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मिस्सा के दौरान संत पापा फ्राँसिस मिस्सा के दौरान संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

ईश्वर की माँ- महिलाओं की गरिमा और उपहार, संत पापा

53 वें विश्व शांति दिवस पर पहली जनवरी ईश्वर की माता मरियम के पर्व पर संत पापा फ्राँसिस ने संत पेत्रुस महागिरजाघर में पवित्र युखरीस्तीय समारोह का अनुष्ठान किया।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 1 जनवरी 2020 (वाटिकन न्यूज) : संत पापा फ्राँसिस ने वर्ष के पहले दिन ईश्वर की माता मरियम के पर्व पर संत पेत्रुस महागिरजाघर में पवित्र युखरीस्तीय समारोह का अनुष्ठान किया।

 इस दिन के लिए चयनित पाठ पर चिंतन करते हुए संत पापा ने कहा, “जब समय पूरा हुआ तो ईश्वर ने अपने बेटे को इस दुनिया में भेजा।  वे एक महिला के गर्भ में आये और मानव के रुप में येसु इस दुनिया में आये।

नारी द्वारा मुक्ति की शुरुआत

संत पापा ने कहा कि साल के पहले दिन हम ईश्वर और मनुष्य के बीच इस शादी का उत्सव मनाते हैं, जिसका उद्घाटन एक महिला के गर्भ में होता है। हमारी मानवता हमेशा ईश्वर में रहेगी और मरियम हमेशा ईश्वर की माँ होगी। वे महिला और माँ है। उसी नारी द्वारा मुक्ति की शुरुआत हुई और इसलिए नारी के बिना मुक्ति नहीं है।

यही कारण है कि "एक महिला पर की गई हिंसा का हर रूप ईश्वर के खिलाफ एक निन्दा है, जो एक महिला से पैदा हुए थे," संत  पापा फ्राँसिस ने कहा। "कितनी बार महिलाओं के शरीर को विज्ञापन, मुनाफाखोरी और पोर्नोग्राफी की अपवित्र वेदियों पर बलि चढ़ाया जाता है, जिसका एक कैनवास की तरह उपयोग कर शोषण किया जाता है।" "महिलाओं के शरीर को उपभोक्तावाद से मुक्त किया जाना चाहिए। उन्हें आदर और सम्मान दिया जाना चाहिए"।

दिल में रखना

संत पापा फ्राँसिस ने सुसमाचार में मरियम की छवि का उल्लेख करते हुए कहा कि मरियम "सभी बातों को अपने हृदय में संजोए रखते थी। महिलाएं आमतौर पर जीवन को हृदय से लगाती हैं। महिलाएं हमें दिखाती हैं कि जीवन का अर्थ चीजों को बनाने में नहीं, बल्कि चीजों को दिल में उतारने में है। केवल जो दिल से देखते हैं वे चीजों को ठीक से देखते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि ”प्रत्येक व्यक्ति’ को कैसे देखना है।”

दिल से देखना

इस नव वर्ष की शुरुआत में, संत पापा फ्राँसिस ने हमें खुद से पूछने को कहा कि क्या हम "दिल से देखना जानते हैं ? अगर हम जीवन को दिल से लेते हैं, तो "क्या हम जानते हैं कि दूसरों की देखभाल कैसे करें और चारों ओर से उदासीनता को दूर करें।" "अगर हम एक बेहतर दुनिया चाहते हैं, एक ऐसी दुनिया जो युद्ध क्षेत्र नहीं, बल्कि एक शांति का घर बने तो हमें प्रत्येक महिला की गरिमा को ध्यान में रखना होगा।

महिलाएं शांति के मध्यस्थ के रूप में

कलीसिया 1 जनवरी को शांति के 53 वें विश्व दिवस के रूप में मनाती है। इस परंपरा को संत पापा पॉल छठे ने 1968 में शुरू की।

संत पापा फ्राँसिस ने कहा कि महिलाएं शांति को लाने वाली और मध्यस्थ हैं। उन्हें "निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में पूरी तरह से शामिल किया जाना चाहिए"। जब महिलाएं अपने उपहार साझा करती हैं, तो “दुनिया खुद को और अधिक एकजुट, अधिक शांतिपूर्ण पाती है। इसलिए, महिलाओं का आगे बढ़ता हर कदम, मानवता का बढ़ता कदम है।

महिला और मां के रूप में मरियम

संत पापा ने कहा मरियम ने "कोमलता की क्रांति" को शुरु किया था। कलीसिया भी मरियम की तरह माँ और महिला दोनों है। मरियम के करीब आने पर कलीसिया खुद के बारे जान पाती है कि उसमें एक माँ का दिल है।

अपने प्रवचन को अंत करते हुए संत पापा ने कहा, “मरियम हमारे भीतर आशा को जन्म देने और हमें एकता लाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।"  आइये, हम इस वर्ष को मुक्ति की नारी, के सिपुर्द करे। "उन्हें अपने दिल में रखें।"

01 January 2020, 16:24