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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

कोविड-19 महामारी के साथ मैं किस तरह जी रहा हूँ, पोप

कोविड-19 द्वारा उत्पन्न इस संकट में पोप क्या अनुभव कर रहे हैं? और आने वाले दिनों के लिए वे किस तरह तैयारी कर रहे हैं? संत पापा फ्राँसिस ने इन्हीं सवारों का उत्तर ब्रिटिश पत्रकार एवं लेखक ऑस्टिन इवेरेन्ह को एक साक्षात्कार में दिया है। इस साक्षात्कार को द टाब्लेट (लंदन) और कोमनवेर (न्यूयॉर्क) में एक साथ प्रकाशित किया गया है। एबीसी इसका मूल लेख स्पानी भाषा में और इताली भाषा में ला चिविल्ता कत्तोलिका में प्रस्तुत करता है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 9 अप्रैल 20 (रेई)- पत्रकार ऑस्टिन को दिये एक रिकॉर्ड किये गये साक्षात्कार में, संत पापा ने कोविड -19 महामारी के इस समय में लॉक डाऊन के साथ अपने जीवन के बारे खुलासा किया है।

कोविड-19 के बीच वाटिकन में जीवन

संत पापा से यह पूछे जाने पर कि वे और परमधर्मपीठीय रोमी कार्यालय के कर्मचारी इस अभूतपूर्व समय में क्या अनुभव कर रहे हैं, उन्होंने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद सभी लोग काम कर रहे हैं। कूरिया (परमधर्मपीठीय रोमी कार्यालय) अपने कार्यों को जारी रखने और सामान्य जीवन जीने का प्रयास कर रही है। कार्यों में पाली की व्यवस्था की गई है ताकि अधिक लोग एक समय में उपस्थित न हों। इसपर अच्छी तरह विचार किया गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा जिन उपायों के निर्देश मिले हैं उनका सख्ती से पालन किया जा रहा है। यहाँ संत मर्था में इन दिनों भोजन के लिए दो बारी की जाती है जिससे प्रभाव कम करने में काफी मदद मिल रही है। हरेक अपने कार्यालय अथवा अपने कमरे से तकनीकी संसाधनों का प्रयोग करते हुए काम कर रहा है। सभी लोग काम कर रहे हैं, यहाँ कोई बिना काम का नहीं है।

संत पापा ने यह भी प्रकट किया कि वे अधिक प्रार्थना कर रहे हैं और अपनी जिम्मेदारियों पर तथा बाद में क्या होगा, उसपर चिंतन कर रहे हैं। “मैं इस समय को बिलकुल अनिश्चितता के रूप में जी रहा हूँ। यह अविष्कार और रचनात्मकता का समय है।” संत पापा ने कहा कि ख्रीस्तीय की रचनात्मकता को ईश्वर एवं लोगों तक पहुँचाने के लिए, नया क्षितिज और खिड़की खोलने की आवश्यकता है तथा घर में होने का एक नया तरीका खोजना है। अपने घरों तक सीमित रहना आसान नहीं है। महामारी के बाद की स्थिति तथा कलीसिया के शीर्ष के रूप में अपनी भूमिका पर बात करते हुए संत पापा ने कहा, “बाद की स्थिति, एक त्रासदी और दुखद रूप में प्रकट होना शुरू हो चुका है यही कारण है कि हमें इसके बारे अभी से सोचना है। समग्र मानव विकास हेतु गठित परमधर्मपीठीय परिषद इस पर काम कर रहा है और मेरे साथ बैठकी कर रहा है।”

अर्थव्यवस्था एवं जिम्मेदारियाँ

रिकोर्ड किये गये साक्षात्कार में संत पापा ने गौर किया है कि महामारी से अपने नागरिकों की रक्षा हेतु सरकारों ने “अनुकरणीय उपाय” अपनाये हैं किन्तु हम महसूस कर सकते हैं कि हमारे सभी सोच, अर्थव्यवस्था के चारों ओर आकार लिये हुए हैं। अर्थव्यवस्था की दुनिया में, ऐसा लगता है कि (लोगों का) त्याग करना, फेंकने की संस्कृति की राजनीति जीवन के शुरू से अंत तक सामान्य है। उन्होंने कहा कि अब भी बेघर लोग बेघर ही हैं। लास वेगस के पार्क में उन्हें एक दिन अलग अलग (क्वारेनटाईन) रखे हुए दिखाया गया था। हॉटेल खाली थे किन्तु बेघर उन हॉटेलों में नहीं जा सकते। यही फेंकने की संस्कृति हैं।

