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कोविड : आम बुराई से हम आम अच्छाई की खोज करें

संत पापा फ्राँसिस एक बात से वाकिफ है और बारम्बार दुहरा रहे हैं कि महामारी के बाद हम बेहतर बनेंगे अथवा बतदर हो जायेंगे। वैश्विक संकट के लिए आवश्यक है कि एकात्मक होकर मानव सह-अस्तित्व के मापदंडों को फिर से जोड़ा जाए। इसी मौलिक विचारधारा के आधार पर "कोविड-19 : स्वस्थ भविष्य का निर्माण" की स्थापना समग्र मानव विकास के लिए गठित परमधर्मपीठीय समिति के सहयोग से किया गया है ताकि एक ऐसे दर्शन की ओर प्रेरित किया जा सके जो महामारी के बाद नया भ्रातृत्व का निर्माण करेगा।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शनिवार, 31 अक्टूबर 2020 (वीएन)- स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, सुरक्षा- ये किसी देश की मौलिक आवश्यकताएँ हैं जिनको लाभ का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। अर्थशास्त्री लुईजीनो ब्रुनो, वाटिकन कोविड-19 आयोग के सदस्य हैं जो इस बात से सहमत हैं कि महामारी की सीख हमें इस गहरी सच्चाई को खोजने में मदद देगी जो "सार्वजनिक भलाई" की अभिव्यक्ति से जुड़ा है। यह इसलिए क्योंकि जैसा कि वे मानते हैं हर चीज मूल रूप से सार्वजनिक है: राजनीति अपने वास्तविक अर्थों में, वह अर्थव्यवस्था है जो लाभ कमाने की मांग करने से पहले मानवता को देखती है। महामारी के बाद उत्पन्न इस नये वैश्विक दर्शन में कलीसिया ने कहा है कि इसे सामूहिक देशभक्ति का "गारंटर" बनाना चाहिए क्योंकि अभी तक यह वाणिज्य के तर्क के बाहर है। ब्रूनी की आशा है कि यह अनुभव जिसको वायरस ने दिया है इसकी कोई सीमा नहीं है, हमें मानवीय सहयोग एवं वैश्विक एकात्मता को  नहीं भूलने में मदद देगा। 

-    आप वाटिकन कोविड-19 आयोग के सदस्य हैं जो संत पापा के एक अभूतपूर्व वायरस के लिए तंत्र का जवाब है। इस अनुभव से आप क्या सीखने की उम्मीद करते हैं? किस तरह समाज आयोग के कार्यों से प्रेरित हो सकता है?   

उत्तर- इस अनुभव से मैंने सबसे महत्वपूर्ण चीज सीखी है वह है सार्वजनिक वस्तुओं के लिए एहतियात का सिद्धांत। महामारी के प्रारंभिक चरण में दुनिया के अधिकांश भाग के लिए अनुपस्थित एहतियात का सिद्धांत, कलीसिया के सामाजिक सिद्धांत के स्तंभों में से एक है, जो हमें बेहद महत्वपूर्ण बात बताती है। एहतियात का सिद्धांत व्यक्तिगत स्तर पर जुनूनी तरीके से जिया जाता है लेकिन सामूहिक स्तर पर पूरी तरह से अनुपस्थित है, और इस तरह 21 वीं सदी के समाज को यह बेहद कमजोर बना सकता है। यही कारण है कि जिन देशों ने कल्याणकारी स्थिति को संरक्षण किया है, उन्होंने खुद को पूरी तरह से बाजार और आम तौर पर शासित लोगों की तुलना में बहुत अधिक मजबूत दिखाया है। चूँकि एक आम बुराई ने प्रकट किया है कि आम अच्छा क्या है, इसलिए महामारी ने हमें यह देखने के लिए मजबूर किया है कि समुदाय को न केवल बाजार की किन्तु आम अच्छाई की आवश्यकता है। स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा को सिर्फ मुनाफा के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।

-    संत पापा फ्राँसिस ने वाटिकन कोविड-19 आयोग को भविष्य को तैयार करने के लिए कहा है। इस प्रयास में एक संस्था के रूप में काथलिक कलीसिया की क्या भूमिका होनी चाहिए?

