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आँधी को शांत करते येसु आँधी को शांत करते येसु 

बुलाहट के लिए विश्व प्रार्थना दिवस हेतु संत पापा का संदेश

संत पापा फ्राँसिस ने बुलाहट के लिए 57वें विश्व प्रार्थना दिवस के अवसर पर एक संदेश प्रकाशित कर सभी पुरोहितों, धर्मसमाजियों एवं विश्वासियों को सम्बोधित किया तथा बुलाहट को प्रोत्साहन देने का आग्रह किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलावार, 24 मार्च 20 (रेई): संत पापा ने संदेश में सुसमाचार में निहित गलीलिया झील में रात के समय आँधी को शांत करने की घटना की याद की।

उन्होंने कहा कि रोटी का चमत्कार जिसने भीड़ को आश्चर्यचकित कर दिया था उसके बाद येसु ने चेलों से कहा कि वे नाव पर चढ़ें और झील के दूसरे किनारे की ओर बढ़ें जबकि वे उनसे अलग हो गये। चेलों द्वारा नाव से झील पार करना हमारी जीवन यात्रा के समान है। यद्यपि हमारे जीवन की नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, हम बेचैन होकर सुरक्षित स्वर्ग की ओर नजर डालते एवं समुद्र की कठिनाइयों का सामना करने की तैयारी करते हैं। साथ ही खेवनहारे पर विश्वास करती हैं कि वे हमें सही लक्ष्य पर पहुँचा देंगे। कई बार नाव बह जाती है अथवा मृगतृष्णा में खो जाती है तथा कठिनाइयों, संदेह और भय के तूफानों से थपेड़ी जाती है।

संत पापा ने कहा कि कई बार नाजरेथ के गुरू का अनुकरण करने हेतु बुलाये गये लोगों के हृदयों में ऐसा ही होता है। उन्हें प्रभु का शिष्य बनने के लिए पार करना पड़ता है एवं अपनी हर प्रकार की सुरक्षा को त्याग देना होता है। नाव में शिष्यों को जो अनुभव हुआ वह वास्तविक है, हमारे जीवन में भी रात आती है, विपरीत परिस्थितियाँ आती हैं, असफलताओं का डर होता है और अपनी बुलाहट में असफल होने का भय सताता है। सुसमाचार बतलाता है कि इस चुनौतीपूर्ण यात्रा में हम अकेले नहीं हैं। जिस तरह येसु ने पेत्रुस को पानी पर चलने के लिए निमंत्रण दिया और डूबने से उसे बचा लिया, उसी तरह वे हमें बचाते हैं। संत पापा ने बुलाहट में तीन महत्वपूर्ण शब्दों पर चिंतन किया- कृतज्ञता, प्रोत्साहन और दुःख।

कृतज्ञता

संत पापा ने कहा कि सही दिशा अपनाना हमारा अपना नहीं है और न ही उस रास्ता पर निर्भर करता है जिसपर चलने का निर्णय हम करते हैं। सबसे बढ़कर यह ऊपर से आनेवाले एक बुलावे का प्रत्युत्तर है। ईश्वर हमारे लिए विपरीत दिशा में लक्ष्य निर्धारित करते हैं और हमें नाव खेने का साहस प्रदान करते हैं। हमें बुलाहट प्रदान कर वे स्वंय हमारे खेवनहार बन जाते हैं। वे हमें साथ देते और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। वे हमें निर्णय बदलने से बचाते एवं बढ़ते जल में भी चलने का साहस प्रदान करते हैं।

हर बुलाहट प्रेम भरी नजर से उत्पन्न होती है जिसको हम प्रभु से मुलाकात में पाते हैं। बुलाहट हमारे चुनाव से बढ़कर प्रभु के बुलावे का प्रत्युत्तर है। जब हम कृतज्ञता से अपना हृदय खोलते तब हम अपनी बुलाहट को महसूस करते हैं और प्रभु को अपने पास से गुजरते हुए देखते हैं।

प्रोत्साहन

जब शिष्यों ने पहली बार येसु को समुद्र में चलते देखा तब शुरू में उन्होंने उन्हें प्रेत समझा और अत्यधिक डर गये। तब येसु ने तुरन्त यह कहते हुए उन्हें आश्वस्त किया, “ढाढ़स रखो, डरो मत, मैं ही हूँ।” (मती. 14.27) यही हमारे लिए प्रोत्साहन है।

हमारी जीवन यात्रा में कौन-कौन सी बाधाएँ आती हैं। हमारा विकास, हमारे लिए रास्ते का चुनाव जिनको प्रभु हमें प्रदान करते, हमें भयभीत करते हैं। जब प्रभु हमें सुरक्षित किनारे को त्यागने एवं विवाह, पुरोहिताई अथवा समर्पित जीवन के लिए बुलाते हैं तब हमारी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है, हमें अविश्वास का प्रेत डराता है और हम कई तरह के सवाल करने लगते हैं।

प्रभु जानते हैं कि जीवन के महत्वपूर्ण चुनाव जैसे - विवाह या सेवा हेतु समर्पित जीवन, हमसे साहस की मांग करते हैं। वे हमारे सवाल, संदेह और कठिनाइयों से परिचित हैं अतः हमें आश्वासन देते हैं कि ढाढ़स रखो, डरो मत, मैं ही हूँ। हम विश्वास करते हैं कि वे हमेशा हमारे साथ हैं, हमसे मुलाकात करने आते हैं एवं तूफानों के बीच भी वे हमारे साथ रहते हैं। यह चेतना हमें आलस्य से मुक्त करता है जबकि आंतरिक निरूत्साह हमें बुलाहट की सुन्दरता को महसूस करने नहीं देता।

दुःख या थकान 

संत पापा ने बुलाहटीय जीवन के लिए तीसरे शब्द दुःख को थकान कहा। हर बुलाहट में जिम्मेदारी होती है। प्रभु हमें बुलाते हैं ताकि पेत्रुस की तरह पानी के ऊपर चलने के लिए कह सकें, अर्थात् हम अपने हरेक दिन के वास्तविक जीवन में, प्रभु के कहे रास्ते पर, जिम्मेदारी लेने के साहस और सुसमाचार की सेवा में अपने आपको समर्पित कर सकें। संत पेत्रुस की तरह हममें भी तीव्र अभिलाषा एवं उत्साह के साथ-साथ भय और कमजोरियाँ जो सकती हैं। चाहे यह वैवाहिक जीवन हो या पुरोहिताई का जीवन, अपनी अपनी जिम्मेदारियों में जब कठिनाइयाँ आती हैं और तब हम येसु की नजरों से दूर हो जाते हैं और पेत्रुस की तरह डूबने लगते हैं। दूसरी ओर हमारी कमजोरी एवं दुर्बलताओं के बावजूद विश्वास हमें पुनर्जीवित ख्रीस्त की ओर बढ़ने में मदद देते हैं।

अंत में येसु नाव पर चढ़ते और तूफान को शांत कर देते हैं। यह एक सुन्दर दृश्य है कि हमारे जीवन की तूफानों एवं कठिनाइयों को प्रभु किस तरह शांत कर सकते हैं। वे उस तूफान को शांत करते हैं ताकि बुराई, डर और त्याग देने की शक्ति हम पर हावी न हो।

संत पापा ने सभी का आह्वान करते हुए बुलाहट को बढ़ावा देते रहने का आग्रह किया। उन्होंने माता मरियम से कामना की कि वे हमारा साथ दें एवं हमारे लिए प्रार्थना करें।

24 March 2020, 15:26