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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

पृथ्वी, गृह-वाटिका की रक्षा करें, संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर 50वें पृथ्वी दिवस पर धर्मशिक्षा देते हुए इसकी रक्षा करने का आहृवान किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन के प्रेरितिक पुस्तकालय से सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज हम 50वाँ पृथ्वी दिवस मनाते हैं। यह हमारे सामान्य घर के प्रति प्रेम में हमारी निष्ठा और उसकी देखभाल करने के साथ-साथ समाज के कमजोर सदस्यों की सेवा में अपने समर्पण को नवीकृत करने का अवसर है। कोविड की भयावह महामारी ने जिस भांति हमें शिक्षा दी है कि हम वैश्विक चुनौतियों पर तब विजय होते जब हम अपनी एकात्मकता में एक-दूसरे का साथ देते औऱ अपने बीच में उपस्थित अतिसंवेदशील लोगों का आलिंगन करते हैं। प्रेरितिक प्रबोधन “लौदातो सी” मुख्यतः पृथ्वी हमारे “सामान्य घऱ की देख-रेख” हेतु हमारा ध्यान आकर्षित कराती है। आज, हम एक साथ मिलकर पृथ्वी के प्रति अपने उत्तरदायित्वों पर थोड़ा चिंतन करें।

मानव लौकिक-अलौकिक

हम पृथ्वी से उत्पन्न होते हैं और पृथ्वी के फलहित चीजें हमें जीवन प्रदान करती हैं। लेकिन, जैसे कि हमें उत्पत्ति ग्रंथ याद दिलाती है, हम अपने में केवल “भौतिक” नहीं हैं वरन हम अपने में ईश्वरीय श्वास को वहन करते हैं जो हमारे लिए जीवन का स्रोत है। (उत्पि.2.4-7) इस प्रकार इस सामान्य घर, जैव विविधता में हम ईश्वर के अन्य प्राणियों संग एक मानव परिवार में रहते हैं। इस भांति ईश्वर के प्रतिरूप हम सभी प्राणियों की देख-रेख और उनका सम्मान करते हुए, अपने भाई-बहनों के प्रति प्रेम और करूणा को प्रकट करने हेतु बुलाये जाते हैं विशेषकर उनके लिए जो हमारे बीच अति संवेदनशील हैं, जैसे कि ईश्वर ने अपने पुत्र येसु ख्रीस्त में अपने प्रेम को प्रकट किया, जो हमारे लिए मनुष्य बनकर धरती पर जीवन देने आये।

हमारे स्वार्थ का फल

अपने स्वार्थ के कारण हम रक्षकों और प्रबंधकों के रुप में पृथ्वी के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में असफल रहे हैं। “हमें केवल ईमानदारीपूर्वक इस सच्चाई को देखने की जरुरत है कि हमारा सामान्य घर गंभीर मरम्मतहीन स्थिति में है।” हमने इस प्रदूषित और नष्ट कर दिया है, जो हमारे जीवन के लिए खतरा उत्पन्न करता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि बहुत से अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय अंदोलनों की उत्पत्ति हुई है जिससे वे हमारी अंतर-आत्मा को जगायें। मैं उन पहलों की प्रशंसा करता हूँ, हमें अपने बच्चों को गलियों में ले जाते हुए इसके बारे में चर्चा करने की जरुरत है कि यदि हम जीवन देने वाले पर्यावरण को नष्ट करेंगे तो हमारा भविष्य भी खत्म हो जायेगा।

पृथ्वी हमारी गृह-वाटिका

हम पृथ्वी की देख-रेख करने हेतु असफल रहे हैं जो हमारी गृह-वाटिका है। हम अपने भाई-बहनों की चिंता करने में असमर्थ रहे हैं। हमें पृथ्वी, पड़ोसियों और अंततः सृष्टिकर्ता के विरूद्ध अपराध किया है, वे उदार पिता जो हमें सभी चीजों को प्रदान करते हैं जो हम से यही चाह रखते हैं कि हम एकता में एक साथ मिलकर विकास करें। पृथ्वी इसका प्रतिरोध कैसे करती हैॽ संत पापा ने कहा कि स्पानी भाषा में एक कहावत है, “ईश्वर सदा क्षमा करते हैं, हम मानव कभी क्षमा करते और कभी नहीं करते हैं, लेकिन पृथ्वी कभी क्षमा नहीं करती है”। पृथ्वी हमें क्षमा नहीं करती है यदि हमने इसे नष्ट किया है तो इसका अंजाम हमारे लिए बहुत बुरा होगा।

