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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा  

कलीसिया का स्वभाव कठोर नहीं

बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा के दौरान कलीसिया के स्वभाव पर ध्यान आकर्षित कराया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 23 अक्टूबर 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को प्रेरित चरित पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

प्रेरित चरित की पुस्तिका हमें इस बात से वाकिफ करती है कि येसु ख्रीस्त से मिलन उपरांत संत पौलुस अपने में परिवर्तन का अनुभव करता है। वह येरूसालेम की कलीसिया द्वारा स्वागत किया जाता और इस मध्यस्थता हेतु बरनाबस का शुक्रिया अदा करते हुए ख्रीस्त के सुसमाचार की घोषणा शुरू करता है। यद्यपि कुछ लोगों के शत्रुता पूर्ण व्यवहार के कारण वह अपने शहर तरसुस चला जाता जहाँ बरनाबस उससे मिलने आता और वे ईश वचन की लम्बी यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। संत पापा ने कहा कि प्रेरित चरित जिसकी चर्चा हम आज के आमदर्शन समारोह में कर रहे हैं ईश वचन की लम्बी यात्रा का जिक्र करता है जिसे हमें सभी जगह घोषित करने की आवश्यकता है। इस यात्रा की शुरूआत एक बड़ी सतावट (प्रेरि.11.19) से होती है। लेकिन यह सतावट सुसमाचार प्रचार में अवरोधक होने के बदले एक ऐसा अवसर बनता जिसके फलस्वरुप सुसमाचार के अच्छे बीज भूमि में बोये जाते हैं। ख्रीस्तीय अपने में डरपोक नहीं हैं। वे सतावट के समय अपने में एक साथ से दूसरे स्थान को पलायन करते लेकिन इसके साथ ही ईश्वर के वचनों को अपने साथ लेकर चलते और थोड़ा-थोड़ा कर सभी जगह प्रसारित करते हैं।

प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय

संत पौलुस और बरनाबस सबसे पहले सीरिया के अंतियोख पहुँचें जहाँ उन्होंने एक साल रहते हुए ख्रीस्तीय समुदाय को अपनी शिक्षा दी और मजबूत होने में सहायता प्रदान की। (प्रेरि.11.26) उन्होंने यहूदी समुदाय के बीच सुसमाचार की घोषणा की। इस भांति अंतियोख प्रेरिताई कार्य का केन्द्र-विन्दु बना जिसके लिए हम संत पौलुस और बरनाबस दोनों सुसमाचार प्रचारकों के प्रति कृतज्ञ हैं। विश्वासियों की सहृदयता के कारण वहां की कलीसिया को प्रथम “ख्रीस्तीय समुदाय” की संज्ञा प्राप्त हुई। (11.26)

कलीसिया का स्वभाव

संत पापा ने कहा कि प्रेरित चरित की पुस्तिका के अनुसार कलीसिया का स्वभाव अपने में कठोर नहीं वरन उस तम्बू के समान है जिसे विस्तृत किया जा सकता है (इसा.54.2) जिसमें सभी कोई प्रवेश कर सकें और यह सभों के लिए निवास स्थल बनें। उन्होंने कहा कि कलीसिया अपने आप से “बाहर निकलती” है, यह अपनी राह में आगे बढ़ती है या अपने को सदैव विस्तृत करती जिससे दूसरे इसमें प्रवेश करें, यदि ऐसा नहीं होता तो यह कलीसिया नहीं है। “कलीसिया अपने द्वार को खुला रखती है।” (एंभजेली गौदियुम 46) इसके द्वार सदा खुले रहते हैं। “यहां, शहर में मैं कुछ गिरजाघरों को देखता हूं, या दूसरे धर्मप्रांतों में जहां से हम आते हैं, द्वार बंद रहते हैं, जो अपने में एक खराब निशानी है। गिरजाघर के द्वार हमेशा खुले रहने चाहिए क्योंकि यह इसकी निशानी को व्यक्त करती है।” कलीसिया पिता का खुला घर है... जहाँ आत्मा से प्रेरित कोई भी व्यक्ति ईश्वर की खोज में आ सकता है, बंद दरवाजे से वह इससे वंचित हो जाता है।

