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प्रभु के मंदिर में समर्पण महापर्व पर ख्रीस्तयाग प्रभु के मंदिर में समर्पण महापर्व पर ख्रीस्तयाग   (Vatican Media)

प्रभु के मंदिर में समर्पण महापर्व पर संत पापा का प्रवचन

संत पापा फ्राँसिस ने प्रभु के मंदिर में समर्पण महापर्व एवं विश्व समर्पित जीवन दिवस की पूर्व संध्या को, वाटिकन के संत पेत्रुस महागिरजाघर में समारोही ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शनिवार, 1 फरवरी 2020 (रेई)˸ संत पापा ने प्रवचन में कहा, "मेरी आँखों ने उस मुक्ति को देखा है।" (लूक. 2,30) ये शब्द सिमेयोन के हैं जिसको बाईबिल एक सरल व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जो एक धर्मी तथा भक्त पुरुष था। (पद. 25) मंदिर में रहने वालों में केवल उसी ने येसु को एक मुक्तिदाता के रूप में देखा। उसने क्या देखा? एक बालक जो छोटा, कमजोर और साधारण था, किन्तु उसी में उसने मुक्ति देखी, क्योंकि पवित्र आत्मा ने यह सूचना दी थी कि वह प्रभु के मसीह को देखे बिना नहीं मरेगा। (पद. 26) उसे अपनी बाहों में लेते हुए विश्वास में उसने महसूस किया कि ईश्वर उनमें अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगे और उसे लगा कि वे अब शांति से विदा ले सकते हैं क्योंकि उनके जीवन के लिए इस कृपा से बढ़कर और कुछ नहीं था।

संत पापा ने समर्पित भाई-बहनों को सम्बोधित कर कहा कि "आपने भी भौतिक चीजों की अपेक्षा अधिक मूल्यवान खजाने को प्राप्त करना चाहा। अतः आपने कीमती चीजों जैसे सम्पति और परिवार को छोड़ दिया। आपने क्यों ऐसा किया? क्योंकि आपने येसु से प्रेम किया, उनमें आपने सब कुछ देखा और उनकी नजरों से रोमांचित हुए तथा सब कुछ को पीछे छोड़ दिया।"

समर्पित जीवन

इसका अर्थ है उन चीजों को देखना जो जीवन के लिए सचमुच महत्वपूर्ण हैं। इसका अर्थ है सिमेयोन की तरह खुली बाहों से प्रभु के वरदान को ग्रहण करना। समर्पित लोगों की आँखें यही देखती हैं कि उनके हाथों में ईश्वर की कृपा डाली गयी है। समर्पित व्यक्ति वह है जो हर दिन अपने आपको देखता और कहता है कि "सब कुछ कृपा है।"  

संत पापा ने कहा कि हम समर्पित जीवन के योग्य नहीं हैं, यह प्रेम का वरदान है जिसको हमने ग्रहण किया है।  

मेरी आँखों ने उस मुक्ति को देखा है। हम इस प्रार्थना को हर रोज रात्रि वंदना में करते हैं। और यह कहते हुए अपने दिन का समापन करते हैं, "प्रभु, मेरी मुक्ति आपसे आती है, मेरे हाथ खाली नहीं हैं किन्तु आपकी कृपा से पूर्ण हैं।" संत पापा ने कहा कि कृपा को देख पाना आरम्भिक विन्दु है। अपने जीवन को देखना एवं ईश्वर की कृपा को देखना। न केवल जीवन की सफलताओं में बल्कि अपनी कमजोरी एवं असफलताओं में। शैतान हमारी गरीबी, हमारे खाली हाथ की ओर दिखलाता है। वह कहता है कि इन सालों में तुमने कुछ हासिल नहीं किया, तुम्हें जो करना था उसे नहीं किया और निष्ठावान भी बने नहीं रह सके, तुम अयोग्य हो। फिर हम पीछे लौटकर उन बातों को सोचते एवं याद करते हैं जो हमें दिशाहीन बनाते हैं। इस प्रकार, हम ईश्वर के मुफ्त प्यार को खो देते हैं जबकि ईश्वर हमेशा हमें प्यार करते हैं और कमजोर होने पर भी अपने आपको हमारे लिए अर्पित करते हैं।

संत पापा फ्राँसिस
संत पापा फ्राँसिस

हमारी नजर

जब हम अपनी नजर उनपर लगाते हैं, उनकी क्षमा के लिए अपने आप को खोलते हैं तब वे हमें नवीकृत करते और उनकी सत्य प्रतिज्ञता की याद करते हैं। आज हम अपने आपसे पूछें, मैं किसपर अधिक ध्यान देती हूँ प्रभु पर या अपने आप पर? जो लोग प्रभु की कृपा को महसूस करते हैं वे दुनियावी चीजों में भरोसा नहीं करने की दवाई को खोज पाते हैं।