मन-परिवर्तन का अवसर

साक्षात्कार के दौरान संत पापा से पूछा गया कि क्या यह ऐसी अर्थव्यवस्था को देखना संभव है जो अधिक मानवीय है, और क्या वे संकट और आर्थिक तबाही को प्राथमिकताओं और जीवनशैली को फिर से आश्वस्त करने के लिए एक पारिस्थितिक बदलाव के अवसर के रूप में देखते हैं?  संत पापा ने उत्तर दिया कि “हर संकट में खतरे एवं अवसर दोनों होते हैं। खतरे से बाहर निकलने हेतु आज का रास्ता, मेरे विचार से यह है कि हमें उत्पादन एवं उपभोग के स्तर पर कमी लानी होगी (लौदातो सी,191) तथा प्राकृतिक जगत को समझने एवं उसपर चिंतन करने की आवश्यकता है। हमें अपने वास्तविक परिवेश से जुड़ने की जरूरत है। यह मन-परिवर्तन का अवसर है।

संत पापा ने कहा, “जी हाँ, मैं एक अर्थव्यवस्था के चिन्ह को देख रहा हूँ जो कम तरल और अधिक मानवीय है किन्तु ये सब बीत जाने के बाद हम अपनी यादों को न भूल जाएँ, सबकुछ को एक किनारे रखकर, जहाँ थे वहीं वापस न चले जाएँ।” यह समय है महत्वपूर्ण कदम लेने का, प्रकृति का प्रयोग और दुरूपयोग करने से हटकर उसपर चिंतन करने का। हमने चिंतन करने के आयाम को खो दिया है और इस समय हमें इसे वापस पाना है। संत पापा ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि यदि हम परिस्थिति के अंदर नहीं जाएँगे और गरीबों के पीड़ित शरीर की दुनिया के ऊपर से पार हो जायेंगे, तो कोई बदलाव नहीं होगा।

सबसे निकट के संत

संत पापा ने गौर किया कि जब बहुत सारे लोग महामारी का सामना कर रहे हैं, संत हमारे ही सामने हैं। वे नायक हैं- डॉक्टर्स, स्वयंसेवक, धर्मबहनें, पुरोहित और दुकानदार जो अपने कार्यों को जारी रखते हैं ताकि समाज आगे बढ़ता रहे। यदि हम अपने द्वार के सामने के संतों के चमत्कारों के प्रति सजग होंगे, यदि हम उनके रास्तों का अनुसरण करेंगे, तब चमत्कार सभी की भलाई के लिए अच्छी तरह पूरे होंगे। हम चीजों को आधा छोड़ते हैं किन्तु ईश्वर उन्हें आधे रास्ते पर नहीं छोड़ते।

यह पूछे जाने पर कि क्या इस संकट से एक ऐसी कलीसिया उत्पन्न होगी जो अधिक मिशनरी, अधिक रचनात्मक और संस्थाओं पर अधिक आसक्त नहीं होगी, संत पापा ने कहा कि कलीसिया का निर्माण करने वाले पवित्र आत्मा हैं जो कलीसिया विरोधी नहीं हैं। हमें उस कलीसिया में भी जीने सीखना है जिसमें पवित्र आत्मा द्वारा सौहार्द और अव्यवस्था के बीच तनाव की स्थिति हो। यदि आप मुझे पुछेंगे कि इसे अधिक अच्छी तरह समझने के लिए ईशशास्त्र की कौन सी किताब मदद कर सकती है तो वह किताब है प्रेरित-चरित। उसमें आप देखेंगे कि पवित्र आत्मा उन चीजों को समाप्त करते हैं जिनका प्रयोग नहीं होता और कलीसिया के भविष्य का निर्माण करते हैं। यही कलीसिया है जिसे संकट से बाहर निकलना है।

हमारी रचनात्मकता

संत पापा ने कहा कि हमें अपने आपमें बंद होने को, पूरी रचनात्मकता के साथ जवाब देना चाहिए। हम संचार माध्यमों के द्वारा या तो निराश हो सकते हैं अथवा भटक सकते हैं जो हमें सच्चाई से दूर ले जाते हैं अथवा हम रचनात्मक बन सकते हैं।

घर में हमें एक प्रेरितिक रचनात्मकता की आवश्यकता है, उस रचनात्मकता से कई अप्रयुक्त चीजों द्वारा ईश्वर की प्रजा के रूप में समुदाय में हमारे विश्वास को व्यक्त करने की लालसा को व्यक्त किया जा सकता है। इस तरह तालाबंदी में रहते हुए भी उस याद से पोषित होना है जो आशा उत्पन्न करती है। यही हमें अपने में बंद होने से बचने में मदद देगा।

यह पूछने पर कि गरीबों एवं वयोवृद्धों के लिए वे क्या संदेश देना चाहते हैं, संत पापा ने कहा कि बुजूर्ग हमारे मूल हैं। उन्होंने कि उन्हें युवाओं से बात करना चाहिए। बुजूर्गों एवं युवाओं के बीच की दूरी को एक-दूसरे के साथ मुलाकात के द्वारा हल किया जा सकता है। जो लोग आज महामारी के संकट के कारण वंचित हैं, वे हमेशा से वंचित रहने वाले लोग हैं। मैं लोगों से कहना चाहता हूँ कि वे बुजूर्गों को लेकर, उनके पंखों के नीचे युवाओं को रखें ताकि वे उनके पंखों के नीचे से इतिहास ले सकें।

10 April 2020, 11:56