मानवः ईश्वरीय कृति का विनाशक

हम कैसे पृथ्वी और सारी मानवता के साथ कैसे एक सामंजस्यपूर्ण संबंध पुनः स्थापित कर सकते हैंॽ हम बहुत बार एकता में बन रहने की अपनी दृष्टि को खो देते हैं जो हमारे लिए पवित्र आत्मा की ओर से आती है। अपने सामान्य घर में, पृथ्वी, दूसरों के संग, अपने पड़ोसियों, अत्यंत गरीबों के संग हम कैसे सामंजस्य बनाये रख सकते हैंॽ हमें अपने सामान्य घर को एक नई निगाहों से देने की जरुरत है। यह हमारे लिए संपतियों का कोई खदान नहीं जिसका हम दुरूपयोग करें। हम विश्वासियों के लिए प्राकृत संसार, “सृष्टि का सुसमाचार है”, जो हमारे जीवन में ईश्वरीय सृजनात्मकता को व्यक्त करता है, जो पूरे संसार और इसमें व्याप्त चीजों को अपने में सम्माहित करता जिससे मानवता अपने में जीवित रह सके। “ईश्वर ने अपने द्वारा बनाई गई सारी चीजों को देखा और उसे बहुत अच्छा लगा”, धर्मग्रंथ बाईबल में सृष्टि के कार्य का समापन ऐसे होता है (उत्पि.1.31)। संत पापा ने कहा, “आज प्राकृति की दुर्दशा को देखते हुए यदि हम ईश्वर से पूछें कि वे इसके बारे में क्या सोचते हैं, तो मैं नहीं सोचता कि वे इसे बहुत अच्छा कहेंगे। हमने ईश्वर के कार्य को बर्बाद कर दिया है।”  

आज पृथ्वी दिवस मनाते हुए, हम पृथ्वी की पवित्रता को लेकर अपने विचारों को नवीकृत करने हेतु बुलाये जाते हैं क्योंकि यह न केवल हमारा घर है वरन यह ईश्वर का भी निवास स्थल है। यह हमें इस बात से और भी अधिक सजग करे कि हम पवित्र भूमि में खड़े होते हैं।

संत पापा फ्रांसिस ने कहा, “हम अपने में ईश्वर प्रदत्त सौंदर्य को देखने और विचार मंथन की इंद्रियों को जागृत करें। प्रार्थनामय चिंतन के प्रेरितिक उपहार को हम विशेष रुप से आदिवासियों से सीख सकते हैं। वे हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि जबतक हम सृष्टि से प्रेम और उनका सम्मान नहीं करते तबतक हम उसे चंगा नहीं कर सकते हैं। उनके पास “अच्छा जीवन” का ज्ञान है वे पृथ्वी के संग सामजंस्य में जीवन व्यतीत करते हैं।

दो अति महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 

वहीं हमें पर्यावरण के प्रति अपने में एक परिवर्तन लाने की जरूरत है जो हमारे ठोस कार्यों में ही पूरा होगा। एकल और संयुक्त परिवारों के रुप में हमें एक सुनियोजित परियोजना की जरुरत है जिससे हम अपने सामान्य घर को खतरों से बचा सकें। एक दूसरे में हमारी निर्भरता हमें विश्व को एक परिवार के रूप में, एक योजना में देखते हेतु मदद करती है (लौदातो सी 164)। हम अपने में इस बात से वाकिफ हैं कि हमारे सामान्य घर की रक्षा हेतु अंतरराष्ट्रीय तौर पर हमारा एक दूसरे से सहयोग करना कितना महत्वपूर्ण है। संत पापा फ्रांसिस ने विश्व के नेताओं से आग्रह किया कि वे चीन के कुनमिंग में जैव विविधता सीओपी 15 और यूनाईटेड किंनडम के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन से संबंधित सीओपी 26  अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की तैयारी करें। ये दोनों अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अपने में अति महत्वपूर्ण हैं।

सबका सहयोग महत्वपूर्ण

संत पापा ने कहा कि मैं राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर में इस संदर्भ में हो रह कार्यों की प्रशंसा करता हूँ। यदि सभी समाज के लोग जमीनी स्तर पर एक साथ मिलकर एक आंदोलन की शुरूआत करें तो यह हमारे लिए फायदेमंद होगा। पृथ्वी दिवस जिसे आज हम सभी मना रहे हैं विशेषकर इसकी शुरूआत ऐसे ही हुई थी। हममें से प्रत्येक जन छोटे रुप में अपना सहयोग दे सकते हैं। “हमें ऐसा सोचे की जरुरत नहीं कि इनका प्रभाव विश्व को बदल सकता है। ये समाज के लिए लाभप्रद हैं जिसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि ये अपने में भलाई की मांग करते हैं, जो अदृश्य हैं जो अनिवार्य रूप से फैलता है” (लौदातो सी, 212)।

पास्का के इस नवीन समय में, हम पृथ्वी, अपने सामान्य घर को प्रेम करने और उसका सम्मान करने हेतु प्रण करें और इस परिवार के सभी सदस्यों का सम्मान करें। भाई-बहनों के रुप में हम सभी एक साथ मिल कर स्वर्गीय पिता से निवेदन करें, “पवित्र आत्मा भेजा कर, हे ईश्वर, तू पृथ्वी का रुप नया बन दे” (स्तो.104.30)।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों को अपने प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। 

22 April 2020, 13:56