उत्तर- काथलिक कलीसिया उन संस्थाओं में से एक है जो वैश्विक सार्वजनिक कल्याण को गारांटी देती और उसकी रक्षा करती हैं। व्यक्तिगत लाभ पर ध्यान दिये बिना यह सभी की भलाई पर ध्यान देती है। यही कारण है कि वृहद स्तर पर इसे सुना जाता और इसकी जिम्मेदारी है कि यह विश्वस्तर पर इसका अभ्यास करे।   

-    महामारी से आपने क्या व्यक्तिगत सीख पायी? संकट के बाद क्या व्यक्तिगत एवं वैश्विक ठोस परिवर्तन की उम्मीद करते हैं?

उत्तर- पहली सीख संबंधपरक चीजों का मूल्य। इन महीनों में आलिंगन नहीं कर पाने से, मैंने आलिंगन एवं सम्पर्क के महत्व को समझा है। दूसरा, हम ऑनलाईन कार्य एवं सभा कर सकते हैं और घरों में बैठकर कार्यों को निपटा सकते हैं किन्तु महत्वपूर्ण निर्णय एवं सभा के लिए इंटरनेट काफी नहीं है। शारीरिक उपस्थिति की जरूरत है। अतः वर्चुवल हमें शरीर और रक्त के सम्पर्क के महत्व तथा मानव शरीर के विवेक की सीख दे रहा है। मैं उम्मीद करना हूँ कि इन महीनों की सीख को हम नहीं भूलेंगे खासकर, राजनीति (आम बुराई के खिलाफ सार्वजनिक कल्याण की कला) और मानवीय सहयोग एवं वैश्विक एकात्मता के महत्व को।  

-    कोविड के बाद की दुनिया के लिए तैयारी करने में भावी पीढ़ी का निर्माण भी शामिल है जो एक नया रास्ता अपनाने पर जोर देगा। इस अर्थ में, क्या शिक्षा को संकट के समय में भी, केवल "लागत" के रूप में माना जा सकता है?  

उत्तर- बच्चों एवं युवाओं की शिक्षा किसी "खर्च" से बढ़कर है...यह सामाजिक प्रतिफल की उच्चतम दर के साथ एक सामूहिक निवेश है। मैं उम्मीद करता हूँ कि उन देशों में जहाँ स्कूल अब भी बंद हैं जब स्कूल खुलेंगे तो राष्ट्रीय अवकाश को निर्दिष्ट किया जाएगा। लोकतंत्र स्कूल के टेबल पर शुरू होता है और वहां से यह प्रत्येक पीढ़ी में पैदा होता है। पहली धरोहर जिसको हमें पीढ़ियों को हस्तांतरित करना है, वह शिक्षा है।

-    विश्व के लाखों बच्चे शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं क्या मानव अधिकार के वैश्विक घोषणा के 26वें अनुच्छेद को अनदेखा किया जा सकता है जो इस बात की पुष्टि करता है कि हरेक को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है, कम से कम प्राथमिक शिक्षा का?

उत्तर- इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता बल्कि हम इसकी मांग नहीं कर सकते कि पर्याप्त संसाधनों के बिना देश शिक्षा के पूरे खर्च का वहन करे। हमें तुरन्त नये अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नारे को बढ़ावा देना चाहिए, "बच्चों और युवाओं की शिक्षा एक वैश्विक आमहित है" जहाँ अधिक संसाधनों वाले देश, कम संसाधनों वाले देश को मदद करते हैं जिससे कि मुफ्त शिक्षा का अधिकार वास्तविक बन जाए। इस महामारी ने दिखाया है कि विश्व एक बड़ा समुदाय है। हमें इस आम बुराई को नए आम, वैश्विक कल्याण में बदलना चाहिए।

-    धर्म और धर्मों पर शिक्षा युवाओं को क्या सहयोग दे सकती हैं, खासकर, ऐसे विश्व में जहाँ विभाजन बढ़ रहे हैं जो भय और तनाव उत्पन्न कर रहा है?

उत्तर – यह इस पर निर्भर करता है कि किस तरह शिक्षा दी जाती है। नैतिक आयाम जो हर धर्म में है, पर्याप्त नहीं हैं। आज धर्म जो महत्वपूर्ण शिक्षा दे सकती है वह है आंतिरक जीवन एवं आध्यात्मिकता, क्योंकि कुछ ही दशक के अंतराल ने हमारी पीढ़ी से एक हजार साल पुरानी विरासत छीन ली है जिसमें प्राचीन प्रज्ञा और लोकप्रिय भक्ति निहित है। दुनिया के धर्मों को युवाओं की मदद करनी चाहिए और सभी को आंतरिक जीवन का एक नया व्याकरण लिखना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो अवसाद, 21वीं सदी की महामारी बन जायेगी।  

31 October 2020, 16:37