वार्ता विवाद सुलझाने का तरीका

संत पापा ने कहा कि लेकिन यहां एक समस्या आती हैं, यह द्वार किसके लिए खुला रहता हैॽ गैर-ख्रीस्तियों के लिए क्योंकि प्रेरित यहूदियों को अपनी शिक्षा देते हैं लेकिन गैर-ख्रीस्तीय भी आकर कलीसिया का द्वार खटखटाते हैं। गैर-ख्रीस्तियों के लिए कलीसिया का द्वार खुला रखना एक विवाद को जन्म देता है। इसमें कुछ यहूदी इस बात पर बल देते हैं कि मुक्ति हेतु उन्हें पहले यहूदी बनने अर्थात खतना करने और तदपश्चात बपतिस्मा ग्रहण करने की जरूरत है। उन्होंने कहा,“यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का खतना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी।” (प्रेरि.15.1) पहले यहूदियों की प्रथा और तब बपतिस्मा यही उनका कहना था। इस विवाद को सुलझाने हेतु संत पौलुस और बरनाबस येरूसालेम में प्रेरितों और बुजुर्गों के संग विचार-विमार्श करते हैं। विचार-मंथन का सम्मेलन कलीसिया के इतिहास में येरूसालेम की प्रथम संगोष्ठी या येरुसालेम की धर्मसभा के नाम से प्रसिद्ध हुई जिसकी चर्चा संत पौलुस गलातियों के नाम अपने पत्र में करते हैं।(2.1-10)

संत पापा ने कहा कि यहां हम संवेदनशील ईशशस्त्र, आध्यात्मिकता और अनुशासनात्मक मुद्दों को पाते हैं अर्थात विश्वास में येसु ख्रीस्त के साथ संबंध और मूसा द्वारा निर्धाऱित संहिता के नियमों का अनुपालन। इस सभा के दौरान पेत्रुस और याकूब द्वारा दिये गये निर्णय माता कलीसिया हेतु आधार “स्तंभ” बनते हैं (प्रेरि.15.7-21, गला.2.9)। वे दोनों इस बात हेतु सुझाव देते हैं कि गैर-ख्रीस्तियों पर खतना न थोपा जाये बल्कि वे अपने को मूर्ति पूजा और उसकी सारी अभिव्यक्तियों से दूर रखें। वाद-विवाद के द्वारा एक सामान्य मार्ग का चुना होता है और निर्णय को अंताखिया प्रेरितिक पत्र स्वरूप प्रेषित किया जाता है।

पवित्र आत्मा के कार्य

येरुसालेम की सभा हमारे लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दे को प्रदर्शित करती है जहाँ हम इस बात को पाते हैं कि  विभिन्नताओं की स्थिति में हमें “प्रेम में सच्चाई” को किस तरह खोजने की जरुरत है। (एफे.4.15) यह हमें इस बात की याद दिलाती है कलीसिया में अनबन की स्थिति का समाधान वार्ता में धैर्य के फलस्वरुप एक दूसरे को सुनते हुए करने की जरुरत है जहाँ हम पवित्र आत्मा की ज्योति में आत्म-निरिक्षण करने के योग्य बनते हैं। वास्तव में, यह आत्मा है जो हमारे तनाव और बंद हृदयों में विजयी होती है जिसके फलस्वरूप हम सच्चाई, अच्छाई और एकता को प्राप्त करते हैं। यह अध्याय हमें सिनॉडलिटी को समझने में मदद करती है। यह धर्मसभा की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराती है जहाँ हम पवित्र आत्मा को उपस्थित पाते हैं। धर्मसभा के विपरीत हमारे लिए संसद, वार्तागृह और दूसरी चीजें हैं।

संत पापा ने कहा कि हम ईश्वर से निवेदन करें कि वे एकता हेतु हमारी मनोभावनाओं और उत्तरदायित्वों को मजबूत करें विशेष कर धर्माध्यक्षों और पुरोहितों के मध्य। हमें वार्ता में दूसरों को सुनने और विश्वास में अपने भाई-बहनों से मिलने को प्रेरित करें जो हमसे दूर हैं। वे हमें “माता कलीसिया की खुशी” को अनुभव करने की कृपा दें जहाँ हम सदा उनके बच्चे बने रहने हेतु बुलाये गये हैं। 

23 October 2019, 16:57