संत पापा ने कहा कि एक प्रलोभन है जो समर्पित जीवन को दुनियावी तरीके से देखने के लिए प्रेरित करती है। इसके द्वारा ईश्वर की कृपा को जीवन की ऊर्जा के रूप में नहीं देखा जाता है। जब एक समर्पित जीवन ईश्वर की कृपा से संलग्न नहीं होता तब वह अपने आप में केंद्रित हो जाता है। तब वह अपनी सम्पति पर ध्यान देता है एवं स्थिर हो जाता। इसका परिणाम क्या होता है उसे हम जानते हैं। हम अपनी जगह और अधिकार की मांग करने लगते हैं और गपशप एवं बदनामी की बातों में फंसने लगते हैं। हमारी इच्छा अनुसार नहीं होने वाली हर छोटी बात हमें चुभने लगती है। हम अपनी धर्मबहनों, धर्म भाइयों, समुदाय, कलीसिया एवं समाज के बारे शिकायत करने लगते हैं। हम प्रभु को कहीं नहीं देख पाते बल्कि दुनिया की गतिशीलता देखते और हमारे हृदय में जड़ता आ जाती है। हम आदत के गुलाम बन जाते हैं जबकि हमारे अंदर उदासी और अविश्वास बढ़ता है जो अंततः छोड़ने के लिए मजबूर करता है। यह है दुनियादारी दृष्टि जो हमें अपनी ओर खींचती है।

जीवन का सही दृष्टिकोण

जीवन का सही दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए, हमें सिमेयोन के समान ईश्वर से कृपा मांगने की जरूरत है। सुसमाचार बतलाता है कि वह तीन बार पवित्र आत्मा से विशेष रूप से प्रेरित हुआ था। ईश्वर के प्रेम से ही वह पवित्र आत्मा से प्रेरित हुआ। यदि समर्पित जीवन प्रभु के प्रेम में बना रहता है तब यह सुन्दरता को देख पाता है। वह देख पाता है कि गरीबी एक चमत्कार नहीं है बल्कि यह एक आजादी है जिसको ईश्वर हमें प्रदान करते हैं।

शुद्धता कोई कठोर बंझपन नहीं है बल्कि अधिकार किये बिना प्यार करना है। आज्ञाकारिता, अनुशासन मात्र नहीं है बल्कि येसु के रास्ते पर अपनी अव्यवस्था पर विजय पाना है।

जो लोग चीजों को येसु की नजर से देखते हैं वे सेवा करने के लिए जीते हैं। वे दूसरों के पहल का इंतजार नहीं करते बल्कि खुद अपने पड़ोसियों की खोज करने निकलते हैं जैसा कि सिमेयोन ने येसु को मंदिर में पाया। समर्पित जीवन में हम पड़ोसी कहाँ खोजने जाएँ? सबसे पहले हम अपने ही समुदाय में खोजें। इसके लिए कृपा की याचना करें कि हम अपने भाई-बहनों में येसु को देख पायें। हम उन्हें सभी में पा सकते हैं जब हम उदार बनते हैं, गरीबी में भाई-बहनों का स्वागत करते हैं।  

येसु का अनुसरण

आज लोग एक-दूसरे में बाधाओं और जटिलताओं को ही देख पाते हैं। जबकि हमें उस नजर से देखने की आवश्यकता है जिसमें हम पड़ोसियों को देख पायें। धर्मसमाजी जो येसु का अनुसरण करते हुए जीते हैं उन्हें दुनिया की ओर नजर डालने की जरूरत है एक करुणा की नजर, एक ऐसी नजर जो दूर के लोगों को खोजने जाती है, जो निंदा नहीं करती बल्कि प्रोत्साहन देती, मुक्त करती एवं सांत्वना देती है।

सिमेयोन की आँखों ने मुक्ति को देखा क्योंकि वे प्रतीक्षा कर रही थीं। पूरी आशा के के साथ इंतजार कर रही थी। वे ज्योति की उम्मीद कर रही थीं और उन्होंने संसार की ज्योति को देखा। समर्पित लोगों की आँखों को आशा की आँख होनी चाहिए। दुनियावी नजर का प्रलोभन हमेशा रहता है जिसके कारण हम आशा खो देते हैं। हम सुसमाचार को देखें, सिमेयोन और अन्ना के जीवन पर गौर करें, वे वयोवृद्ध थे, अकेले थे, फिर भी उन्होंने आशा नहीं खोया क्योंकि वे प्रभु के साथ संयुक्त थे। अन्ना मंदिर से कभी अलग नहीं हुई, रात और दिन उपवास एवं प्रार्थना की। यही कारण है कि वह प्रभु से कभी अलग नहीं हुई जो उनकी आशा के स्रोत हैं। यदि हम प्रभु को हर दिन नहीं देखते, उनकी आराधना नहीं करते हैं तो अंधे बन जाते हैं।

संत पापा ने सभी समर्पित लोगों का आह्वान करते हुए कहा कि हम समर्पित जीवन की कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें तथा उसे नये तरीके से देख पाने हेतु कृपा की याचना करें ताकि अनुग्रह को कैसे देखना है, पड़ोसी को कैसे देखना है और कैसे आशा करना है उसे जान सकेंगे। तब हमारी आँखें भी मुक्ति को देखेंगी।

धर्मसमाजी ख्रीस्तयाग में भाग लेते हुए
धर्मसमाजी ख्रीस्तयाग में भाग लेते हुए

 

01 February 2020, 16:08