अनुपालन नहीं होता तो वे अपने में कलीसियाई जीवन के बाहर हैं। यह ईश्वर हैं जो कलीसिया का निर्माण करते हैं न कि हमारे कार्यो का कोलाहल।

संत पापा ने कलीसिया के संबंध में अपने विचारों को स्वतः घोषित करते हुए कहा कि कलीसिया कोई बाजार नहीं है, और न ही उद्यमियों का कोई समूह जो नया कार्य करने हेतु आगे आता हो। कलीसिया पवित्र आत्मा का कार्य है जिसे येसु हमें संग्रहित करने हेतु भेजते हैं। यह ख्रीस्तीय समुदाय, ख्रीस्तीय जीवन में, यूख्रारीस्त और प्रार्थना में सदैव पवित्र आत्मा के कार्य हैं। वे चीजें जो इनके बाहर होती हैं बालू में बनाये गये घर के समान है (मत्ती. 7. 24-27)। येसु ख्रीस्त के वचन हमारी मेहनत को शक्ति से भरते और हमें अर्थपूर्ण बनाते हैं। हम नम्रता में विश्व का भविष्य तैयार करते हैं।

कलीसिया राजनीतिक दल नहीं

संत पापा ने अपने हृदय की भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे कभी-कभी दुःख का अनुभव होता है जब मैं यह देखता हूँ कि कुछ समुदाय नेक विचारों के होते हुए भी अपने में गलती करते हैं क्योंकि वे कलीसिया को एक राजनीतिक दल स्वरुप लेते हैं। “आप इसके बारे में, इसके बारे में क्या सोचते हैं... यह धर्मसभा की प्रकिया समान होती है, मगर मैं अपने में पूछता हूँ, “पवित्र आत्मा का स्थान कहाँ हैॽ इस प्रक्रिया में प्रार्थना का स्थान कहाँ हैॽ समुदाय के प्रति प्रेम कहाँ हैॽ यूख्रारिस्तीय बलिदान कहां हैॽ” इन चार बातों की अनुपस्थिति में कलीसिया एक मानव समाज है, एक राजनीतिक दल... जहाँ हम बहुमत के हिसाब से चीजों में परिवर्तन लाते हैं...लेकिन पवित्र आत्मा कहाँ हैॽ संत पापा ने किसी भी कार्य के मूल्यांकन हेतु उपयुक्त चार बातों पर बल दिया। यदि चारों में किसी एक की कमी है तो हम सुन्दर मानवीय संघ हो सकते हैं लेकिन निश्चित ही कलीसिया नहीं। ऐसी स्थिति के कारण ही कलीसिया में विकास नहीं होता है, हम किसी कम्पनी की भांति दूसरों में परिवर्तन नहीं ला सकते बल्कि यह पवित्र आत्मा दूसरों को हमारी ओर आकर्षित करते हैं। संत पापा ने बेनेदिक्त 16वें के कथनों की याद दिलाते हुए कहा, “कलीसिया का विकास धर्मपरिवर्तन में नहीं वरन आकर्षण में होता है”। यदि हम पवित्र आत्मा की अनुपस्थिति पाते जो येसु ख्रीस्त में होता है तो वहाँ कलीसिया नहीं है। यह मित्रों का संघ हो सकता है जिनके उद्देश्य नेक हों परंतु कलीसिया नहीं।

प्रार्थनाः उपहारों का स्रोत

प्रेरित चरित का पठन-पाठन हमें प्रार्थनामय समुदाय द्वारा शक्तिशाली सुसमाचार घोषणा को दिखलाता है जहाँ समुदाय में सहभागी हो रहे लोग सचमुच में येसु की उपस्थिति का अनुभव करते और पवित्र के द्वारा स्पर्श किये जाते हैं। प्रथम ख्रीस्तियों का समुदाय येसु के स्वर्गारोहण की घटना तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि यह निरंतर उनके जीवन में बना रहा। वे येसु ख्रीस्त की बातों को जिन्हें उन्होंने सुना था, प्रार्थना के माध्यम उनकी एकता में प्रवेश करते थे और सारी चीजें उनके लिए नयी हो जाती थीं। प्रार्थना उन्हें दिव्य ज्योति और जोश से भर देती थी जहाँ वे पवित्र आत्मा के उपहार को प्राप्त करते थे।

यही कारण है कि कलीसियाई धर्मशिक्षा ठोस रुप में इस बात को व्यक्त करती है, “पवित्र आत्मा...कलीसिया की प्रार्थना में येसु की यादगारी को सजीव बनाते, साथ ही उसे पूर्ण सच्चाई की ओर ले चलते और ख्रीस्त के अथाह रहस्यों को कलीसियाई जीवन, संस्कारों और प्रेरितिक कामों में व्यक्त करते हैं” (2625)। पवित्र आत्मा कलीसिया में हमें येसु की याद दिलाते हैं। ख्रीस्तियों के रुप में प्रेरिताई के मार्ग में चलते हुए हम पुनः येसु की याद करते और पवित्र आत्मा से प्रेरित आगे बढ़ते हुए सेवा कार्यों में उन्हें घोषित करते हैं। प्रार्थना में ख्रीस्तीय अपने को येसु ख्रीस्त के रहस्य में डूबोते जो हरएक को प्रेम करते और सुसमाचार को सबके लिए प्रसारित करने की चाह रखते हैं। येसु ख्रीस्त सभों के लिए हैं और उनमें हर अलगाव हमसे दूर है जैसे कि संत पौलुस कहते हैं, “वे हमारी शांति हैं, जो हमें एक कर दिया है” (एफे.2.14)।

इस तरह प्रारंभिक कलीसिया के जीवन में निरंतर उत्सव, समारोह, सामुदायिक मिलन और व्यक्तिगत प्रार्थना के समय का एक निरंतर लय था। यह पवित्र आत्मा था जिन्होंने उपदेशकों को अपनी शक्ति से भर दिया जो येसु ख्रीस्त के प्रेम में अपनी समुद्री यात्रा की, खतरों का सामना किया और अपमान के शिकार हुए।

पवित्र आत्मा सुसमाचार प्रचारक

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि ईश्वर हमें प्रेम करते और प्रेम की मांग करते हैं। यह विश्वासियों के पूरे जीवन का रहस्यात्मक आधार है। प्रार्थना में हम प्रथम ख्रीस्तियों की तरह ही, सदियों के उपरांत भी उन्हीं अनुभवों से रुबरू होते हैं। ये पवित्र आत्मा हैं जो सारी चीजों को करते हैं। हर खीस्तीय जो प्रार्थना करने हेतु अपना समय देने से नहीं डरता प्रेरित संत पौलुस की बातों को उद्धघोषित कर सकता है, “मैं अपने शरीर में जो जीवन जीता हूँ उसका एकमात्र प्रेरणा-स्रोत है- ईश्वर के पुत्र में विश्वास जिसने मुझे प्यार किया और मेरे लिए अपने को अर्पित किया।” (गला.2.20) अपने जीवन के शांतिमय स्थिति में हम इस सच्चाई को अनुभव करते हैं। हम अपने हृदय की गहराई में तृत्ममय ईश्वर की आराधना करें। हमारी शांतिमय प्रार्थना हमें ईश्वर को जानने में मदद करती है जो सभी चीजें की शुरूआत और अंत हैं। यह आत्मा की दिव्य ज्योति है जो साक्ष्य और प्रेरिताई हेतु हमें ताकत देती है।

25 November 2020, 14:34